Sunday, July 22, 2012

छूटती, किताब..

रहती तो ढेरों, उनकी गिनती का अंत नहीं, मगर असल वाली, मन के भीतर घुमड़ती बिछलती, भागती रेल की खिड़कियों से क्षण भर को अपना रुप दिखाके, भड़भड़ाते पीछे छूटते पुल के शोर के पार पेड़ों, जंगल के उतरते तिलिस्‍म में फिर अपने को छिपाये जाती, असल बहुरुप शैतान, हाथ कहां आती. जैसे मन हमेशा साथ रहता. छोटी लाईन के पटरियों से लगी गिट्टि‍यों पर सावधानी से पैर धरने के इशारे बताता, भीड़भरे उजड़े प्‍लेटफार्म की स्‍थूल निर्मम, महीन (प्रकट एक-एक और छिपी हज़ार) उदासियां गिनाता, उन्‍हीं अंतरंग उदासियों में कुछ बहुत खुद भी नहाये हुए, मुंह पर रुमालधरे मुस्‍कि‍याता, लजाता, मगर मन की ठीक-ठीक दशाकथा क्‍या है किस पेड़ पर रहती और किसके थाल में कब खाती, कभी कहां बताता. पिटे मौसम औ’ अव्‍यस्थित जीवन की धार छाती के भीतर हड्डियों में किसी घबराये कफ़ सी बजती, मानो कोई पुकारता हो दूर से. चीख़ खखारकर संवारती हो, दबी हुई नजीके से. वास्‍तविक बरसात के वास्‍तविक अंधेरों में तिलिस्‍मी धूप खिली होती, और कोई बच्‍ची अंग्रेजी में गिनती गिनती होती, जैसे कोई संगीत धीमे-धीमे अपनी टेक गुनता हो, फूले पन्‍ने रह-रहकर नमी में सिहरते कांपे जाते, मलिन मन सिनिकयाये बाजा सुनता कि, अच्‍छा, हां, यही है? दुष्‍टा किताब वहीं कहीं होती मगर हाथ नहीं ही आती.

3 comments:

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  2. असल वाली की तलाश पर जारी रहती है

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  3. किताब ना हुई किसी की दुष्ट याद हो गयी...

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