Wednesday, May 2, 2012

इतिहास कल्‍पना है. मसलीपट्टम की हार भी..

‘अच्‍छा हो यह कथा न लिखी जाये. प्रथम पुरुष में तो न ही लिखी जाये,’ लिखनेवाले हाथ किंचित संकोच में ठहर गए. डोलती गाड़ी में सिर उठाकर देखा तो लगभग बाहर की ओर, घुटने पर हाथ आगे गिराये बैठे उस श्‍यामवर्णी नौजवान को गहरी मलिन उदासियों में नहाया पाया. उतना वैसा ही गाढ़ा जैसा उसका रंग. किंतु अंधेरे में उसकी बड़ी सफ़ेद आंखें अब भी किसी चौंध-सी चमकती थीं.

‘तृतीय पुरुष के लेखन में भी यह संभावना किंचित रहेगी ही कि केंद्र में मेरी स्‍थापना की जाये, कथा का वह शिल्‍प बनते ही उस कथा में मेरी प्रासंगिकता, उसमें होने की मेरी सौद्शेयता ख़त्‍म हो जायेगी,’ श्‍यामवर्णी ने कुछ व्‍यंग्‍य में कहा और लिखनेवाले की सामर्थ्‍यता को मानो परीक्षक नज़रों से जांचने लगा, ‘हम लोग कभी प्रचलित कथा के केंद्र में नहीं रहे, समुदायबद्ध गल्‍प-गायन, या आराधना-वंदन से बाहर कभी हमारी कथा गई नहीं, हमारे लोग नहीं गए; मैं अभागा, चिन्हित कुलनाशी रहा होऊंगा जो अपनी मातृभूमि से हज़ारों मील दूर इस मेघप्रबल रात्रि में सूखा, निर्जन भटक रहा हूं, इस यात्रा का निश्चिंत ही कभी अंत होगा, मेरी अनिश्चिताओं का नहीं!’

इतनी दूर निकल आने के उपरांत भी अभी आगे दूर-दूर तक जंगल के गाढ़े अंधेरों का ही साम्राज्‍य था. नौ सौ घोड़ों के काफिले का हरेक प्राणी थकान और निरुत्‍साह में टूटा हुआ, मैदान में तलवार ताने कूदने से पहले ही मानो सब युद्ध के अंतिम नतीजे से परिचित हों. फ्रांसीसियों के निकट सहयोग की अंतिम गुहार लेकर वेर्साइ पहुंचे दल को क्‍या ख़बर थी कि स्‍वयं समूचा फ्रांस उलट-पुलट के महाचक्र में उलझा हुआ है, और महाप्रभु अपने अंत की घड़ि‍यां गिन रहे हैं. नौका से उस दल की वापसी के साथ ही जैसे मसलीपट्टम की नियति भी लिखी जा चुकी थी, अब खुद बाघबच्‍चा टीपू भी उस लिखे को मिटा नहीं सकते थे!

क्‍या फर्क़ पड़ता था अब यह काफिला मसलीपट्टम कब पहुंचे. ये अपरिचित, संशयग्रस्‍त वृक्ष यूं ही चुपचाप अपनी जगह खड़े रहें, पवन कोई संवाद न करे, मेघ रह-रहकर गरजें किंतु बरसने में सकुचा जायें.

‘तुम कभी वापस अपने घर नहीं गए?’ लिखनेवाले ने सवाल किया, ‘अब जा सकते हो, अब तो टीपू भी मना न करेंगे? संभवत: अंगरेज़ अपनी निगरानी में तुम्‍हें तुम्‍हारे घर छोड़ आयें, तुम से काबिल नौजवान को अपने यहां बड़ी नौकरी की भरती में ले लें?’

श्‍यामवर्णी युवा गोद में धरे अपने भारी तलवार से खेलता रहा, मंद-मंद मुस्‍कराये, ‘आपने कभी विचार किया है, कुमार, टीपू की फौज में इतना सम्‍मान हासिल करने के अनंतर मैंने इस्‍लाम कबूल नहीं किया? लौट-लौटकर डाभोल, पश्चिम की यात्राएं करता रहा, और इसलिए नहीं कि वह भूमि मेरे किसी आपदाग्रस्‍त पुरखिन की शरणस्‍थली रहा, या चीनी फुजियान, ग्‍वॉंगदॉंग के मेरे व्‍यापारिक मित्रों का स्‍थानिक निवास.. नहीं, कुमार, सत्‍य यही है मैं उस भूगोल अब नहीं लौट सकता जिस भूमि से इतने वर्षों परित्‍यक्‍त रहा.. मेरे उस खोये, वंचना के समाज के माथे लिखा मंत्र जैसे मेरी किस्‍मत का भी अभिशाप-पत्र हो- सबके बीच हूं, लेकिन नहीं हूं, कहीं नहीं हूं! - वर्षों से मन-कातर, अनिद्रा-पीड़ि‍त इस मानुस-वन में रहते हुए भी, संभवत: इसीलिए होगा कि आपका यह हेम्‍ब्रम, अब भी समुदाय-वंचित रहा है! उस भय से जूझने की तृष्‍णा, छटपटाहट ही होगी जो बारम्‍बार मुझे युद्ध के घने पराक्रम में उछालती रही है, नहीं तो मेरे वैराग्‍य को आपसे अधिक कौन जानता है.. अंगरेज़ों के छल से इतनी नफ़रत न होती तो आज निश्‍चय ही यह काया मसलीपट्टम न जाती होती.. मैं भगोड़ा होकर टीपू और इस युद्ध से भाग जाता और जानता हूं कि आप स्‍वयं मेरी मदद करते.. किंतु चोट तो यह है कि इस नफ़रत के साथ मैं भाग भी नहीं सकता; उसकी आंख में आंख डालकर उसे पहचानने और अपना अंतस शुद्ध करने के लिए भी ज़रूरी है कि मैं इस हारी लड़ाई के केंद्र में जाकर खड़ा होऊं,’ श्‍यामवर्णी योद्धा अचानक जाने कैसी सनकभरी हंसी हंसने लगा, ‘भले मेरी कथा का कोई केंद्र न हो.. भले मसलीपट्टम महाबली टीपू के साथ-साथ इस गुमनाम आदिजीवन का भी अंत हो! न, कुमार?’

लिखनेवाले के हाथ की तरह ही उसका मन भी बंधा रहा. बिंधा. घोड़ों के निस्‍तेज खुर रात के सन्‍नाटे में जाने कैसा आलाप लिख रहे थे.

कुछ क्षणों की बिंधी ख़ामोशी के उपरान्‍त उस श्‍याम चेहरे पर एक तरल स्निग्‍घता उतर आई, विचित्र उस लुप्‍तात्‍मा ने सरस मीठेपन में धीमे से कहा, ‘आपसे सचमुच मन की कहूं तो इस क्षण मैं युद्ध-आपद की नहीं, बुद्ध की सोच रहा हूं, और जानता हूं असम्‍भव है, किंतु मेरा वश चले तो मसलीपट्टम किम्‍बा अपना बिसराया घर नहीं, चीनोन्‍मुख निकल जाना चाहता हूं!’

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1 comment:

  1. जैसे कोई मध्यकालीन साहित्य...

    गुम

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