Sunday, May 20, 2012

दूर से अपना घर देखना चाहिए..

पिता के हाथ में फिर कोई कविता है (मुझसे पूछते हैं सुनोगे? बाद में कहकर मैं भागा जाता हूं), मां की कनपटी पर कोई नस है बजता रहता है, और दिल में उदासी का वही पुराना गाना, पेद्रिनो, बुच्‍चन, तुम कहां हो, ठीक तो हो न बच्‍चे? मां को क्‍या मालूम कि पेद्रिनो मज़े में है, पलंग के नीचे के अंधेरे में पुराने, चिथड़े तौलिये की गेंद पर सर दिये लेटे, एक घुटना उठाये, उसपे दूसरे पैर को दुरुस्‍त सजाये, मुझसे दूर देश के सताये बच्‍चे की यादों को सुनकर चंचल-चकित-उत्फुल्लित हो रहा है. मैं दबी आवाज़ में पिता की कागजों से चुराया तुलसी राम के मुर्दहिया के हिस्‍से पढ़ता हूं-

"उन दिनों यानी आज से ठीक पचास साल पूर्व हमारे गांव के पूर्व तथा उत्‍तर दिशा में पलाश के बहुत घने जंगल थे जिसमें, पीपल, बरगद, सिंघोर, चिलबिल, सीरिस, शीशम, अकोल्‍ह आदि अनेक किस्‍म के अन्‍य वृक्ष भी थे. गांव के पश्चिम तरफ एक किलोमीटर लम्‍बा चौड़ा ताल था, जिसमें बारहों महीने पानी रहता था. इस ताल में बेर्रा, सेरुकी, पुरइन, तिन्‍ना तथा जलकुम्‍भी आदि जैसी अनेक जलजीवी वनस्‍पतियां पानी को ढंके रहती थीं. रोहु, मंगुर, गोंइजा, बाम, पढ़ि‍ना, टेंगरी, गिरई, चनगा, टेंगना, भुट्टी, चल्‍हवा, सिधरी, कवई आदि जैसी अनेक मछलियों की भी भरमार थी.."

कितनी कितनी कितनी सारी, ना? पेद्रिनो चौंककर मेरा हाथ पकड़ लेता है, मुझसे पूछता है मैंने कितनी मछलियां देखी हैं, कितनों के नाम मुझे जबानी याद हैं? पेड़ों के, चिड़ि‍यों के?

मैं कहता हूं कविताओं के?

मैं बुरा मानकर पीठ फेर लेता हूं, पेद्रिनो से कहता हूं तुम्‍हारे ऐसे सवाल का क्‍या जवाब है, घर और स्‍कूल और गांव के चौक के हल्‍ले के बीच भागते रहने में चिड़ि‍यों को पहचानने की कब फुरसत बनती है, बोलो. यहां बनती है न उस अफ्रीका के देश में जहां का कापुचिन्‍स्‍की किस्‍सा सुनाते हैं. पेद्रिनो मेरी पीठ मोड़कर आंखों से मुझसे माफ़ी मांगता है, होंठों से फुसफुसाकर कहता है क्‍या किस्‍सा?

मैं आंखें मूंदकर मन ही मन पढ़ना शुरु करता हूं.. कौन देश है सोमाली, कैसा है, क्‍यों लोग हमेशा इतनी हड़बड़ी में रहते हैं, इतनी तंगी क्‍यों रहती है?..

“There is haste in this bustle, a race against time: one must accomplish as much as possible, that is, break camp and get on the road, before the sun rises and the heat starts. These people feel no connection to the place in which they happen to be. They will soon depart, leaving no trace. In their ballads, which they sing in the evenings, is a constantly repeated refrain: ‘My country? My country is where the rain falls.’

The Somalis are a single nation, several millions strong. They share a common language, history, culture, territory and religion: Islam. About one quarter of the population lives in the south and is engaged in farming, growing sorghum, corn, beans, and bananas. But the majority are owners of herds, nomads.. The Somalis are divided into several large clans (such as Issaq, Darrood, Dir, Hawiye), which are each in turn subdivided into smaller clans, of which there are dozens, and further still into kinship groups, of which there are hundreds, even thousands. The arrangements, alliances, and conflicts within this familial associations and constellations make up the history of Somali society.”

मुंदी आंखों को अचक्‍के में खोल पिता बुदबुदाते हैं- मुझसे न पेद्रिनो से, अपने आप को सुनाते हैं: सोमाली देश के एक अंग्रेजी लिखनेवाले हुए, नुरुद्दीन फराह, वह भी चिड़ि‍यों और पेड़ों को पहचानने की नहीं, अपने संसार में अपनी भाषा की मुश्किलों को गिनाते हैं. ‘मेरी स्कित्‍ज़ोफ्रेनिया का बचपन’ में लिखते हैं-

“We spoke Somali at home, but we read or wrote in other languages: Arabic (the sacred tongue of the Koran); Amharic, that of the colonial master, the better to know what he thinks; English, a tongue that might one day afford us entry into a wider world. We moved from one language universe to another with the disquiet of a tenant on a temporary lease. We were conscious of the complicated state of affairs, conscious of the fact that we were being brought up not as replicas of our parents but as a strange new species.. I have remarked on my people’s absence from the roll-call of world history as we were taught it.. It was with this in my mind that I began writing, in the hope of enabling the Somali child at least to characterize his otherness and to point at himself as the unnamed, the divided other, a schizophrenic child living in the age of colonial contradiction.”

पिता की आंखों में आंसू हैं. लेकिन पलंग के नीचे के अंधेरे में मैं अब अकेला हूं, पेद्रिनो का कहीं पता नहीं. जबकि मां ने आखिरकार गुनगुनाना शुरु किया है. कोई कविता है, किसकी है? मां नहीं बतातीं कि दूर देश के शहर रायपुर का कोई गुमनाम कवि है, वह चुपचाप धीमे-धीमे गुनगुनाती है:

दूर से अपना घर देखना चाहिए
मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर
कभी लौट सकेंगे की पूरी आशा में
सात समुंदर पार चले जाना चाहिए
जाते-जाते पलटकर देखना चाहिए
दूसरे देश से अपना देश
अंतरिक्ष से अपनी पृथ्‍वी
तब घर में बच्‍चे क्‍या करते होंगे की याद
पृथ्‍वी में बच्‍चे क्‍या करते होंगे की होगी
घर में अन्‍न-जल होगा कि नहीं की चिंता
पृथ्‍वी में अन्‍न-जल की चिंता होगी
पृथ्‍वी में कोई भूखा
घर में भूखा जैसा होगा
और पृथ्‍वी की तरफ लौटना
घर की तरफ लौटने जैसा.
घर का हिसाब-किताब इतना गड़बड़ है
कि थोड़ी दूर पैदल जाकर घर की तरफ लौटता हूं
जैसे पृथ्‍वी की तरफ.

(बाकी..)

कामरेड फिदेल और मेरा परिवार किस्‍से की पहली, दूसरी कड़ी. 

7 comments:

  1. पूरी पोस्ट को पढ़ने के बाद बहुत देर तक आपके बारे में सोचता रहा। सच्ची! :)

    बहुत संवेदनशील हैं आप जी। बहुत पढ़े-लिखे।

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  2. बहुत बढिया.

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  3. कविता को सुन लेना चाहिए..अक्सर नहीं सुनी गयी कविताये भटकती रहती है..दिमाग के बीहड़ में..

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  4. कविता को सुन लेना चाहिए..अक्सर नहीं सुनी गयी कविताये भटकती रहती है..दिमाग के बीहड़ में..

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  5. It was enriching to read the post and go through all the links...!!!
    Reading the poetry of the poet of 'दूर से अपना घर देखना चाहिए'@Kavita kosh!
    Thanks to this post for bringing me to the concerned address on Kavita Kosh:)

    Charansparsh pranaam!

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