Saturday, August 25, 2012

मेलनि लॉरें और जीवन का नमक..

क्‍या किया दो दिन, कि कितने बहुत सारे दिन? (मगर मेरी पीठ पीछे ब्‍लॉग क्‍या करती फिरी? फेसबुक की दीवार पे टंगी चिप्पियां झांक आई, शर्म से चेहरा गिरा लिया, और उसके बाद? बाद के सूनसानी अकेले में?)..
क्‍या करता रहता है आदमी सपनों की जागी नींद में? अख़बारों के बेमतलब चिद्दू वक्‍तव्‍यों व सिब्‍बली स्‍टेटमेंटों की व्‍यर्थता के बाजू खड़ा ऊबते रहने, व ऊबअनंतर जम्‍हाइयां लेने के बाद? मोज़ों की गिनती करने बैठ जाता है, या इतिहास के गंदे जांघियों की सिलवन समझने? कोई लिलियाना कवानी क्‍यों बनाती है ‘नाईट पॉर्टर’ जैसी कोई तक़लीफ़देह और जंजाली फ़ि‍ल्‍म, इन्‍नात्जि़यो सिलोने का ‘ब्रेड और वाइन’ क्‍या बताता है, याकि पाठक को जातीय मानस के गड्ढों में और ज़्यादा उलझाता है? न जानते हुए आदमी अंधे कुएं में रहता है और जानने के बाद खुद को फटी आंखों चमकदार कुएं में पाता है?
बिगिनर्स’ के आखिर में कहानी शुरु होती है, कि उसके आगे फिर एक अंधेरा आंख खोले इंतज़ार करता खड़ा होता है; मेलनि लॉरें की उम्‍मीद (द अडोप्‍टेड) मारजन सत्रपी की उम्‍मीद कहां बनती है, आदमी खुद को खत्‍म करके ही संतापमुक्‍त होने की निश्चिंतता पाता है; मगर फिर ‘ज़ोहरा की जन्‍नत’ का एक दूसरा पाठ भी है, जैसे लवलेस की ‘नमक’ का है, या राहुल भट्टाचार्य के गयानाइ पागलपने का.. परिवेश आदमी को बनाती है (जैसे हिंदी सिनेमा को कसाईखाना और प्रेम की जलेबी बनाये रहती है), आदमी परिवेश में मगर (मोज़े और जांघियों की गिनती से अलग) क्‍या बुनता है?
आदमी जागे की नींद में जो करता हो, मैं सोये की जाग में मेलनि लॉरें के ख़्यालों की उंगली थामे मगर कहीं कहां पहुंचता हूं? गोल्‍डी हॉन कहती है तुम चाहो तो मेरी तरह एक, दो, तीन सहज स्‍वस्‍थभाव सैक्‍सलेस, अस्‍वस्‍थ मुदित-प्रसन्‍न रह सकते हो, या डडली मूर की तरह संगीत व सवालों में डूबे.. थामी हुई उंगलियां मेलनि लॉरें की हों भी तो, अंत उसका मोज़ों व जांघियों की गिनती में ही होगा.. दो दिनों से (या कितने बहुत सारे दिनों से) मैं क्‍या कर रहा हूं, शायद मन ही मन वापस गिनती ही सीख रहा हूं..?

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