Wednesday, July 25, 2012

हे जॉर्ज, अमरीकी, स्‍टैंड-अप..

देश के भूगोल में अवस्थित एक जीवन की कितनी कहानी होती है, सिर्फ़ उतना भर ही नहीं होती जो विकी बताती है, या स्‍वयं व्‍यक्ति बताता दीखता है. क्‍योंकि बहुत बार तो परिस्थितिगत ठंसाव में व्‍यक्ति विशुद्ध कविता हुआ जाता है. हमारे तथाकथित अधिकारों के शमशान को, भगवान को सिर के बल खड़ा करता, या टंगी जाती भाषा के बाहर खड़ा उसकी टांग खींचता.. ओह, स्‍टुपिड पिपल, एरोगैंट सफ़ेद पिपल, ओ पैनिकी, पथेटिक पैरेंट पिपल..

Sunday, July 22, 2012

छूटती, किताब..

रहती तो ढेरों, उनकी गिनती का अंत नहीं, मगर असल वाली, मन के भीतर घुमड़ती बिछलती, भागती रेल की खिड़कियों से क्षण भर को अपना रुप दिखाके, भड़भड़ाते पीछे छूटते पुल के शोर के पार पेड़ों, जंगल के उतरते तिलिस्‍म में फिर अपने को छिपाये जाती, असल बहुरुप शैतान, हाथ कहां आती. जैसे मन हमेशा साथ रहता. छोटी लाईन के पटरियों से लगी गिट्टि‍यों पर सावधानी से पैर धरने के इशारे बताता, भीड़भरे उजड़े प्‍लेटफार्म की स्‍थूल निर्मम, महीन (प्रकट एक-एक और छिपी हज़ार) उदासियां गिनाता, उन्‍हीं अंतरंग उदासियों में कुछ बहुत खुद भी नहाये हुए, मुंह पर रुमालधरे मुस्‍कि‍याता, लजाता, मगर मन की ठीक-ठीक दशाकथा क्‍या है किस पेड़ पर रहती और किसके थाल में कब खाती, कभी कहां बताता. पिटे मौसम औ’ अव्‍यस्थित जीवन की धार छाती के भीतर हड्डियों में किसी घबराये कफ़ सी बजती, मानो कोई पुकारता हो दूर से. चीख़ खखारकर संवारती हो, दबी हुई नजीके से. वास्‍तविक बरसात के वास्‍तविक अंधेरों में तिलिस्‍मी धूप खिली होती, और कोई बच्‍ची अंग्रेजी में गिनती गिनती होती, जैसे कोई संगीत धीमे-धीमे अपनी टेक गुनता हो, फूले पन्‍ने रह-रहकर नमी में सिहरते कांपे जाते, मलिन मन सिनिकयाये बाजा सुनता कि, अच्‍छा, हां, यही है? दुष्‍टा किताब वहीं कहीं होती मगर हाथ नहीं ही आती.

Sunday, July 1, 2012

जोगी ओ हो जोगी..

(एक नये लिखैये का उदय तो क्‍या हुआ, उनसे नई-नई पहचान हुई, पता चला हमारी तरह यह भी खुद की और भाषा की टहल में भटकते निकले.. उसी भटकन का इक ज़रा नमूना है, कहते हैं कविता है, मैंने कहा, अच्‍छा? मगर, प्रियबर, हम तो नहीं जानते कबीता. ख़ैर, जोगिया पीएस.)


कितना पुराना काठ का पुल ये, इसके बीच कैसे सुनसान कौन कितने दरार. मैं उतना ही पुराना जितनी पुरानी यह धूलधंसी सड़क. नीले आसमान पर उड़ता एक अकेला चील, हूंकता अबोला बार-बार, बंधु, किस देस, हो कौन दुनिया. धुंध की पीठ पर सवार हवा, छूती कहती ये सलेटी सांझ, कितना दूर पसरी कभी इस मन से विदा पाएगी. नहीं गाये का संगीत अभी इस रास्‍ते और कितनी दूर बजायेगी. काठ के तीन अथिर फूल और दो बिचारे कुंहलाये पाथर, टिहुकते टोहते, निकलती, चढ़ती जाती रात, कब आएगा हमारा मुसाफ़ि‍र.

मैं लिखता रहूंगा फूंक धूंकता, सारी रात गुज़री सुबहू तलक, जाने किसकी भाषा में.