Monday, October 29, 2012

घर वापसी, बिना शीर्षक

इतने शहरों से निकलकर कितने गांवों को बनाती, उनसे पल्ला छुड़ाती कहां-किधर घुमाती धकियाती, हादसों और हौसलों के दीये-बाती जलाती, बुझाती छकाती छुकछुकाती है रेल. कितनी नींदों में उनींदियाया कैसी में जागता, हकबकाया किस अंधेरे में उतरता आंखें मल-मलकर संभलता आदमी, कलछुल, तसला, कडा़ही आंवड़े का झोला, बाजरे का बोरा, चप्प़ल पर जैराम के फूफा के फैक्टरी की कीच, जेब में मौसी की चुन्नी की बिसरायी फोटो, कितने झंझों से छूटकर, सत्रहवीं मर्तबा टूटकर, पहुंचता ठीया, चैन और क़ि‍स्मत का फ़रेबी जुआ, हाय, हासिल पर प्रेम से हाथ फिराता, आदमी मुस्कराता कि देखिए, लौटकर आदमी घर आता ही है.

Sunday, October 28, 2012

कैचिंग द हर्ट..

बहुत दिनों बाद ऐसे ही, किसी बचकाने संदर्भ के बहाने, इधर ब्‍लॉग पर टहलने आया और एकदम एक अटपटे संकोच और शर्मिंदगी में घिर गया हूं. मानो रात के साढ़े ग्‍यारह के बाद, अपने नहीं, किसी अजनबी घर के दरवाज़े घुसा आया हूं और 'द एक्‍सीडेंटल टुरिस्‍ट' के विलियम हर्ट के किरदार को मन में दुबारा जीवंत करने के इशारे बुन रहा हूं. विलियम हर्ट की याद है? कि कुछ नहीं करते दीखते के सामान्‍य, सहजभाव में, महज़ अपनी उपस्थिति से ही कितना कुछ किरदार में जोड़ते चलने की एक ख़ास अभिनय शैली जो भले आदमी ने अपने करियर के शुरुआत से ही विकसित की थी? 'चिल्‍ड्रन ऑफ़ अ लेसर गॉड' का उत्‍फुल्लित वधिरों का मास्‍टर आमतौर पर परिचित हर्ट चरित्र नहीं, उसकी सहज पहचान उसके एक्‍सीडेंटल टुरिस्‍ट होने में ही है. ब्‍लॉग के मुहाने एक गोड़ टिकाये मुझे खुद अपना अभी यहां होना भी कुछ वैसा उतना ही एक्‍सीडेंटल लग रहा है, नन-कमिटल, हूं लेकिन समूचा कहां हूं, ऑस्‍टर के स्‍मोक की तरह वास्‍तविकता के बीचों-बीच सर्रियल..

विकी के सलिंजर वाले पेज़ पर ऐसे ही एक नज़र गई, देखकर सकते में रहा कि 1951 में पहली मर्तबा छपी 'द कैचर इन द राय' की अभी भी सालाना दो लाख पचास हज़ार कापियां बिकती हैं, सोचने वाली बात न भी हो मैं सोचता रहा हिंदी में कितने लेखकर होंगे जिनके साहित्‍य-निधि की समूचे जीवन में इतनी बिक्री हुई हो.. ! न सोचनेवाली बात की तरह अभी बहुत समय तक माथे में, एक्‍सीडेंटली, यह बात घूमती फिरेगी कि कुछ प्रकाशकों का घर चलाने और कुछ लिखवैयों को पुरस्‍कार सधवाने से अलग, हिंदी का साहित्‍य-समाज कैसा हवाई कल्‍पनालोक है, जिसके वास्‍तविक प्रत्‍यक्ष समाज से कैसे, किसी भी तरह का कनेक्‍ट नहीं.. (दीवाली के विविध साहित्यिक विशेषांक आ रहे होंगे, कृपया फेसबुक पर लपक-लपककर बताना शुरु करें कि कहां, किधर-किधर आपकी कविताएं छपकर आ रही हैं! हद है..)