Friday, May 4, 2012

पुरानी शराब..

(मीठल बही छापे की कुछ पुरानी रचनाएं.. गरमी का असर होगा जो सीधे पांच पैग उंड़ेल रहा हूं, अंग्रेज़ी में मेरी आंखें मिची हुई हैं, उसमें बहकने का उद्यम सुश्री दरभंगाकुमारी के दु:स्‍साहसी पराक्रम से ही संभव हुआ है..)

(यह भी पुराना ही है..)












देशकाल से परे..


दौलतपुर, नीमतरा, हरहरा क्‍या जगहें थीं जहां रुक जाता बेमतलब. साइकिल अड़ाकर तकता उजबकों की तरह टहलता कौन लोग हैं कैसे बात करते हैं. झबरे मूंछ व पोपले मुंह वाला एक बूढ़ा हंसता बुदबुदाता कातिक-अगहन. कोई औरत दौरी उतारकर रखती ज़मीन पर, साड़ी के किनारे से पोंछती श्‍याम चेहरा, देखती ललियांही राह, थकित-चकित बूझती मन ही मन अभी और कितना आगे जाना होगा पत्‍ते में जामुन और नून सजाकर खोजने गाहक चार कौड़ी कर कमाई बास्‍ते. नंग-धड़ंग एक बच्‍चा घिसटता-दौड़ता चला जाता, कोई मुर्गी फुदकती झाड़ि‍यों से बाहर चेहरा करती जैसे बीच काम देखने आयी हो बाहर के हाल.
अभाव व दुरव्‍यवस्‍था की बड़ी-काली मक्खियां ताड़ व बांस के पत्‍तों पर गोल बांधे भिनभिनातीं, घूमतीं करियाई पुरानी मटकी पर. लगता सदियों पहले का कोई दृश्‍य हो लगता देश-काल से परे में जाने कहां घुसी चली आयी साइकिल.

Outside the frame
What were those places where I could just stop purposelessly, Daulatpur, Neemtara, Harhara? Holding the cycle by my side, looking at people with curiosity, who are they? What do they talk? A bushy moustachioed and hollow faced old man whispers smiling toothlessly, autmn? eh, spring? A woman puts away the basket from her head, wipes her tanned weary face, glances at the dust laden rust colored path, wonders with bone weary fatigue, how far still to go to sell the berries sprinkled with salt , in woven leaf parcels to customers. A naked small child runs after her listlessly, a hen peeks inquisitively from the shrubbery, as if to see in between work, the routine of the day.
Lack of system and absence of plenty hover like fat black house flies in dizzying circles over palm and bamboo leaves, take a swing over old rusted pots. A scene from ill begotten olden times, standing on the margins, and a cycle, propped up against a wall, enters the picture , outside the frame.
***

 

दोपहर में फंतासी


खुद से आंख बचाकर चुपके रोज़ निकल जाता हूं पहाड़ि‍यों के पार किसी छोटे गांव. या रियु द सविन्‍यॉं से निकलती है जो पगडंडी पकड़े हुए उसे आगे दूर किसी ग़ुमनाम ठांव. धीमी दुलकी चाल चलते गदहे पर धंधे का माल ढोये जाता किसान. वेर्गा की कहानियों से बाहर चली आयी काली-सफ़ेद सीपिया किसी छूटी तस्‍वीर-सी धुंधली. प्‍यात्‍ज़ा सांता मारिया के सूने चौक के आख़ि‍र में उतरते कुम्‍हलाये मैदान और दूर-दूर तक जैतून के खेत. आंखों पर हाथ धर तकता आगे समुंदर के पार वहीं कहीं होगा त्रिपोली-दामासकस-माराकेस. हहराती पानियों में डोलती पुरानी नाव, जाने तीन कि तेरह दिन के सफ़र के बाद. किसी ऊबे अधेड़ अरब को समझाता होगा मलाबारी मलयाली छोकरा अपने गांव की कोई बेमतलब-बेतरतीब कहानी. मैं डेक पर पैर पसारे सुलगाता होऊंगा हुक्‍का गुड़गुड़ गुड़गुड़. या पत्‍थरों पर दौड़ता, रेत पर भागता बच्‍चे की शक्‍ल में देखता होऊंगा खुद को मुंह से बबूले बनाते, सुनकर ताजुब्‍ब करते, बांसुरी बजाते.

Mid Aftrnoon Fantasy
Running away from myself I escape every day to the small hamlets beyond the hills. Or to the forgotten little unknown destinations, taking that small path that forks away from rue de savignon. Emerging, like a blurred, black and white sepia half remembered half lost impression from a Verga story, a peasant ambles by, carrying his load on a slowly cantering mule. The withered fields at the edge of the deserted square of Piazza Santa Maria and beyond the fields of olive trees spread far and wide. Shielding my eyes with my palms, squinting at the sea I wonder at the distant shores that lie somewhere beyond the oceans.. Tripoli Damascus Marakesh at the end of long endless uncharted journeys. A Malabari Malayali lad regaling an old bored Arab with some chaotic tales from his distant home left long long ago and I lounging on the deck, lighting a pipe, the smoke swirling out in lazy circles, looking at myself, a small child skipping on the stones and scampering on the beach, blowing bubbles, being awed at listening to myself playing the flute.
***

भोर में अकेले..


मुंह पर साड़ी ढांपे उन्‍नीस वर्ष की मां माधवी है सोयी. सात गांव की पुरोहिताई की थकान में थके सोये बाबू सीताकांत, नया-नया पिता बने पिताबोध की जिम्‍मेदारी की बोझ दबे. रेंगनी पर खोंसे कपड़े, दीवार पर शंकरजी का कलेंडर और आईने पर साटी टिकुली सोयी. फूलदार टिन के बक्‍से पर धरा सिंगारदान सोया चुपचाप और सिंदूरदान सोया. तीन पैर वाली कुरसी का पंचांग, और कांटी पे टांगा अंगौछा और बरामदे का सोये कैसी नींद में खोये. आंगन का अमरूद और पीपल के डुलडुल डोलते पत्‍ते ऊपर ओढ़े चांदनी की खड़ाऊं व हवाई चप्‍पल सब सोये. चूल्‍हे से टिका के धरा चिमटा और धुले-चकमक बरतन चुनरी, किस कदर शांत एकदम निष्‍प्राण.
छै महीने का ढुनमुन चिंहुक कर आंख खोलता है. और फिर जगा, दूध की साफ़-सफ़ेद आंखों तकता-निरखता रहता भोर का नीलापन, निश्चिंत-आत्‍मनिर्भर अपने अकेलेपन में.

Solitary in the Morning
Covering her face with her sari, nineteen year old Madhavi sleeps. Babu Sitakant drops in a death tiring sleep after wandering through seven villages doing odd priestly jobs, stressed out by the new found responsibility of becoming a father. And sleeps alongside him, the clothes hung on the wire rack, Shankarji on the calendar and the bindi stuck to the mirror. The vanity case kept on the flower bedecked aluminum tin and the tiny box holding the sindur, all lie silently in somnolence
Lost in slumber, the three legged chair and the old torn towel on the hook, the slippers and the flip-flops in the veranda all sleep .The tongs by the stove and the shiny washed utensils,  the guava tree in the courtyard , and the trembling peepal leaf, wearing the moonshine scarf,  all sleep as well, so silent so lifeless. Lost in a trance of deep oblivion
Six months old Dhunmun, startled, opens his eyes, watches with his milk clear gaze, beholds the morning blue, calm and content in his self absorbed solitude.
***

शहर में शहर से बाहर..


पटना रहा हूं मोना टॉकीज़ से निकलकर गांधी मैदान में मूंगफली खायी, डाकबंगला सड़क पर बेमक़सद टहलते रहे, कभी ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी नहीं गया. कहते हैं इस्‍लाम पर हस्‍तलिखित पांडुलिपियों की यह दुनिया का सबसे अमीर किताबख़ाना है! इमारत से लगी सड़क की तंगहाली के दृश्‍य देखे, किताबों की अमीरी देखने से रह गयी. जैसे इलाहाबाद में श्‍याम बीड़ी के होर्डिंग देखे, ब्रिज के बाद विश्‍वम्‍भर सिनेमा व दारागंज की तंग गलियां व टूटे छतों से रिसता काई का जल देखा, संगम की नाव से, ओह, डोलता इलाहाबाद न देख सके.
दो दोस्‍त और चार किताबों से बाहर दुनिया फैलती है लेकिन मन व संस्‍कारों की गरीबी से पार पाना बड़ा उलझा, पेचीदा काम है. इच्‍छाओं के गुलगुले फूलते भी हैं तो उसका नक़्शा जाने क्‍यों दो कौड़ी की छपाई वाला होता है.
पान-तंबाकू की गुमटी में जैसे सजी हो फॉर स्‍क्‍वॉयर की खाली डिब्बियां एक पर एक और दुकानदार भूल गया हो वैसे ही भूले रहते हैं अपने होने में हम. जीते हैं शहर में, अपनी समूची संभावनाओं में मगर शहर हममें नहीं जीता. चंद सड़कें, कोई पुलिया, अस्‍पताल, डिपो, रिक्‍शे से दिखा कलक्‍टर का बंगला, एक पार्क यादों में उकेरता है शहर इतिहास से बाहर.
लोग कहते हैं तो याद पड़ता है अरे, हम भी तो रहे शहर में..

In the city and out of it
I have lived in Patna, strolled outside Mona talkies, walked to Gandhi Maidan nibbling peanuts, wandered aimlessly on dakbangla road but never found time to visit Khudabaksh library. It is said that in terms of handwritten manuscript on Islam it is the world’s richest library. It is funny that I witnessed the poorness of the narrow bylanes near the library but never tasted the richness of the books inside. It is similar to my seeing the hoardings of Shyam beedi in Allahabad, of seeing the Vishwambhar cinema next to the bridge, of seeing the narrow lanes of daraganj and the seeping water from moss laden broken roofs but alas never being able to see Allahabad from the gently swaying boats on the sangam.
A few friends and a dozen books widen the horizon but to go beyond the destitution of mind and values is an intense complex complication. So many dreams are born but mapping it in detail reduces it to some cheap farcical joke. We are lost to ourselves like the empty packets of four square forgotten by the kiosk owner in his stocked dusty roadside shop, we are lost in our being. We exist in our completeness of being in the city but the city does not exist in us. A few roads, some small culvert, any dispensary, a passing view of the shuttered bungalow of some government official, a park .. all these etched in memory hover outside the time frame suspended still
Its only when people talk about the city that one remembers, arre ? we also lived in this city once ?
***

दिन बीतते हैं..


शब्‍दों की पगडंडी हौले-हौले रस्‍ता उकेरती है दीखते-दीखते छिप जाती है. सोया रहता है फ़ोन जगता है फिर सोता है लम्‍बी ताने. दिन बीतते हैं.
पुलिंदे, चिट, चिट्ठि‍यां, कागज़ रहते-रहते फड़फड़ाते हैं, नयी ऊर्जा की चमक फैल जाती है कमरे में मगर फिर कितना तो धूल खाते हैं. दिन बीतते हैं.

हर समय बजता रहता है एक ख़ामोश सांगीतक. उठती हैं सांसें उतरती हैं, पुकारती रहती है कोई पुकार. दबे रंगों में सपनों का दीया टिमटिमाता है, बुझी-बुझी-सी लौ लपकती है एकदम उठी चली जाती है. दिन बीतते हैं.

त्‍वचा का स्‍पर्श बदलता है, हड्डि‍यां कहती हैं देखो, हमारा क्षरण हो रहा है. हंसी-हंसी में देह कांपती है. पैर निरखती आंखें कहतीं अभी तो कहीं निकले भी नहीं, अभी तो भूगोल समूचा अनछुआ पड़ा, अभी तो बीती है बस एक रात एक लाख एक हज़ार रातों में.

किसी उजबक़ बैल की-सी हारी पनीली आंखें हड़बड़ाकर हटती हैं सड़क से, देखती पलटकर धीमे यह कैसा समय बन्‍दूक की गोली की तरह धायं-धायं दगता चला जाता है. दिन बीतते हैं.
कोई नक़ाबपोश दबे पैरों आता है चुपचाप, गठरी खोल दिखाता है खेल, मंत्र बुदबुदाता है जाने किन भाषाओं में और वैसे ही गायब हो जाता है. चुपचाप.

कहीं जलती है आग कहीं बहती है शराब. दिन बीतते हैं.

बीतती है रात, एक दिन खुलता है..


The days goes by..
The dusty lanes of words now visible now hidden, carves a pathway, the phone slumbers then awakens, falling asleep again in a deep sleep, the days goes by..
Heaps of paper, chits, letters and notes rustle amidst a lethargy, a new energy is born, shining and shimmering in the room, but still gathering so much dust, the days goes by..
Music plays all the time, a silent orchestra, a breath rises then falls slowly, someone harkens, a yearning call. A dream flickers in faded colors, the half burnt flame leaps and reaches out suddenly, the days goes by..
The feel of the skin changes, the bones call out, see we are decaying. The body trembles in mirth. The eyes look at feet not travelled an inch, the entire terra remains unexplored, only one night has been lived in a million nights
Like a dumb defeated bull ‘s the watery lost eyes shift their glance from the road, turn and look back, how the day gets spent furiously like a fast moving bullet, the days goes by..
A masked man stealthily approaches, opens the bundle to show some trick, chants a mantra in god knows what archaic tongue and disappears as silently
Somewhere a fire burns, somewhere the wine flows, the days goes by..
The night is spent and a day unfolds.
***

3 comments:

  1. Its only when people talk about the city that one remembers, arre ? we also lived in this city once ?
    ***
    So true!!!

    I don't know how to say thank you for the great favours that we are blessed with in life!
    Coming here has been a blessing!

    चरणस्पर्श प्रणाम!

    ReplyDelete
  2. "बीतती है रात, एक दिन खुलता है.."
    ***
    आज इस पंक्ति के साथ दिन खुलने की आश्वस्तता लिये जा रहे हैं!

    ReplyDelete