Monday, October 29, 2012

घर वापसी, बिना शीर्षक

इतने शहरों से निकलकर कितने गांवों को बनाती, उनसे पल्ला छुड़ाती कहां-किधर घुमाती धकियाती, हादसों और हौसलों के दीये-बाती जलाती, बुझाती छकाती छुकछुकाती है रेल. कितनी नींदों में उनींदियाया कैसी में जागता, हकबकाया किस अंधेरे में उतरता आंखें मल-मलकर संभलता आदमी, कलछुल, तसला, कडा़ही आंवड़े का झोला, बाजरे का बोरा, चप्प़ल पर जैराम के फूफा के फैक्टरी की कीच, जेब में मौसी की चुन्नी की बिसरायी फोटो, कितने झंझों से छूटकर, सत्रहवीं मर्तबा टूटकर, पहुंचता ठीया, चैन और क़ि‍स्मत का फ़रेबी जुआ, हाय, हासिल पर प्रेम से हाथ फिराता, आदमी मुस्कराता कि देखिए, लौटकर आदमी घर आता ही है.

6 comments:

  1. चलिये, अन्ततः घर पहुँच ही गया..

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  2. स्‍वर्ग से सुंदर अपना घर होता है ..

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  3. तस्वीर और गद्य (कविता) दोनों सुंदर

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  4. समाजशास्‍त्र में भी एक कथन है 'When one has nowhere to go, one goes home'

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  5. लौटना जितना अद्भुत होता है उतनी ही अद्भुत यह \बिना शीर्षक\ पोस्ट!

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