Wednesday, May 16, 2012

पेड़ पर आदमी, साहित्‍य ज़मीन पर..

एनरिक गोमेज़ कारिल्‍लो (ग्‍वातेमाला, 1873-1927)
जैसे मेरी मूल प्रवृत्ति पलंग के नीचे, अंधेरे एकांत में सबसे छिपकर, पेद्रिनो से घंटों फुसफुसाकर बातें करते रहना है, और स्‍कूल जाना सामाजिक व जीवन की मजबूरी, उसी तरह पिता की मजबूरी थी बढ़ई का रंदा चलाकर हाथ, भौं और बालों में लकड़ी के बुरादे इकट्ठा करना, मूल प्रवृत्ति उनकी भी लिखने-पढ़ने की थी. उनका हमेशा का सपना था एल पासो, एल कुओरे, मातीता किसी ख्‍यातिलब्‍ध अख़बार के साहित्यिक संपादक का जिम्‍मा संभालें और रोज़ पन्‍नों पर दुनिया-जहान के विचार-मणियों की माला गूंथते रहें. किसी दिन भूले से उनके माथे को पेद्रिनो की मौत, गांव के सामाजिक बहिष्‍कार, घर और पैसों की चिंता से अवकाश रहता तो पेद्रिनो की ही सी चमक चेहरे पर लिये वह चहकते अपने सपनों में गोते खाने लगते. अनुपस्थित चुरुट की धूंक व अनुपस्थित कॉफ़ी की चुस्‍की में सराबोर, बैठकी और रसोई में खोये कदमों फुसफुसाते टहलते बार्सेलोना चला जाऊं? नहीं, लिस्‍बोआ निकल जाता हूं, कि ब्‍युनेस आयरेस? मुझे क्‍या, मेरे लिए सब जगह एक बराबर, परिजी, वियेना, लोंद्रा, जहां साहित्‍य को मेरी ज़रुरत होगी वही शहर मेरे अथक परिश्रम, मेरे कर्मों का तीर्थ बन जाएगा!

काठ के कठवत में बर्तन खंगालती, या उधारी के राजमा के कीड़े छांटती मां अचानक बिजली की फुर्ती से आकर एक सन्‍नाका तमाचा पिता के गाल पर जड़ती तब कहीं जाकर वह वर्तमान के खुरदुरे व वास्‍तविकता में लौटते. सिर झुकाये मां से माफ़ी मांग, घिसे पैंट के चीकट खाली जेब में दोनों हाथ फंसाये चुपचाप घर से बाहर चले जाते. मां कहती मेरा पेद्रिनो चला गया लेकिन यह आदमी सुधरेगा नहीं. जिस दिन मैं खत्‍म हो जाऊंगी ये घर खत्‍म हो जाएगा उस दिन आएगी अकल, ओ दीओस!

मां के अपने मन के मलिन को बाहर करने का यह तरीका था, ईश्‍वर को वह नहीं मानती थी. जैसे पिता भी नहीं मानते थे. लेकिन गांव के लपाड़ी चार लोग कहते कि परामो पक्‍का हरामी है, ये तो कम्‍युनिस्‍टों को भी नहीं मानता! पिता एतराज करते, वर्तमान शासन चलानेवालों की नीतियों से विरोध का यह मतलब नहीं कि..

ऐसे मौकों पर जाने कहां से मां लपकती, लगभग उड़ती सी आती और लहराते पंजे के जोर से पिता को ठेलती, गिराती, उनकी छाती पर सवार होकर गर्जना करती परामो या तो तुम अपना मुंह सिलकर रखोगे या मैं आज सबके सामने तुम्‍हारी जान ले लूंगी!

पिता कुछ नहीं कहते. मां को एक ओर सरकाकर चुपचाप कपड़ों का धूल झाड़ते उठते, तमाशबीनों की हंसी उड़ाती नज़रों से आंख बचाये भीड़ से बाहर होते और उसके बाद घंटों कहां किधर बैठे हैं इसकी किसी को ख़बर नहीं रहती. कभी ऐसा होता कि मेरे स्‍कूल से लौटने और गांव के सियेस्‍ता के बाद भी घंटों गुजर जाते और पिता की वापसी नहीं ही होती तो चिंता में मां रसोई के गिने बर्तन गिराने लगती, ओ दीयोस ओ माम्‍मा की गुहार लगाकर मुझे पेट से भींचकर रोने लगती. तामकिता की लड़की या हेरनान का चरवाहा आकर तब सूचित करता कि बकरियों ने देखा, पिता गांव के अकेले आम के पेड़ पर लेटे पड़े हैं. मां भागी-भागी गांव के बाहर पेड़ के नीचे पहुंचती, हल्‍ला मचाती कि नीचे आओ, दिमाग चल गया है बुढ़ाये पेड़ पर लेटे हो, भूले आंख लग गई, गिर पड़े क्‍या होगा मालूम भी है? पिता थोड़ी देर चुप रहने के बाद जवाब देते, कि इसीलिए तो तब से यहां लेटा हूं, कि आंख लग जाये, गिर जाऊं!

मां जोर-जोर से रोने लगती. आम के उस बड़े, बाबा आदम के ज़माने के बुढ़ाये पेड़ के गिर्द चार औरतें इकट्ठा हो जातीं. गदहे और बकरियों का मजमा लग जाता. सब चिरौरी करते नीचे आ जाओ परामो ये क्‍या तमाशा है. मां कहती मेरा एक बेटा चला गया, भगवान मुझसे अब और क्‍या चाहते हैं. सब चिरौरी करते-करते थक जाते तब पिता मां की ओर तर्जनी दिखाकर कहते इस औरत से कहो आईंदा मेरे कागज़-पत्‍तर चूल्‍हे में नहीं डालेगी का वादा करे तभी नीचे आऊंगा. मां कहती कान पकड़कर सबके आगे स्‍वीकारती हूं नहीं डालूंगी, अब उतर जाओ. पिता कहते तमारा गाकर विनती करे. मां रोकर गाती. पिता पेड़ पर हंसने लगते और तब कहीं जाकर नीचे उतरने की कसरत करते. हालांकि उनके नीचे ज़मीन पर चले आने तक खटका बना ही रहता कि इस उमर में पता नहीं ये जवान पेड़ पर चढ़ कैसे गया लेकिन साबूत सशरीर नीचे आज नहीं ही आ पाएगा. हेरनान तक मेरे पिता के गिर जाने के अंदेशे में जोरों से मेरा कंधा भींचे रहता और आंखें मींचे जल्‍दी-जल्‍दी बुदबुदाता ओ दीयोस ओ दीयोस, आज पेद्रिनो के पापा को बचा लो तो आईंदा से मैं अपना गृहकार्य अपनी बड़ी बहन से नहीं कराऊंगा..!

सब सांस रोके पिता के नीचे आने तक इंतज़ार करते. मां रोती रहती गाती रहती.

मां की भी मूल प्रृवत्ति गाने की ही थी, जानवरों के अस्‍पताल में सफाई का काम तो उसने पेद्रिनो के जाने के बाद घर पर फांकों को संभालने के लिए किया था. घर पर फांकों को संभालती अब भी कभी-कभी जोर से गुनगुनाने लगती, पूंजी पूरे गांव के चक्‍कर लगाना, इस घर नहीं आना, हां.. पिता बाहर से भागे आते बंद करो, तमारा, अभी इसी वक्‍त, तुम्‍हें गाने के लिए यही मिला. मां कहती क्‍या बुरा है, घर से बाहर चार लोग सुनेंगे बात फैलेगी कि इस घर में भी कोई पूंजीवाद के खिलाफ़ है, वर्ना तुमने तो पूरे गांव में नाक ऊंची कर ही रक्‍खी है.

पिता को बिराने के लिए मां और जोर से गाती, स्‍थानीय पार्टी के लोकप्रिय मंचीय गाने गाती, फिदेल दुनिया कहां जाना था, तेरे रस्‍ते चले तब कहीं अपने को पहचाना था इसी तरह के गाने और जाने क्‍या-क्‍या उटपटांग.

पिता फिर बात करना बंद कर देते. उस दिन खाना नहीं खाते. मैं भी डरकर तब पलंग के नीचे जाकर नहीं छिपता, हालांकि पेद्रिनो को बताने की ज़रुरत रहती ही कि पड़ोस में बुलितो की बकरी के जुड़वां हुआ है और छोटी वाली का चेहरा तो इतना सुंदर है कि पेद्रिनो उसे अपनी गोदी में लेने के लिए भगवान के यहां तक से वापस चला आता!

पिता देर रात तक ग्‍वातेमाला के लेखक एनरिक गोमेज़ कारिल्‍लो (1873-1927) का लिखा पढ़ते होते. अपने से बात करते कि तमारा का कसूर नहीं कि वह क्‍यों छोटा सोचती है. छोटे, पिछड़े समाजों में संदर्भ और चिंताएं तक लघुकाय बनी रहती हैं, साहित्‍य की अंतर्रात्‍मा तक उच्‍चाकांक्षी लक्ष्‍यों की नहीं सोचती, एक के बाद एक थोक में किताब पैदा करती रहती है जिसका छोटे-पिछड़े समाजों के टिनहा संदर्भों से बाहर, बड़े साहित्‍याकाश में कौड़ी भर मोल नहीं होता..

पिता नहीं, यह एनरिक गोमेज़ कारिल्‍लो का सोचना होता:

“the maximum celebrity to which a South American author can aspire.. for a writer who is the least bit universal-minded.. (zero, yes!).. the Spanish language is a prison. We can pile up volumes, even find readers, it’s exactly as though (almost like Hindi films in far-off India, yes) we had written nothing: our voice doesn’t carry beyond the bars of our cage! One can’t even say that the terrible wind of the pampas carried it away, it’s worse than that: it vanishes!”

(बाकी..)

3 comments:

  1. आपके झोले में कई खजाने है सर जी

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  2. वैसे यह मेढकों समेत कुएं की आवाज डुबा देने वाली फोटू है जिसके आगे समन्दर की सोइंस भी पानी भरे।

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  3. "मुझे क्‍या, मेरे लिए सब जगह एक बराबर, परिजी, वियेना, लोंद्रा, जहां साहित्‍य को मेरी ज़रुरत होगी वही शहर मेरे अथक परिश्रम, मेरे कर्मों का तीर्थ बन जाएगा!"
    Salute to this grit and thought!

    Lots of things to read and re-read in the post...
    Will come back to this again!

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