Sunday, July 1, 2012

जोगी ओ हो जोगी..

(एक नये लिखैये का उदय तो क्‍या हुआ, उनसे नई-नई पहचान हुई, पता चला हमारी तरह यह भी खुद की और भाषा की टहल में भटकते निकले.. उसी भटकन का इक ज़रा नमूना है, कहते हैं कविता है, मैंने कहा, अच्‍छा? मगर, प्रियबर, हम तो नहीं जानते कबीता. ख़ैर, जोगिया पीएस.)


कितना पुराना काठ का पुल ये, इसके बीच कैसे सुनसान कौन कितने दरार. मैं उतना ही पुराना जितनी पुरानी यह धूलधंसी सड़क. नीले आसमान पर उड़ता एक अकेला चील, हूंकता अबोला बार-बार, बंधु, किस देस, हो कौन दुनिया. धुंध की पीठ पर सवार हवा, छूती कहती ये सलेटी सांझ, कितना दूर पसरी कभी इस मन से विदा पाएगी. नहीं गाये का संगीत अभी इस रास्‍ते और कितनी दूर बजायेगी. काठ के तीन अथिर फूल और दो बिचारे कुंहलाये पाथर, टिहुकते टोहते, निकलती, चढ़ती जाती रात, कब आएगा हमारा मुसाफ़ि‍र.

मैं लिखता रहूंगा फूंक धूंकता, सारी रात गुज़री सुबहू तलक, जाने किसकी भाषा में. 


3 comments:

  1. 'मन रे अनागावल ई गीतिया ,तोहके गावे के पड़ी। चढ़िके अग्नि-पंथ के रीतिया -मन-बढ़ पेंग बढ़ावे के पड़ी ।'

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