Thursday, May 24, 2012

अनगढ़ कविता के, तलघर में..

मैं एक कविता बनाने बैठता, और जल्दी ही ज़ाहिर होने लगता कि छिटकती बनती हुई जो भी वह है, वह तो कतई नहीं जिसे पा लेने की पुलक में मैं उमगता कल्पना की रेल चढ़ा था, सूखे व छूटे शब्दों की, बिम्ब-संयोजन की कोई यांत्रिकी-डायरी है, या अंधेरे में जीवन चलाते कंपाउंडर के हाथ घसीटी उपचारी, पिटी हारी साहित्तिक पुरची; कविता, किसी पुरइन पंडिताइन के अचेतन रुटिनी दोहराव में बजती घंटियों-सी, हमेशा मोस्‍ट ऑफ़ द टाईम यही होता बीच रास्ते कहीं अगवा कर ली जाती, तीन भाई कभी बच्चे थे साथ हंसते थे कैसा सहजभाव सच्चा, अच्छा लगता था, आज साथ बैठे के कुनमुनाते में सहजता में रो तक नहीं पाते की तर्ज़ पर कविता अपना भुनभुनाना गुनगुनाती, या फ़ि‍ल्मी तुक में नाटकीय होती एकदम अश्लील हुई जाती, मैं घबराया भागकर रंगों के कारखाने ख़याली अमूर्तन के तलघर छुप जाता, भाषा की अनगढ़ बास्टर्ड भोली को उंगलियों पर गिनता बुदबुदाता, घिसे मलिन काईखींच दीवारों पर कई सारे जानवर आ-आकर देह रगड़ते, गुर्राते. भोंपे पर अचानक कोई नाम पुकारा जाता, मुकाम चामपुर का अहमक कोई भागकर मंच चढ़ता, एक टुटही तांबे की कलम और पान-पत्र पाकर सम्मानित बताया जाता, बारह लोगों की किसी गुप्तसभा में मुरदा प्रकाशन की आरती उतारी जाती, नये अलंकारिक उपकरणों के फटे कैलेंडर पर गोबर व कोयले के टोटके उकेरे जाते, मैं अपने से पूछता हकलाकर जॉयस जानते हो, काफ़्का को, बेकेट लिखते हैं कैसे कुबेरनाथ राय लिखकर दीखाओ?

(यह ख़ास चंदू के लिए)

5 comments:

  1. चंदू ना जाने बांचे कि नहीं- हम बांच लिये। :)

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  2. जब-तब लिखने के लिए भी लिखना होता है। नहीं? कोई चीज पकड़ने के लिए दौड़ा- जैसे कुत्ते गिलहरी पकड़ने दौड़ते हैं- नहीं पकड़ाई तो कोई बात नहीं।

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  3. गिलहरी ना सही गिलहरी की परछॉई पकड़ लेता है मन और परछाई से खेलते हुए जो मिलता है.... सो बेबूझ सार्थकता का अकथ संतोष; .... जियो परमोद बाबू

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  4. गिलहरी ना सही गिलहरी की परछॉई पकड़ में आ जाती है और परछाई से खेलते हुए जो मिलता है.... सो बेबूझ सार्थकता का अकथ संतोष; .... जियो परमोद बाबू

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  5. हमेशा मोस्‍ट ऑफ़ द टाईम यही होता बीच रास्ते कहीं अगवा कर ली जाती,
    ***
    यहाँ तो कविता सभी सरोकारों के साथ पूरी तारतम्यता व भव्यता के साथ आ गयी है, कहीं बीच में अगवा नहीं हुई ("....किसी पुरइन पंडिताइन के अचेतन रुटिनी दोहराव में बजती घंटियों-सी":)

    चरणस्पर्श प्रणाम.

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