Friday, December 27, 2013

गर्म हवायें
















ले-देकर कुछ यही आया है अपने हिस्‍से
जबान, ज़मीन, और दुनिया में होने की धकियायी तमीज़
मालूम नहीं कैसी जबान है, और कितनी, किसकी ज़मीन
तमीज़ तो नहीं ही है, अंड़सायी रेल में बैठने को जगह खोजती है

होगी हरियाली, इन्‍हीं ज़मीनों पर कहीं होगी
सावन के आंखवाले देखते होंगे
जैसे इतना सारा मतवालापन बोलते होंगे
जंगले पर और अपनी सीढ़ि‍यों में मुझे तो बस धुआं दिखता है

रोज़ आंखें खोलकर जाने कैसा जहां दिखता है

हालांकि यह भी सच है कि मुज़फ़्फ़रनगर में हमारा कोई सगा खदेड़ा नहीं गया
हमारे सब सगे जहां हैं चैन के दड़बों में गुटर-गूं गाते औंधे पड़े हैं
हम भी पांच लोगों के समाज में दिल का हाल सुना, खुद को बहला आते हैं
और किसी ज़ाफरी परिवार को हुई होगी, हमारा परिवार ऐसे किसी तक़लीफ़ में नहीं है
यह और बात है बहुत वर्षों पहले हमने किसी सलीम मिर्जा का तक़लीफ़ में मुस्‍कराना देख लिया था
और अमिना, सिकंदर, बाकर मियां का हंसना, बतियाना, सांसत में आना सब अपने घर की बात लगी थी
दादी जान का पस्‍तहाल घर छोड़ते की कोठरी में खुद को छुपा जाना भी अपनी दादी-सी पुरानी

दिल को मरोड़नेवाले कुछ किस्‍से जाने किधर से घुसे आते हैं
जबकि खुद को बचा लेने का इतना पुख्‍ता इंतज़ाम हमने कर रखा है
ज़ाकिया ज़ाफरी, ओ जी, आप चुपचाप हल्‍ला नहीं कर सकतीं
कुछ नहीं सूझता तो चुपके चचा ग़ालिब को एक पुरची पठाइये
हमें तो अपने रोने-गाने में खिंची मत लाइये, ले-देकर आपके हिस्‍से
जो आया है, उसी धुयें में चलाइये, गर्म हवाओं में ज़माने को मत जलाइये. 

Friday, December 20, 2013

मुंह का स्‍वाद तुम कहां हो, या मंज़िल, ही..

“मटर-गोभी की तरकारी, कटहल व्‍यभिचारी, ये जो मुंह में गया, इसके बाद, भइया? मुंह के गड़हे के कारखाने में इनकी पोरसेसिंग सुरु होगी, पेट के लैबरेट्री में रसायनिक धूम-धड़ाका होगा, उसके अनंतर गोभी कटहल जहां ले आये रहे, हुंएं चहुंप जायेंगे, उसका अगवा का होगा, भइया?“ मोहन कुमार पुलकित और ज़रा-ज़रा सशंकित सवाल के धूप को जाड़े की अलसायी छांही पर थोड़ा आगे तक फैलाकर ह‍थेली पर खैनी पीटने की तैयारी में उत्‍साहीमदन होते बहलने लगे.

“पीछे-पीछे खैनी की पिचकारी चहुंपाये की तइयारी त कइये रहे हैं?” जसोदानंदन आंखों-आंखों मुस्कियाते लजाता हुआ व्‍यक्ति कितना लाल हो सकता है के अभिनय में खुद को सजाने लगे.

“खइनी के बीस मिनिट आगे पान का पाता है, दू घंटा आगे मुरई के पाता के पकौड़ी है, सिंघाड़ा अउर गुड़ के जलेबी है, मुंह के करखाना को कवनो रेस्टिन है, मरदे?” कहकर संकर चलित्‍तर हंसने लगे, उनकी देखादेखी दूसरों की बहक में मोहन कुमार की देह भी मचलने-हिलने लगी, हाथ की खैनी, हाथ में ही मचली अपने गंतव्‍य तक पहुंचने की राह तकती रही..

मेरा कोई गंतव्‍य नहीं था. कभी नहीं था. बहुत वर्षों पहले एक तमिल मित्र ने टेलीपैथी पर सवाल किया था सिंगापुर में कारों की सेल्‍समैनी की नौकरी में बझा हूं, ऋषिकेश टलहने जा रहा हूं, तुम आ रहे हो? मैं बहुत पीछे अतीत में रज़ाक टाकिज़ के संकरे कंपाउंड में नासिर हुसैन की ‘कारवां’ के भीमकाया पोस्‍टर-निहारन, और लगातार दूसरे ‘दिन टिकट नहीं पा पाये’ के मार्मिक दु:ख में मलिन हो रहा था, मचलकर जवाब दिया था, मुझे मेरा गंतव्‍य मालूम नहीं, राजू, आ नहीं सकता, तुम सिंगापुर, सियाटल, सोनभद्र, सावाकावी, जहां जाकर अपनी मंज़ि‍ल पानी है, पाओ, मुझे मत बहकाओ, प्‍लीज़.

यह ऐसे ही नहीं होता कि अभी भी हर तिमाहे के घनघोर असमंजस के बिमरहा घोड़े की जर्जरस्‍त पसलियों को टटोलता हुआ कंपकंपायी मं‍ज़िल की ओर निकलता हूं, रास्‍ते में ब्ल्म्पियाती कोई किताब बहकी उतरी आती है, डेढ़ और अढ़ाई अटपटायी इशारे करती है, और मंज़ि‍लोसंधान का मेरा सारा डेढ़ इंची कार्यक्रम इधर-उधर ध्‍वस्‍त संत्रस्‍त हो जाता है.

मुंह के गड़हे में स्‍वाद की नदी अपने को खोल निर्वस्‍त्र करती, उन्‍मुक्‍त सुंगंधियान करती, फिर अंततोगत्‍वा कहां निकल जाती है, मैं मंज़ि‍ल से बाहर, बहुत दूर पीछे छूटा, अपने को फिर वही पुराने आसनसोली मनोहरपु‍री रेलवे यार्डों व चाय की करियायी चूल्‍हेवाली गुमटियों पर फिर-फिर क्‍यों पाता रहता हूं? जबकि जागकर देखने को जलसाघर है, तलघर की घरघराती ख़ामोशी में सोये-सोये पहुंचने को जापान है, चिल्‍लाने और बचाने को स्‍त्री और कामरेड का अपमान है, हकलाता और अपने को बनाता, गर्विला अज्ञानी विज्ञान भी है?

जीवन तुम कहां हो, मैं मंज़ि‍ल के साथ नहीं, तुम्‍हारी गलबंहियों में कहीं पहुंचने के लिए नहीं, बस साथ टहलने के लिए आया हूं, मगर तुम हो कहां, ऊपर हरिद्वार किंबा सोमालिया, सुडान के आसमान में, या चीले की अपनी बहली, भटकी हुई पौलिन गार्सिया की ग्‍लोरिया की भड़कीली, अकेली रातों के संगी बने हो, या मेरी उंगलियों के पोर पर चमकते, गायब बैठे हुए हो, कमज़ोर आंखों से सिर्फ़ मुझे दीख भर नहीं रहे?

Sunday, December 15, 2013

आसपास, लिखना..

(heather murray के ब्‍लॉग से)
मैं जब नहीं लिखूंगा, तब भी खुद को चुपचाप लिखता हुआ ही मिलूंगा. वह लिखना, हो सकता है, मेरी पहचान मेरी ज़बान का न हो; ख़यालों, आकारों, चेहरों को किन्‍हीं सलीकों में व्‍यवस्थित करने की कोशिश करता, समय और स्‍मृति के बीहड़ में अपने को फैलाकर, खोकर, फिर दूर तक ढूंढ़ते फिरुंगा..

लिखने का कुछ हासिल न होगा, लिखना देर रात का चुपचाप गुनगुनाना होगा, रात के सुनसान और अकेले के अनुसंधान में, भोले कवि और अलसाये ईश्‍वर के ‘आयेंगे अच्‍छे दिन!’ की भावुकताखोर लोरियों के बाजू, टहलते दूर निकल जाने, कटहल, खीरा, झीरपानी, बोस्निया, कुर्द, लेबनॉन, मुनव्‍वर, मुज़फ्फर के तसव्‍वुर में याद करना कि दुनिया में होना, तक़लीफ़ों के किन सिलसिलों में होना है..

लिखना हमेशा मुश्किल सवाल करेगी, दिल मरोड़नेवाली ज़ि‍रह, कि बीमारियों की बुनावट जानते हो, दुनिया देखने का सुथरा चश्‍मा है तुम्‍हारे पास, भाषा बुनने का साफ़ पंचांग? पैर के नाख़ून धुले हैं, आत्‍मा में अंजोरा है, जड़ें अपनी साथ लेकर आये हो? मैं हकलाता, अ‍कबकाया कहूंगा जड़ के बाज़ार बसता हूं, उनींदे के नेट में, दुर्जड़ें बहुत दूर निकल गई हैं, हालांकि यह भी सच है कि जर्जरस्‍त हूं..

लिखना एकदम से खुद को अजनबी कर लेगा, जैसे शहर की भीड़ और यातायात में मेरी ज़बान स्‍वयं को संभालने के जतन में उछलने, घबरायी भूलने लगेगी, जैसे लंबे सफ़र के बाद रेल से उतरकर मैं फिर से खुद को ढूंढ़ने लगूंगा, लिखना हौले से नन-कमिटल मुस्‍करायेगी, जैसे पूर्व-प्रेम शौकीनी में धोखियाता है, अब मिलते नहीं, आकर मिलो न कभी? मैं उम्‍मीदबर कांपता सिहरुंगा, अंधेरों में एक कदम आगे और रखूंगा.. 

Thursday, December 12, 2013

शिद्दत वाली यादें..

भूपिंदर का 'रुत जवां, रुत जवां' इसी फ़िल्‍म में था
यादें दवाई की वे पुड़ि‍यां हैं जो ज़रुरत के वक़्त नहीं मिलतीं, और किसी उस पेंसिल की तरह तब मिलती हैं जब उससे लिखने की आदत छूट गई हो. रंजीता दी हंसते हुए कहती, शिद्दत से यादें क्‍या होती हैं, शिद्दत से तो हमने बस बलराम के फुचके खाये हैं, या रज़ाक टाकीज़ के पीछे जयराम की कुल्‍फी; उस शिद्दत से तो फिर हमने शादी भी नहीं की..

मौसी से मनुहार करता हूं, मौसी, तुम बताओ. आंचल से सूखा मुंह पोंछकर मौसी कहती है, शिद्दत से, बच्‍चा, हम सीवटर और बड़ी बनावत रहीं, गोड़ में आलतो लगवाइल करीं, शिवरात के समय ऊहे जतन से उपासो करत रहीं, मगर जब से इनके एक्‍सीडेंट हुआ, अउर कार्तिक के पढ़ाई गड़बड़ाइल, हमरे सब जतन पे जइसे पाला पड़ गईल, बच्‍चा..

दीवानापन भी प्रेम की एक टेक है, सबके हिस्‍से नहीं आती. और जिनके आती भी है, उनके यहां भी गोद में हाथ डाले बैठी नहीं रहती, चुपचाप किसी दिन निकल जाती है, फिर आप उसे बस की अगली सीट पर बैठे किसी चेहरे में खोजते रहते, और किसी दीवाने फिल्‍म में देखकर भावुक होने लगते हैं. मैं शिद्दत से याद करने की कोशिश करता हूं बचपने के नंगे पैरों में हवाई चप्‍पल कब आया था, रेकार्ड प्‍लेयर पर अपने हाथों संभालकर एहतियातत से प्‍लेयर की सुई कब चढ़ाई थी और उस शुरुआती घिस-घिस की आवाज़ के तनावी इंतज़ार के बाद स्‍वरों की एंट्री से कैसा चमत्‍कारी आह्लाद हुआ था, कब हुआ था, जेब के अपने पैसों से पहली मर्तबा रंग कब खरीदा था, टुकुल को कैसे कहते सुना था कि मुझसे प्‍यार नहीं कर सकती, उसे दुर्गापूजा में ममेरी बहनों के पास मनोहरपुर जाना है.. और देखता हूं, मुझे कुछ भी याद नहीं!

रज़ाक टाकीज़ की तंग गलियों के पार जालीदार टिकट खिड़की, सिनेमा तक जाने के लिए ऊपर की ओर संकरी सीढ़ि‍यां, बच्‍चों के नंगे पैरों और औरतों की रंगीन साड़ि‍यों वाला चिल्‍ल-पिल्‍ल मचाये समूचा बिहराती कुनबा, ‘गंगा मइया तोहरे पियरी चढ़इबो’ और ‘अमर प्रेम’ में मां का मुंह पर साड़ी दाबे भल्‍ल-भल्‍ल रोना, सेक्‍टर चौदह में सिंघड़ा-बड़ा-जिलेपी की एक अस्‍बेस्‍ट्स के छत वाली घिसी, करियाये चूल्‍हे की दुकान थी, जिसका उम्रदराज़ बौना मालिक हमेशा पुरानी एक काठ की कुर्सी पर बांहवाली गंजी और नीले चारखाने की लुंगी में मंद-मंद मुस्‍कराता, अख़बार पढ़ता मिलता, और उसके यहां की सिंघड़ा और जिलेपी खाकर मुंह पर उल्‍टे हाथों से स्‍वाद पोंछते, हम बाहर स्‍टैंड की साइकिल निकालकर हवाओं को अपनी आंखों पर लेकर सोचते दुनिया इतनी, कितनी अच्‍छी है न टुकुल, और फिर वह सब गुज़रती हवाओं, बीसियों चोटों और पचासों यात्राओं की बहसबाजियों में कहीं लुप्‍त हो जाता और शिद्दत से फिर यही याद रहता कि शिद्दत से कहां कुछ याद है!

लिली कहती है बाहर जा रहे हो, लौटते में दवाई लेना मत भूलना. मैं कहता हूं, शिद्दत से याद रखूंगा.

(उपरोक्‍त गिनाये सभी नाम व किस्‍से, शिद्दत के हों, मगर पूरी तरह गल्‍प हैं)

Tuesday, December 10, 2013

एक मानवोचित, ललित क्षुद्र निबंध..

मनुष्‍य ने देह खुजाना कब शुरु किया? क्‍या यह उसके नागर होने के बाद की व्‍यथा है, या पेड़ों और जंगलों के निवास में ही उसे खबर हो गई थी कि ये सारे जंगल एक दिन डेवलपर्स की आस्‍तीन में घुस जायेंगे, खुजली, हरामख़ोर, कहीं नहीं घुसेगी, हमेशा उसके साथ रहनेवाली है? खुज-खुज-खुज का प्राचीन, चिरकालिक, परिचित खरखराता राग, ओह, मगर शुरु कब हुआ? और मैं नाक और कान व अन्‍य रंध्रप्रज्ञ गवेषणाओं की यहां नहीं कह रहा, वह प्रज्ञा शुद्ध सांस्‍कृतिक भारतीय विशिष्‍टता है और इस सभ्‍यतायी उठान व उड़ान में अल्‍बानिया किंबा अमरीका कहीं हमारे आगे नहीं ठहरते. जैसे श्‍यामवर्णी शिकाकाईयुक्‍त लंबे केशधारण में. मनोहारी कृष्‍ण हों या व्‍यभिचारविमुक्‍त राम, भेड़-बकरियों के बीच स्‍वयं को विवर्ण कर रहे जीसु (या मोहम्‍मद ही) क्‍या खाकर (निश्चित ही भेड़ व बकरियों के भक्षण से नहीं) उन केशों को मुकाबला करेंगे? बिलासपुर से लेकर त्रिचूर तक छपे सभी रंगदार पोस्‍टर्स इसका साक्षात जीवंत प्रमाण हैं. इन निर्कलंककारी केशों का मगर प्रसाधन कब शुरु हुआ? मालवायी मिट्टी, हैदराबादी मेंहदी या गुरुवल्‍ली के निलंबुरस धन की निश्चित आश्‍वस्ति थी, मगर राम (किंबा कृष्‍ण) को शैम्‍पू-संज्ञान ठीक-ठीक कब हुआ? या नहीं ही हुआ? श्‍वेतवर्णी शकुंतलाओं को जान लिये, श्‍यामवर्णी रहस्‍याचूड़ शैम्‍पू जानने से रह गये?

मनुष्‍यप्रिय ईश्‍वर ही क्‍यों, मनुष्‍य तक कितना कुछ जानने से रह जाता है. बहुत बार तो यह तक जानने से रह जाता है कि मनुष्‍य है. डेंटिस्‍ट की कुर्सी चित्‍त लेटे, मुंह बाये, मन ही मन भीषण घबराये वह नाजी भूखंडों की उर्वरा यहूदी खाद बना अकुलाया, मचलन में विह्वलता है, मनुष्‍यता में कहां रहता है? यहीं फिर इसकी जिज्ञासा लौटी आती है कि डेंटिस्‍ट्री का ही महक़मा कब अपने प्रापर रंग में आया, एनेस्‍थेसाइज़र कब शांति का पैग़ाम लेकर आये? उससे पहले की भयकामी दुनिया का मिज़ाज कैसा था, लोग दांत के डाक्‍टर के पास गरदन जिबह कराने के किस, कैसे उत्‍साह से जाते थे? या रबर से खिंचवाकर दांत उखड़वाने के मार्मिक ख़याल से खेलते हुए, खेलते-खेलते मानवीय भोलेपन में, बजाय डाक्‍टर से मिलने के, कमरे में रस्‍सी लटकाकर उससे झूल जाते थे?

मगर मनुष्‍य ने (जिलेबी खाना नहीं) देह खुजाना कब शुरु किया? या सिर ही..?

Wednesday, December 4, 2013

बकलोलपुर..

फोटो: निर्मल पोद्दार
स्‍टील की कटोरी में सरसों का तेल, तकिये के बाजू धरी चालीस वर्षों पुरनकी- काम की- हाथघड़ी और एक बेकाम नोकिया का नयका सेल (जिसको ठीक से बरतना वह अभी भी नहीं जानते थे, न ही जानने की दिलचस्‍पी रखते..), महकव्‍वा जर्दे की डिबिया, सरौता और एक पनबट्टा (जिसमें सिर्फ़ सुपाड़ी रहती), सफ़ेद अंगौछा और घिसा नीला हवाई चप्‍पल, जदुनंदन बाबू कहते सत्‍तर साल पहुंचकर अब यही है जो है, इससे बाहर का, बच्‍चा, कुच्‍छौ हमारी पहचान में नहीं आता. फिर भारी खरखराती सांस खींचकर सुस्‍ताने की तसल्‍ली के बाद जोड़ते, देखे-जाने की अऊर जरुरते क्‍या है?

टप्‍पू की अम्‍मां और जदुनंदन जी की श्रीमती जब तक थीं, टप्‍पू के बहाने दिल्‍ली तक देख लेने की ज़रुरत बनी रहती. उनके उठ जाने के बाद फिर बाबूसाहब ने जैसे मुंह सी लिया, आंखों पर बिनोद बिहारी मुकर्जी वाला अदृश्‍य काला चश्‍मा चढ़ा लिये. खटिया पर चुप्‍पा मारे पटाये रहते. एक पांत में दस-बारह गेंदे के बड़हन पौधे थे, पहले उनके बगल टहलते-टहलते हथेली में सरौता दाबे जो सुपारी कतरा करते थे, अब खटिये से उठने में संकोच मार जाते. टप्‍पू दिल्‍ली से गांव आकर दुखी होता कि माइक्रोवेब लाकर रखे थे कि आसानी हो जायेगी, उसका बाबूजी यूजो नहीं करते हैं! फ़ोन की घंटी बजती रहती है, फ़ोन तक नहीं उठाते हैं, ऐसे थोड़ी होता है, मरदे?..

भतुआ के तरकारी बनवा दें, बाउजी, खाइयेगा?..

वृजमोहन कानपुर की तरफ के हैं, वह पूछते हैं, भाई साहब, यह भतुआ क्‍या हुआ?

झिलमिल के पेड़ के नीचे लुंगी सहेजता, उकड़ूं बैठता मुन्‍ना यादव गरदन बायें फेर, निशाने पर दू मर्तबा थूक की पिचकारी गिराने के बाद उनकी जानकारी में इजाफ़ा करता है, आपके ओर उसको सफेद कोंहड़ा बोलते हैं, हमरे यहां वहीये भतुआ बोलाता है!

और यह जो डेढ़ हाथ भर लहराती सरसों दिख रही है, यह कब तक तैयार हो जायेगी?..

वृजमोहन जी के पिता आसनसोल रेलवे की नौकरी में थे, वह खुद यूपी हैण्‍डलूम में खजांची रहे हैं, खेती से उनका दूर-दूर तक वास्‍ता नहीं, लेकिन ऐसे सवालों को पूछते हुए चेहरे पर आ गई गंभीरता के भाव से उनकी पुरानी मुहब्‍बत है.

रघुवंशी की नौ साल की बिटिया अंकिता को उसके दिलीप चाचा ने सिवान बाज़ार से लाकर नया-नया ट्रैक पैंट दिया है, तीन दिन से लइकी वहीये देह पर डाटे उसकी चिंथाई कर रही है, घुटने पर दौरी में बथुआ काढ़ती आजी के पास पहुंचकर पूछती है, ई पचफोरन का होला, आजी?

विमल तिवारी ढेला फेंककर सुस्‍ताती, पेट से, कुतिया को चिंचियाने और भागने पर मजबूर करता, कहता है, एक से एक बकलोल है, साला, तुम लोग देखे हो, सुदमवा के हियां बियाह में कल रात सब का गंध मचाया सब?

Saturday, November 16, 2013

सुभौ-सुभौ..

कैसी घरबराहट मची रहती है लेकिन. कि नचाकर देखो उंगलियां नाच रही हैं कि नहीं, हाथ अभी यहीं तो था फिर उठ क्‍यों नहीं रहा, पैर साथ हैं, कि छूटे.. (दिमाग तो बद्तमीज़ खुद को दो हाथ की दूरी बनाकर दूर किये ही रहता है!).. बीच सुबह खड़े होकर टटोलना फिर कि सुभो, तुम कहां हो? मुंह सिये चुपके से पुकार लेना तमन्‍ना, तुमि आछो तो?.. फिर गमछी, कुरता और हवाई चप्‍पल सहेजते हुए जेसुदास को गुमसुमाये गुनगुनाने लगना, ऐ मेरे उदास मन (मुक्तिबोध को नहीं).. ओह, कैसी तो घ-र-ब-रा-ह-ट..

एक मीठे-से अमूर्तन के बीच खड़े रहकर फीके गुलाबी में भींजे, नहाये अचानक फिर महसूस करिये कि अमूर्तन ही अमूर्तन है, मीठा तो हुआ लापता.. फरार.. घर छोड़कर भागा दुष्‍ट!

बॉदेलियर की कविता की ज़रा-सी ताप बची रहे.. शर्ट के सामनेवाली जेब में नहीं तो पतलून के पिछलकी में ही सही? तनि-तनि मुस्कियाने, तसल्‍ली में गोड़ हिलाने वाली मुक्तिबोधन बीड़ि‍या, बली रहे? आत्‍मा में पामुक की फटी आंखों का कौतुक चौंकन्‍नापन, ओनोरे की तीनसौसाठ डिग्री का गर्हित, मार्मिक घुमायमान, प्रूस्‍त का घनत्‍व और मिलोराद पाविच का धीर?..

अंड़से झोले में अरमान, थके अंड़से रहते.. इतनी-सी ऐंठ भी मगर साथ अंड़सी, रहती.. छुक-छुक छूटती रेल के तंग संकरे कारीडोरों में बच्‍चा ठुनकता हुलसियाये भागे जाता, और फिर उसके पीछे-पीछे भागी आती, ओह, कैसी तो घ-र-ब-रा-ट-ट..

Saturday, November 2, 2013

फिर बैतलवा डाल पर..

photo: nirmal poddar
दिवालों[1] का नाम न पूछो. दूर से धोखा हो सकता था, पास हूं मैं अब तो पहचानो, प्‍यार से देखो, काम[2] तो पूछो. या छोड़ो, जाने दो, मत पूछो, क्‍योंकि कुछ भी पूछोगे, हमें दिवालों से सिर पटकाये रोना अच्‍छा लगता होगा. किसको कैसर पत्‍थर मारूं, कौन पराया होगा, शीश-महल में इक-इक चेहरा अपना लगता है, या होगा. जैसाकि बार में अपना जीवन शुरु करके बार-गीतों को जगत्प्रिय मचल-बहल में गूंथ देनेवाले राजकोट, गुजरात के दिवाला सिंगर पंकज उधास ने बहुत पहले धीर-गंभीर कभी कहा ही था. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना. जैसे कुत्‍ते का काम है भौंकना, स्‍टेटस का काम है फेसबुक पर दांत चियारे सकारे-सकारे चढ़ना. बेबात गंभीरली हियां-हुआं के फेंकना. जैसे दुनिया के सबसे बड़हन सहीबाज यहीये हुए. मां कसम. अल्‍ला कसम भी..

ऐसे ही नहीं है कि मीर साहेब ने चुपके से बगल बचाकर फेंका होगा, “अश्‍क आंखों में कब नहीं आता / लहू आता है जब नहीं आता।” या सरकार के पहुंचे हुए मुलाजिम बाग़-ए-बेदिल[3] की दीवारों को पढ़ने की बेसबब कवायद में गुम गये होंगे. बुढ़ौती में लता ताई फूल और तारों की फोटुएं खींचने की बजाय, जाने क्‍यों गुजरात की ओर देखते हुए इकतारा पर मोदी हमारा छेड़ रही हैं. मगर बुढ़ौती की बेचैनियां हमेशा श्रीयुत श्रीश्री रविशंकरों के भजन ही कहां गवाती हैं, कतिपय हैरतनाक कारनामे भी छेरवाती रहती ही हैं; जैसे रहते-रहते मैं घबराकर जब किसी षोडशी को प्रेम-पत्र न लिख रहा होऊं, जापानी वीर-बालाओं के फोटू देखने निकल ही लेता हूं, लता माई गुजरात के गजराज के ख़यालों में विह्वलने लगें, भला क्‍यों ताज्‍जुब हो. नहीं होता. कम से कम मुझको नहीं होता. अलबत्‍ता आशा ताई गाये लगती हैं, ‘चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया,’ उससे बेतरह तक़लीफ़ जरूर होने लगती है. पता नहीं क्‍यों होती है. आपको पता चले तो बताइयेगा.

अदरवाइस, दिवाला मुबारक.

[1]. दिवाले: एक परिप्रेक्ष्‍य, निजी, पारिवारिक, सामाजिक, प्रादेशिक, राष्‍ट्रीय, वैश्विक; सुमति कुमार चटुपार्ध्‍या, सन्‍मार्ग प्रकाशन, कलकत्‍ता, 1918.
[2]. देखें, विकि पृष्‍ठ: http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AE. विकिपीडिया देखने के ख़याल से घबराहट होती हो तो यू-ट्यूब पर सीधे ‘एन इवनिंग इन पैरिस’ की संवरायी कामोत्‍तेजनाएं भी देख सकते हैं.
[3]. कृपया एक नज़र मारें (कृपया, नज़र ही मारें, गुलेल न मारें): http://kabaadkhaana.blogspot.in/2013/10/blog-post_1831.html

Friday, September 13, 2013

भाग लइका भाग..

तीन स्‍केच हैं, छोहाड़ा कुमार अंकुर राय के लिए हैं, आज उनके जलमदिल रहा..




Thursday, September 12, 2013

फुटनोट और मैं..

फुटनोट के बारे में क्‍या कहूं. कहता ही रहा हूं. बहुत सारी जगहों कह चुका हूं[1]. कभी-कभी लगता है जीवन में नोट का अभाव अवचेतन में आघातों का तीव्र आलोड़न जगाकर मुझसे फुटनोटों के बाबत लिखवाता रहा है[2]. इसीलिए कभी-कभी यह भी लगता है कि आसपास गिरे नोट होते और तेजी से आगे बढ़कर उसे फुट के नीचे छिपा लेने की होशियारी होती तो फुटनोट पर चिंतन करने की यह अनावश्‍यक बौद्धिक अदा छांटने की ज़रुरत न पड़ती. कम से कम मुझे तो नहीं पड़ती[3]. गहरे शोक का विषय है कि हिन्‍दी समाज के मनीषी इस पर क्‍यों नहीं चिंतन करते कि चिंता हिन्‍दी समाज की प्रकृति व परम्‍परा के कितना ही अनुकूल क्‍यों न हो, चिंतन नहीं है. परम्‍परा में है न प्रकृति में है. दिल्‍ली उत्‍तर व दिल्‍ली दक्षिण दोनों ही स्‍कूलों में नहीं है. न ही इसके पहले इलाहाबाद, बनारस या पटना स्‍कूलों की ही इस रौशनी में चिंतित देखने की बात सामने आई है. और वैसा चिंतन तो कतई नहीं है जो फुटनोटों के आसरे चिंतित दिखे[4].

देखनेवाले देख सकते हैं कि लम्‍बकाय व दीर्घकाय जितने भी कायपुरुष हुए हैं, हिन्‍दी समाज से बाहर जाकर हुए हैं. दृष्‍टव्‍य हैं बंबई में भारती, विश्‍वभारती में एचपी द्वि‍वेदी, पंजाब में सहीवा के उदाहरण, ये सारे महिषी फले, हिन्‍दी समाजों के बाहर जाकर ही फूले. इसके विपरीत श्री एएल नागर[5] की गिरती काया के ऐतिहासिक ह्रास की समीक्षा करिये, वह इसका साक्षात प्रमाण हैं कि लखनऊ पहुंचकर लेखक काया बनाता नहीं, गंवाता है. संभवत: यह भी एक प्राथमिक कारण है कि हिन्‍दी में गप्‍प लेखन व पद्य लेखन का ऐसा प्राचुर्य क्‍यों है. इसीलिए है कि लिखनेवाला ठीक से नोट पायेगा नहीं तो अपने को बहलायेगा काहे में[6]? फुटनोटीय चिंतन के लिए इसकी भी प्राथमिक आवश्‍यकता होती है कि चिंतक का एक फुट पुस्‍तकालय में हो और जेब में इतने नोट हों कि नेहरु मेमोरीयल लाइब्ररी की कैंटीन में उच्‍चमध्‍यवर्गीय[7] लंच[8] का आनंद उठा सके, और तनाव-रहितावस्‍था में उठा सके.

हिन्‍दी का नोटहारा लेखक पहले फुट को पहचानने व फुटवीयर पहनने की कला में पारंगत हो उसके तदंतर ही संभव होगा कि वह फुटनोट को अपने चिंतन में शामिल कर सके. तब तक फुटनोट पर यहां मैं और वहां भी सिर्फ़ मैं ही होऊंगा जो चिंतन कर रहा होऊंगा[9].

[1] . देखें ‘जननी-जागरण’ शरदीया अंक, 1933; ‘माखनलाल द्वि‍वेदी समग्र’ की भूमिका, परकीया प्रैस, मथुरा.
[2] . देखें मेरी ‘जीवन में नोट का अभाव किम्‍बा फुटनोटों की प्रस्‍तावना’, प्रयाग पुस्‍तक मंदिर, अल्‍लापुर, 1969.
[3] . ‘क्‍या बिना बौद्धिकता छांटे दलित उत्‍थान संभव नहीं?’, राजेंद्र यादव नंदन स्‍वागत समिति सम्‍भाषण, मथुरा, 2003. (भाषण के ठीक बाद हालांकि अच्‍छा जुत्‍तम-पैजार हो गया था. कई चोटें हैं जिनका स्‍मरण अभी भी मेरे कर्ण केशों को खड़ा कर देता है!)
[4] . मगध साहित्‍य सम्‍मेलन, 1933 से 1941 की प्रोसिडिंग्‍स के प्रोजेक्ट पेपर्स; प्रयाग साहित्‍य सम्‍मेलन के भी, वही.
[5] . ‘पराये मुलुक में क्षत-विक्षत होता सोच व शरीर’, श्री नागर से मोहनलाल सागर की निजी बातचीत के गुप्‍त टेप, परकीया विशेषांक, सीतापुर, 1981.
[6] . ‘हिन्‍दी का लेखक कहां कमा रहा है, और क्‍यों नहीं कमा रहा है’, इटावा साहित्‍य संसद की वार्षिक रिपोर्ट का प्राथमिक नोट, जून, 1991.
[7] . ‘भारत में वर्ग विश्‍लेषण’, श्रीपाद अमृत डांगे, का. मनोहर पब्लिकेशंस, 1936.
[8] . देखें रितेश बत्रा निर्देशित ‘लंच बाक्‍स‘, 2013.
[9] . ‘कितने नावों में कितनी बार: फुटनोट और मैं’, वर्धा ब्‍लागयज्ञ महासम्‍मेलन, अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य, 1996.

Wednesday, September 11, 2013

भूख: एक लघुव्‍यथा

हमेशा भूख लगी रहती है. बच्‍चा मां से पूछता है, मां, हमेशा भूख क्‍यों लगी रहती है? भूख से धुंधलायी (कुम्‍हलायी, संवरायी, लजायी, तो पहिले से ही) मां बिना सोचे कहती है, बाबू, हम नंगे लोग हैं भूखे लोग हैं, भगवान ने अइसही गढ़ा है हमको, अच्‍छा है भूख लगी रहती है, भूख नहीं लगती तो पाला मारता. सरदी में कठुआये तुम कुड़कते रहते, आग और कोयला खोजने मैं किधर जाती!

बच्‍चे ने जोर डालकर अपने लिए दिमाग में भूख की एक आरामदेह तस्‍वीर बनाई. दुनिया में जाड़ा है बरसात है गरमी में सन्‍न करनेवाली हवायें हैं, बीसियों और जाने क्‍या-क्‍या आपदायें हैं, लेकिन बिलबिलाती भूख कितनाहूं आंखों में अंधेरा भरती हो, है उनसे कम बड़ी विपदा है.

बोरे के नीचे से और खड़ंजी साइकिल के पीछे से भागती खजुआइन, बिमरीआइन बिल्‍ली की बच्‍ची पर नज़र जाते ही बच्‍चे ने उसे लपककर गोद में ले लिया और उसे दुलराने लगा. बिल्‍ली की बुचकी, मुंह ऊंचा किये उम्‍मीदबर नज़रों से बच्‍चे को ताकती, अलग-अलग स्‍वरों में ‘म्‍याऊं’ बोलकर उस तक अपनी गुहार पहुंचाती रही. बच्‍चे ने बुचकी को समझाया कि वह समझ रहा है किस हूक के दबाव में वह कूक रही है, लेकिन भली पुचकी, यह भी समझ ले कि अल्‍ले अल्‍ले अल्‍ले, रे बल्‍ले, भूख सबसे बड़ी बला नहीं है, दुनिया में और भी ग़म हैं भूख के सिवा..

कुत्‍ता खुद से और अपनी भूख से चिढ़ा हुआ था. बच्‍चे की पुरानी पैंट चबाने के बाद उसने उसकी कम पुरानी इकलौती चप्‍पल चबाने की कोशिश की और जवाब में उछलकर आते एक जूते की चोट का शिकार हुआ. बाद में मुंह पर और घाव पर जीभ फिराता सोचता रहा भूख की चोट फिर भी जूते की चोट से कहीं ज्‍यादा थी.

दायें-बायें ढुलुक-बुलुक होते और कभी-कभी तो खड़े-खड़े यूं ही गिर पड़ते अपने पिल्‍लों को संभालती सूअर तो भूख से इस कदर बेजान थी कि कभी सोचती कि मैं कुछ सोच पा भी रही? छै के छै ये सभी मेरे हैं? क्‍या सोच रही थी जो मैं इन्‍हें गर्भ में ले आयी, और अब दुनिया में चले आये हैं तो कहां जा रहे हैं? भगवान तूने कैसी दुनिया बनाई कि हमें सूअर बनाया, हमारी तक़दीर पर गरम पानी उंड़ेलने के बाद ऊपर से अलग से हमको भुक्‍खल भी बनाया, रे नीच? मंदिर में घुसकर तेरा प्रसाद खाऊं, पाजी, क्‍या खाऊं?

बच्‍चे ने बकरी के मुंह से खींचकर उन पत्‍तों को चबाने की कोशिश की जिन्‍हें वह मुंह में भूख का मुंह चिढ़ाने को सजायी थी, मुंह में पत्‍तों का ज़रा-सा रस चला आया लेकिन फिर झट कड़वाहट से उसे ऊबकाई-सी भी आई. उसकी देखा-देखी बिल्‍ली की बुचकी ने भी ज़मीन पर तीन लोटे लिये, और आह का मन ही मन लम्‍बा विलम्बित आलाप लेने लगी. कुत्‍ता भूंकने की कोशिश में किंकियाता रहा, फिर भिन्‍नाने लगा. देह पर आकर बैठती मक्खियों को झटककर हटाने की ताकत भी न रही. बच्‍चे की मां ने आठवीं मर्तबा सूखे हलक और उबलते पेट को मटके के पानी से ठंडा करने की कोशिश की और गश खाकर गिरती-गिरती बची.

गोद में बिल्‍ली की पुचकी को संभाले बच्‍चा मां के करीब आकर फुसफुसाकर बोला, दुनिया में बीस बड़े आपदा हैं, भूख तो सबसे छुटकी पुचकी विपदा है, न मां?

Monday, September 9, 2013

जो कभी करीब आता नहीं..

औरत कहती है जब खोजती हूं दिखता नहीं, जब चाहती हूं मिलता नहीं.. मैं कहता हूं आवाज़.. सिर्फ़ आवाज़ जिसे पकड़कर, जिसके सहारे मैं कूद आऊं अंधेरे से रौशनी में.. किसी दिलदारनगर के चोटखाये बाशिंदें अपनी शर्म और तक़लीफ़ में बजते फुसफुसाते हैं निजाम के खेलों में यहां सिर्फ़ हमारे बेमतलबी की आवाज़ें हैं.. मुल्‍क और उसके चोटिल वक़्तों के भरभराते मकान की गर्द में गुमी सुख की तलाश हमको, आपको अपनी खोजों में कुछ पलों को, भूले दिनों में, दीवाना बनाती रहे, सुखी कैसे बनायेगी.. तैरता-सा कोई सुर आयेगा, और कुछेक समय के लिए गूंजता भले रहे, मगर फिर जल्‍दी ही छूट-छूट भी उसी, उतनी ही आसानी से जायेगा.. 

एक पुरानी कहानी थी कभी की.. उसी की गांठ जोड़ रहा हूं.. 





अपने से पहले सपने से में जो क्षण दिखा होगा ओह, कितनी बड़ी संगत होगा..

इस मुनिया को, धनिया को, बहेलकी को, खेलकी को, पुचकी को, बुचकी को अपने बाजू खड़ा करना चाहता था, कि देर तक देखता रहूं कि वह दूर तक कैसे देखती रही है.. कि उसकी उतरायी की पीठ पर, मानो किसी मध्‍ययुग से खींचकर जो गदह-वृंद की ढुलुर-ढुलुर लयकारी है, उसे बजता, व प्‍यात्‍ज़ा के हौले-हौले के बहल जाते तारों का खिंच जाना सुन सकूं; पत्‍थरगली की पसराहट व पुराने किस ज़माने के मकानों की चोटखायी दुलराहट गुन सकूं; दिखे कि एक क्षण में जो दिखता है वह अनंत में जाकर वापस स्‍वयं को किन नज़रों पलटकर देख लेता है, बुचकी मुनिया उस अनंत को किन नज़रों देखती है.. सेर्जो लारेंन की आंख पर चढ़े, खुद मैं उन्‍नीस सौ उनसठ की अपनी बहेलकी की संगत में, अपने को अपने जन्‍म से पहले कैसे देख ले रहा हूं!

जिस ज़बान में समय होगा मेरी वह ज़बान नहीं होगी

foto: jorge henriques




















कोई एक कहानी होगी, मगर
कहानी से ज्‍यादा गाना होगा
जिसके करीब पहुंचने को खूब जोर मारूंगा
पहचानी बसों और जानी सड़कों के शॉर्टकट से उस तक पहुंचने से बचूंगा
बटुली छीपा थारी, दुआरे की धूप और धानी आसमानी साड़ी के पहचाने सहारों से
सूंघकर देखूंगा वह बजता क्‍या है जो हवा में है, सुन रहा है सुनो
ग़ौर से सुनो तो कितना-कितना कुछ सुन पड़ता है, अभी भी रह रहा है
सुन सुन सुन, मैं सुन सकूं मगर क्‍यों वैसे मेरे कान नहीं हैं, संगीत कितना-सा है
मद्धम सप्‍तक विलम्‍बि‍त का पूरा अजायबख़ाना
लेमनचूस ज्‍यूस और जै कलकत्‍तेवाली का पूरा धातिनताना है
मगर जिसे हंसते हुए बुला सके संगत में गुनगुनाते पूरे वाद्यवृंद को
घूमते हुए गा सके, क्‍यों वैसी मेरी ज़बान नहीं है
अलग-अलग ज़बानों की कहानियां हैं खानों की
पुरानों की फ़सानों की, मुरचा खाये जीवन, सात औ' सत्रह संधानों की

समय की वह जो ज़बान होगी उस गाने की क्‍या कहानी होगी
जिसके करीब पहुंचने को इतना जोर मारूंगा.

Sunday, September 8, 2013

ऐसी की तैसी का भजन

स्‍त्री दु:खकातर होगी क्‍या करुं
घर के बच्‍चे मेरी सुनते नहीं
बच्‍चे गाल फुलायेंगे अरे, आप तो
देखने को इतना है खरीदने को कितना
गोद में बेमतबल किताब लिये क्‍या करें, क्‍या पायेंगे, मम्‍मी प्‍लीज़

किताब लज्‍जा में सिर झुकायेगी, बेमतलब ऐसे ही हुई हूं
बेचारे बच्‍चों का क्‍या कसूर जब सारे संस्‍कार ही मतलबी हुए हैं
संस्‍कृति मतलब की हुई है, मतलब ही संस्‍कृति हुई है

लातखायी, अपना हासिल पायी संस्‍कृति कहां खड़ी होगी
जो कुछ कहेगी, साधुजी के पिछवाड़े पड़ी होगी
झोंटा व उसकी साड़ी थामे चेलागण
अखाड़ों में खड़े होंगे, बाल व अपनी बवालों पर अड़े होंगे
साधुजी का रज व प्रसाद सचिवों, श्रीमंतों व श्रीमंत्रियों
की फुलवाड़ि‍यों में पड़ा होगा, सजता सहलता सुलगता

संस्‍कृति जब ऐसे साधुमार्ग चलेगी व ऐसी फुलवाड़ि‍यों में सजेगी
स्‍वाभाविक है समाज जुआड़ि‍ओं को व लोकहित झाड़ि‍यों को प्राप्‍त होगा
स्‍त्री होती रहे सेर भर दु:खकातर, पति उसका कट्टर संस्‍कृति भक्‍त होगा
आये अबकी चुनाव दिखा देगा कहां खड़ी है संस्‍कृति
और वह संस्‍कृति के सिर पर चढ़ा कहां खड़ा होगा.

Saturday, September 7, 2013

ब्‍लॉग के अच्‍छे दिनों की आत्‍मकथा

ओह, कैसे अच्‍छे दिन थे. कंप्‍यूटर के की-बोर्ड पर ‘अच्‍छा‘ और ‘दिन’ लिखकर देख लेने और दंग होते रहने के दिन थे. 'दीन' और 'लीखना' से चहकते हुए उठ लेने के दिन थे. हालांकि ढेरों गिरे हुओं के मचलने के दिन भी बने रहते. मगर मोस्‍टली फिसलते रहने के दिन थे. फिसलते हुए एक ब्‍लॉग से निकलकर दूसरे में पहुंच जाइये. ठहरकर किसी नीचे हुए अथवा नीच को समझाइश देने लगिये, ये क्‍या लीख रहे हो, नीचू आमदी? हमसे सिखके निहीं लीख सकती? चैट में बहकते हुए इनसे और उनसे पूछ लीजिये, आप भी यही लिख रहे हैं, तब हम घंटा क्‍या लिखें? गये-गुजरों की कमी नहीं थी, कमेंट के साथ-साथ कभी धृष्‍ठ कंटेंट ले उड़ते, चोरियों पर सुलगते कमेंटों की झड़ी लग जाती, ओह, झड़ि‍यों के कैसे सुलगते दिन थे!

तेज़ी से दोस्तियां हो रही थीं. लोग भूतपूर्व प्रेमिकाओं व अभूतपूर्व पत्नियों को भुलाकर दोस्तियों की अर्थात ब्‍लॉग की बातें कर रहे थे. पत्‍नी घर की बात करना चाहती तो बात की बजाय उसके हाथ में उसका ब्‍लॉग धर रहे थे. प्रेमिकायें दीवानी हुईं घूम रही थीं, जहां देखतीं, हरामी (कल तक जो अपने को प्रेमी बताते थे) अब सिर्फ़ ब्‍लॉग चर रहे थे. ओह, कैसा तो ‘मन रे बहका रे लहका’ का लक्ष्‍मीकांतीय उत्‍सवी समां बंध रहा था, और ढेरों हमारी तरह ब्‍लॉग-बरबाद थे जो मंत्र-विमुग्‍ध उसी में बंधे रहते. सभी इस बरबादी में दीक्षित नहीं थे, एक अच्‍छा-खासा धड़ा विवाद-लक्षित भी था, जो कमेंट-उच्छिष्‍ट की खोज में संवाद-पुष्‍करों को बड़ी आसानी से विवाद-दुश्‍करों में बदल डालता, व साढ़े एक सौ तेईस टिप्‍पणियों का अतिरिक्‍त (मोस्‍टली तिक्‍त) मुनाफ़ा बटोरकर चैन की सीटी बजाता अगले विवाद के अन्‍वेषण में निकल जाता! ओह, कैसे विवाद-विवर्ण दिन थे. रहते-रहते अचानक हिचकियां उड़ने लगतीं. इस ब्‍लॉग से निकलकर उसमें ऐलान होने लगता कि टिप्‍पणी हटा ली है, आपकी मर्जी हो तो ब्‍लॉग भी हटा लेंगे, घबराइये नहीं, आपको दिखा देंगे! दिखा देने और चौंककर देखते रहने के ओह, कैसे तो मनोहारी दिन थे!

उठते-बैठते, उड़ते-गिरते, रोते-आंख पोंछते करनेवाले ब्‍लॉग बैठकें कर रहे थे. अ और स और द घर से सब्‍जी खरीदने निकलते, सब्‍जी धरी रह जाती, खरीदनेवाला द और स आपस में, किम्‍बा किसी ब्‍लॉग-बैठक की लसड़-फसड़ में धराये जाते!

हर ब्‍लॉगित मन कवि हो रहा था. कवि ब्‍लॉगर न हो पाने के शोक में कवितायें पटक रहे थे. चालीस का पाला छूती ढेरों ब्‍लॉगकर्त्री थीं, प्रेम-पिपासाओं को पुर्नभाषित कर रही थीं. मुझसे प्रवीण ऐसी नव्‍य-भाषाओं व अतृप्‍त-आसाओं को पढ़ने व उनकी आंच में जलकर सब भूल जानेवाले अपने ब्‍लॉग से बाहर निकल-निकल जा रहे थे. ‘कोई दूर से आवाज़ दे, चले आओ,’ के उद्घोषों से ब्‍लॉगासमान प्रेमोद्भ्रांत था. इन्‍हीं मनोहारी दिनों की उदासियों के मीठे असर में होगा कि रहते-रहते ब्‍लॉग-बैठकों से उठकर मैं ज़रा-सा जापान और इंगलिस्‍तान हो आने के ज़हीन, संगीन, रंगीन सपने कातने व बुनने लगता, भावुक होकर इलाहाबाद पहुंचने किम्‍बा वर्धा हो आने से रह-रह जाया करता था. तात्‍पर्य यह कि भारतीय प्रेमिकायें ठीक थीं, बहुत बार बड़ी ढीठ थीं, मगर कुछ भी हो लेतीं, हिन्‍दी कविताओं के हिन्‍दी-युग्‍म से कभी कहां ऊपर उठ सकती थीं, इलाहाबाद और वर्धा कितना कुछ भी हो लेता, मगर जो था जितना गिरा हुआ था, उससे स्‍वयं को अलग कहां से कर लेता? जबकि टोकियो और टैक्‍सास और तेहरान व तियाननमन अभी भी संभावना थे. मेरे प्रेमिल हो सकने के लिहाज़ से थे ही. हालांकि रोकनेवाले रोक रहे थे, उनके अंतर में दुर्भावना थी, जबकि मेरे कोमल भावों का मक़सद महज़ कोमलाकांत पदावलियों की पुर्नरचना थी. ओह, पुर्नरचित होने के कैसे उत्‍खननकारी पुर्नजागरणीय दिन थे!

किंतु ऐसा नहीं कि उन दिनों संसार कतिपय ज़ुकरबर्गों की चालों, खंगालों और जो मिले, उठा लो, खा लो, पचा लो की गहरी संकीर्ण षड्यंत्रकारी योजनाओं से दुषित नहीं था. था, चाल चली जा चुकी थी, अंधेरे खुलकर विह्वल हो रहे थे, ब्‍लॉगों को अपनी आगोश में ले लेने को चंचल हो रहे थे, मगर इतिहास का अभी वह क्षण था जब ब्‍लॉग-ब्रह्म के पराक्रम में सीधे-सीधे सामने चले आने से ज़ुकरबर्ग दहल रहा था, मचल केवल ब्‍लॉग-विदुषियां रही थीं, क्‍योंकि हमारे फीड से उनका काव्‍यमन धन्‍य हो रहा था. यह तो कतिपय किंचित बाद में, अभी-अभी हुआ कि वह सारी निर्दोष कोमलकांती भावनायें क्षत-विक्षत, विवर्ण हुईं. मैं जापान जाते-जाते अंतत: जोगेश्‍वरी पूर्व में ही रह गया. वापस लीखने के दीन लौटे. मगर ओह, तब भी वे गये कमेंट फिर कहां लौटे? विदुषियां अपने विषों के साथ ज़ुकरबर्गी विक्षिप्‍तावस्‍था में लौटीं, अतीत के वे गौरववर्णी विविधरंगी काव्‍यक्षण फिर नहीं ही लौटे.

ओह, कैसे घुरों के गिरे दिन हैं.

किताब की अधूरी आत्‍मकथा

कहना मुश्किल है कि मेरी कहानी कहां शुरु हुई, मैं अस्तित्‍व में कैसे आयी. संभवत: मुझे बनानेवालों की ज़रूरतों, स्‍वार्थ, असमंजस, अकिंचन मूढ़ता वे मिले-जुले कारक रहे जिनके दबाव में होते-हवाते, लुढ़कती, प्रूफ की ग़लतियों व प्रैस की उधारियों में सींझती, अंतत: तंग गलियारे की बुझी रोशनी में, सुतलियों में बंधी, गिरी, मैं पैदा हो गयी! दुनिया में मेरे आने की कोई खुशी मनी हो, तो मुझे उसकी ख़बर नहीं है. खुशी तो मेरे स्‍वागत में मुझे मेरे लिखनेवाले को भी नहीं हुई. मुझे हाथों में लेकर तेज़ी से पलटते हुए पहली चीज़ जो उसके मुंह से निकली, वह ‘च्‍च च्‍च‘ के अनंतर अविश्‍वास, दर्द और गुस्‍से की ध्‍वनियां थीं. वह देर तक ‘ये सब कैसे हो गया, और इसके लिए मैं राजनाथ को बारह हज़ार और दूंगा? कहां से दूंगा?’ बुदबुदाता, मुझे पटककर फिर मेरे किसी हमशक्‍ल को उठाकर उसी हैरत से जांचता, और-और दर्द में नहाता रहा ओर आखिरहा, बिना मुझे साथ लिये, हाथ छिनकता उसी तेज़ी से बाहर निकल गया था!

मैं समझदार होती और दुनिया के मेरे कुछ वास्‍तविक (‍अर्थात कड़वे) अनुभव रहे होते तो उसी वक़्त मुझे अपने भविष्‍य की धुंधली, मटमैली, या ज्‍यादा स्‍पष्‍टता से कहें, गाढ़ी, सियाह तस्‍वीर दिख गयी होती. मगर मैं ज़ाहिल तो कॉफ़ी टेबल के स्‍नेह और तकियों पर गिरने के धृष्‍ठ शिशुवत सपनीली किलकारियों में सोयी हुई थी. कहां जानती थी कि जहां जाऊंगी वहां कॉफ़ी की टेबल तो क्‍या चाय की स्‍टूल तक नहीं होगी, और तकिये तो उससे भी कम होंगे जितनी घर में सोने की (असलीयत में लाख की) चूड़ि‍यां होंगी! और पहनने की नहीं देखने की होंगी, जैसे मेरे देखने को तकिया था!

क्‍यों मैं इस संसार में आयी, सचमुच, किसे मेरी ज़रूरत थी? इस देश में पहले ही प्रचूरावस्‍था में अभागी विपन्‍न कन्‍यायें नहीं? अपने जन्‍मदिवस पर जिस तरह मैंने लेखक को सन्‍न देखा था, वह अवसन्‍नता आज तक मेरी तक़दीर से बंधी हुई है. उस जघन्‍यता को स्‍वयं से छाड़कर में कहीं खड़ी हो सकती हूं? रोज़ इस उम्‍मीद में धूल झाड़कर, आह, फिर भी, खुद को खड़ी करती हूं कि शायद आज कोई चाहनेवाला सामने चला आये, उंगलियों से छू ले, हाथों में ले ले, गालों से सटाकर मेरे देह की बास ले, देखे अभी तक गंठी सटी हूं, या मेरी जवानी अतीत का क़ि‍स्‍सा हुआ!

कितने अरमान थे, कि विश्‍वविद्यालयों में यूं ही इठलाती, टहलती पहुंच जाऊंगी, पुस्‍तकालयों में लड़कियां मुझे देखकर जल मरेंगी, हिंदी के तो ख़ैर सारे अशिक्षित-अर्द्धशिक्षित हैं, तुर्की से कोई युवा आलोचक, आंखों में चमक और होंठों पर विस्मित हंसी लिये चला आयेगा और रहस्‍यभरी तनी नज़रों के हर्ष में फुसफुसाकर ऐलान करेगा, ‘यही तो वह किताब है जिसे मैं सारे जीवन खोजता रहा!’ चेहरे का पसीना पोंछती कोई मध्‍यवयी कीरगीज़स्‍तानी अध्‍यापिका कम आलोचिका खोजती आयेगी, चांदनी चौक या निज़ामुद्दीन जाकर दुष्‍टों-धृष्‍ठों से अवमानित-प्रताड़ि‍त होने की जगह, मेरे करीब आकर कहने लगेगी, ‘प्राथमिक शिक्षा के टेबल में जो हम सबसे गये-गुज़रे हैं, आप कहीं कम गुज़रे नहीं हो, हमारी नीचता में बस हमीं से ऊपर हो, मगर यह अमूल्‍य निधि ऐसी है कि हमारे यहां ही नहीं, आपके यहां भी पढ़ी जानी चाहिए!’ चीनी गुप्‍तचर एजेंसी की पोलित ब्‍युरो की केंद्रीय कार्यकारिणी का सब-सेक्‍शनिस्‍ट, अब रिवाइवलिस्‍ट, अवकाशप्राप्‍त हा द्वान हाथ बांधे आयेगा, अफ़सोस ज़ाहिर करेगा कि चीनी वामपंथ की दुर्दशा का दस्‍तावेज़ आज उतना ज़रूरी नहीं, न प्रमोद सिंह की अप्रकाशित चीन यात्रा की अप्राप्‍य पांडुलिपि है, जितनी सामने पड़ी यह किताब है, जिसे न केवल चीन में बल्कि तिब्‍बत, भूटान व नेपाल में भी उसी शिद्दत से पढ़े जाने की ज़रूरत है, जिस शिद्दत से वह पढ़ी नहीं जा पा रही! मगर क्‍यों नहीं पढ़ी जा रही? ऐसी नीतियां और किताबें हम क्‍यों, किसके लिए छापते हैं जिनके छप जाने के बाद उन्‍हें तैयार करनेवाला तक उनकी ओर नहीं देखता, इस दरमियान फिर वह क्‍या देखता रहता है?

कितने अरमान थे. कि इस्‍तांबुल जाऊंगी, वहां से ठुमकती पैरिस पहुंचकर गलीमार्द की कुर्सी पर पसरकर संस्‍कृति-नागर को सन्‍न कर दूंगी, फिर वहां से भागकर लंदन को बांहों में भर लूंगी कि न्‍यू यॉर्क के सारे बुद्धि-‍रसिक-वणिक जलकर खाक़ होते, ढाक के पात होते रहेंगे! सब धरा रह गया. मैं इसी धरा पर धरी रह गयी. ऐसा क्‍योंकर हो गया. सभ्‍यता-निर्मिति के इतने गूढ़ निहितार्थ हैं हमारी संस्‍कृति में, कागज़-निर्मिति का ऐसा सघन कारोबार है, क्‍यों है, दैनिक भास्‍कर व दैनिक अरनब टाइम्‍स की आपूर्ति व उनके फ़ायदे के बास्‍ते है? घरों में किताब की जगह बने उसका रास्‍ता बनाने के लिए नहीं है?

मैं थक गयी हूं. पक गयी हूं. ताज्‍जुब होता है कि इतनी तक़लीफ़ों के बावजूद कैसे है कि अभी तक छपी हुई हूं, पन्‍नों पर छितराये अक्षरों में बची हुई हूं. जबकि मेरे लिए सस्‍ती मारकिन की कुरती और एक सस्‍ता पेटिकोट खरीदनेवाला भी यहां कोई नहीं, मुझे अपने हाथों में लेकर खुशी का तराना गाये, ऐसा तो कतई नहीं. फिर भी हूं! कैसी हूं?

Friday, September 6, 2013

हे जी मिस्‍टर अड़े, खड़े..

पड़े मरे खड़े-खड़े ओरे अरे
हटो झुको परे फुटो हरे अरे
किधर चढ़े किससे लड़े होरे
कहंवा ले आये हैं जी अरे बड़े?

सटो सुटो कटो पिटो जरे जरे
हिलो खिलो हुआं मिलो भरे भरे?
अरे तोरे ओरे तेरे सरे सरे
खरे खरे परे परे अरे ओरे?
जीयरा बहिराइये खलिहे अड़े अड़े?
संडे ले मिले थे मंडो को
जी भेंटाइयेगा अइसहीं जड़े जड़े?

धत तेरे की धुत तिरी की
पटाइल मुरचाइल सड़े सड़े?
पांजा लराइयेगा जंगरा ले
जाइयेगा? पाइप ले चहड़ के
रोशनदानी में आइयेगा? गुडे मुड़े
तुड़े चिढ़े ओड़े पोड़े, आच्‍छा लागा
मीठा जागा? इनके खाट्टा उनके तीता?
होड़े हुंड़े तोंड़े टुंड़े मुड़े मुड़े हड़े हाड़े?

(एक पुराना पोस्‍ट था, उस पर नज़र गई, इच्‍छा की लतर चढ़ी, झोंक में ऐसे ही, झोंकाये, पिले पड़े, हड़े?)

इसको दबायें उसको हिलायें

इस पोस्‍ट पर राय देने के लिए उस पोस्‍ट को दबायें. दबाकर देखें ज़िंदा बचा है अभी चल रही है सांस, याकि ख़तरे की घंटी है, मुसीबत पैर पटकता दिखे तो पोस्‍ट की अम्‍मा को बुलायें. पोस्‍टों में संभलकर चलें, अम्‍माओं से भी संभलकर चलें. बहुत सारे बटन हैं, बटन बदल-बदलकर चलें. चलते रहें चलते रहें चलते चलें, पोस्‍ट पढ़ने नहीं देखने की चीज़ है, देख-देखकर खुद को हिलायें, देख लिया है बगलवाले को बतायें. देखें, पड़ोस में दिखें बाबा नागार्जुन तो बुलाकर उनको भी दिखायें, वो हंसने लगें तो हंसने की बात है जानकर आठ दांत आप भी दिखायें, एक ओर ज़रा-सा झूलकर चुटकुला हुये जायें, भूलकर भी ना लजायें, घूमकर फिर इस पीछेवाले बटन को दबायें, आगेवाले इस पोस्‍ट को हिलायें, पोस्‍ट फक़त बटन लग रहा हो तो मटन की आस में घबराकर फिर फलांगते हुए फेसबुक पर जायें. तेज़ी से आठ लाइक करें, पौने तीन को कमेंटियायें, तीन मर्तबा इस दरमियान अख़बार देखें, आठ बार टेली समाचार, तेज़ी से करते चलें विचार, फेसबुक पर क्‍या लायें, किसको जिला दें क्‍या हिला दें, चोट की चाम में क्‍या टांक दें, हुर्र-हुर्र होते हल्‍ले में खुद को कहां चांप दें. घबरायें नहीं, तीन अंगुल पीछे घूमकर फिर इस बटन को दबायें, इस पोस्‍ट की अम्‍मा को जगायें, करनी को कूट-कूटकर उसका फिर भजन गूंथकर, फेसबुक में उसकी कजरी गायें, रोना जब एकदम लाजमी हो जाये तभी अज़दक पर आयें.

Thursday, September 5, 2013

सिच्‍छक दिवस का चिथड़ा-कतरन..

वैसे सोचनेवाली बात है, यार-दोस्‍तों से बाहर जब पढ़नेवाला बीस-बाईस, और खींच-कांखकर पौने चार सौ की संख्‍या के पार न पहुंच पाता हो, आदमी कैसी अकुलाहट के कौन खजुवाहट में घरबराकर किताब छपाये पहुंच जाये.. और धंधे के बीच बाज़ार बैठा कोई गुणग्राहियो पर-प्रकाशक उसे क्‍या खाने और पहिनने की उम्‍मीद में छापे?.. (हमारे एक अदद ब्‍लॉग पोस्‍ट पढ़ाये में पाठक जो है, हींकने लगता, नज़र बचाकर छींकने लगता है, बेचारे का मन नहीं टिकता, जाने मन बाज़ार की कवन नवकी चीज़ में जाकर टंगा रहता है, या फेसबुक की इस टीप से उछलकर उस टीप तक पहुंचने में, और फिर सुनसान की उदासियों को खोये-खंगालने में चकमकाया-फ्यूजियाया रहता है, तो किस पढ़वैये के द्रोह में किताब खुद को खड़ा करेगी, कर सकेगी? किताब की ज़रुरत भी हिसाब से हो, सीधा-सीधी लिप के स्‍टिक की तरह मुंह रंगने, व साबुन की तरह दाग़ धोने के काम आये? किताब का कोई अजाना 'पथ' और 'पांचाल' न हो, चमक और बहक के उनींदे में नशीले निकल जाने के गाढ़े 'जंजाल'? गऊ सी सीधी हो, और प्रतिरोध के लाल-सी सफ्फा चटख़, और बस इतनी ही हो?).. सोच रहा हूं, यह भी कि बनानेवाले समाज, और समाज के टीचरानों ने मन का यह दलिद्दर लोक भी अपने उन्‍हीं हाथों बनाया है.. 

(फेसबुक की दीवार पर खींचा स्‍टेटस; फोटो बाबू सुब्रत बिश्‍वास का, साभार)

बीकास जो सुनाता है..

फोटो में विकास लउकता है, औडियो में सुनाता कइसा है. मालूम नहीं कइसन सुनाता है, हम सुने और सुनाई का दिग्‍गत से गुजर रहे हैं..


Wednesday, September 4, 2013

यहां खड़ी मत रहो..

foto: daniel berehulak
चौदह घंटों के सुनसान के बाद पंद्रहवें के धुंधलके में एक गाय की एंट्री हुई. मैं नींद में ही ब्‍लॉगर पर खौरियाया हुआ था, कि अबे, घंटा सर्विस चलाते हो, यू बकलोल डंब घेंवड़ा पीपुल, ज़रा-सा ट्रैुफिक हमारी ओर नहीं ठेल सकते? पांच साल से ब्‍लॉगिंग कर रहा हूं, गिनकर लोग ऐसे झांकने आते हैं मानो भोजपुरी में लैटिन की कबीता लिख रहा होऊं, और मुझको तो अपने पटकाये, छितराये होने की जो लज्‍जा होती हो, होतीये होगी, तू लोक को, हरमखोर मुंहजार, तनि लाज नहीं आती?.. तो मैं तो नींद का ही खौरियाया हुआ था, अब यहां जागे की रात थी, और सुनसान में जाने कब से चरने को राह तकती एक गाय का साथ था, छूटते ही लैटिन बरसाने लगा, अर्थात कविता गाने लगा-

इस रात इतना अंधेरा है यहां खड़ी मत रहो / जाओ देखो कहीं और खड़ी करो कोई और रात / इस रात का अकेलापन अड़ा है बहुतै बड़ा है / रहने दो इस रात को हम साथ कर सकते थे जैसी किसी बात को / इस रात बहुत अंधेरा है यहां खड़ी मत रहो.

ज़ाहिर है गाय अगर लैटिन जान भी रही थी तो भी अपनी जगह अड़ी, वहीं खड़ी रही. गुस्‍से में मैं पानी-पानी होता, चीख़कर फ़ेन फेंकने लगा, अबे, तुमको शरम नहीं आती, आकर अकेले में खड़ी हो जाती हो, जबकि ‘मास’ और ‘मूवमेंट’ हरमेसा प्रतिरोध की विद्रोही कविताओं के बाजू खड़ा हाथ हिलाता, मुंह बजाता, दिखता है? गाय ने भरी जवानी नथुनों के आस-पास कुपोषण और नैतिक व बौद्धिक दलिद्दर में निकल आये मूंछों को छुपाते, किंचित लजाते, कहा, जिनके पास फुड सिक्‍युरिटी होगी, भैया, मैं उनका नहीं जानती, हमारे पास तो कोई क्‍युरिटी नहीं है, हम कहां जाते के असमंजस में यहां आकर खड़े हो गये, आपको तकलीफ हो रही हो तो मुंह हटाकर कौनो और दिशा में खड़े हो जायेंगे? दशा नहीं बदलेगी, जानते हैं..

पिटे हुओं की चोटखायी का जो एक क्षीण, टूटा-टूटा-सा बिरादराना होता है, उसकी भावुकता से दबा, मैं कातरभाव गाय के नज़दीक आकर उसके कान सहलाने लगा, तुम भी, यार, मालूम नहीं समझ कैसे लेती हो कि हम तुमसे रार करेंगे, इसलिए कि नथुनों पर तुमरे मूंछ है और हमारी तिलकुट एस्‍थेटिक्स को चोट पहुंचेगी? मगर क्‍या है वह जिसको देखकर नहीं पहुंचती रहती, सच्‍चो, बताना? अफ़ग़ानिस्‍तान की एक एगो बुचकी के फटियारेपने को देखकर नहीं पहुंचती? या कैनेडा के इस ज़रा-सा भोलेपन को देखकर? पचीस करोड़ के भुक्‍खल मुंह को खियाये के पीछे जो पइसा खरच होगा, गुड़गांव में पांच हज़ार फ्लैट की कीमत के बराबर होगा, फिर भी इस मुलुक का अमीर मानस है ऐसा-ऐसा गंधाइन बोलता है मानो भुक्‍खल मुंह उसका जमीर नहीं, इस देश का कैंसर हों! हमको चोट नहीं पहुंचती?

"The question of what the Food Security Bill will cost though is indeed a highly aggravated one. Defenders of the Bill say the government is already spending Rs 90,000 crore on food subsidy: expanding the net of beneficiaries will cost an additional Rs 30,000 crore. This, they argue, is not something India cannot afford. Rs 1.2 lakh crore on securing food for one’s citizens amounts to only 1.2 percent of the country’s GDP. How can one grudge that when one compares this with other subsidies?

Development economist Reetika Khera, for instance, points out that tax exemptions given to Indian industry in 2012-13 alone amounts to a whopping Rs 5 trillion. India’s fuel subsidy — much of which is enjoyed by the rich — is approximately Rs 1.6 lakh crore. Tax breaks given to the gold and diamond industry in the last year is Rs 60,000 crore, nearly 20 percent of the revenue forgone. (For perspective: this industry employs 1.8 million people, which is less than 1 percent of the Indian workforce. The Food Bill would benefit 67 percent of the population at merely an additional cost of Rs 30,000 crore. ) The list could go on. The point is, shaving just a little from all this would help balance the books.

Or reverse the gaze. Examine the scams: just the irrigation scam in Maharashtra is worth Rs 70,000 crore. Tax evasions from private mining companies would cross many trillion. Why not urge government to fix this? Why is it that the market can withstand this waste with stoicism, but it panics at the prospect of providing food?

There are robust answers for many of the other fears the Bill triggers too. For instance, it is absurd to imagine that getting a mere fistful of rice in one’s belly every night is going to kill India’s aspiration and turn it into a lazy society. Can one really argue that India’s poor will not work towards better clothes, shoes, schooling and living standards for their children, because they have allayed the basic gnawing in their stomach?

As for India’s capacity to produce foodgrain: in good monsoon years, almost 700 lakh metric tonnes of foodgrain lie rotting in warehouses or in the open. If you laid these sacks out in a row, it would cover one million kilometres: a road to the moon and back. Often, rather than distribute this successfully to its poor, the government exports it at a loss to other countries to feed cattle and pigs.."

इसको और उसको पढ़कर, क्‍या सोचती हो, हमें तकलीफ़ नहीं पहुंचती? ऐसे ही तुम्‍हारे मोह और मुहब्‍बत में इस रात और उस रात की कबीता का खाका खेंचते रहते हैं?

गाय जाने कब की भूखी थी, मुझे क्‍या सुनती. मेरे पास भी उसे खिलाने को क्‍या खाक घास थी, हाथ में एक पतली किताब की उदासियों का बेदाना था, सो भी हरामी, फिर लैटिन में ही था, बंगाल के देहात की चंद तस्‍वीरें थीं, पता नहीं किन छूटे समयों की थीं, गाय की भूख और झरिया की तरक्‍की–नहाये से उसका कोई संबंध नहीं था. जैसे मेरे इस ब्‍लॉग से ट्रैफिक का, नहीं है.

Tuesday, September 3, 2013

झर-झर झर रहा है झरिया..

foto: daniel berehulak
अब ज़रा इस फोटो को देखिए, धनबाद जिले के एक ब्‍लॉक झरिया का है, डैनियल बेरहुलक के कैमरे की कारस्‍तानी है, मगर अब उनकी से निकलकर हम अपनी कारस्‍तानियों में आ जायें. कवि केके ने जैसा कहीं कहा है, मूरख पोथी बांच रहा है राज करे बलवाई / क़त्‍ल-ओ-गारत करने वाला कहता खुद को भाई / दर्जी कपड़े फाड़ रहे हैं कान काटते नाई / कैसा देश दिया है हमको हरिशंकर परसाईं! तो जैसा दीख रहा है विकास का विस्‍तारवाद इस ललियाहीं लैंडस्‍कैप की पीली, चोटखायी इमारतों में यहां और वहां झूलते बिजली के लट्टुओं व छड़ों की शक्‍ल में पहुंच गया है, पोथी बांचने वाले मूरख गो अभी भले न पहुंचें हों, दर्जी और नाई के पीछे रफ़्ता-रफ़्ता वे भी पहुंच ही जायेंगे. अन्‍यत्र एक अन्‍य कवि, एससी ने जैसे कहा ही है, कल्‍चर की खुजली बढ़ी जग में फैली खाज / जिया खुजावन चाहता सतगुरु रखियो लाज. तो कविस्‍वर के संदर्भ को लात लगाते हुए मैं मीठे सोच पा रहा हूं कि लाज रखने, या हरने, जल्‍दी ही इन मनोहारी, उदासिल रंगों को पूरने झरिये में झरता, कोई बाबा भी पहुंचेगा ही. गिट्टी और कबाड़ हिला कर, दायें से खींच, बायें किसी कोने पहुंचाकर, जगह और गरीब का धन निकालकर, तम्‍बू-तिरपाल सजेगा, बाबा की अगवानी को भागे-भागे कुछ स्‍थानीय गुंडे, व धनबाद से आयातित चंद राजनीतिक पंडे, बाबा की चरण-धूलि लेंगे, परमार्थ में, धर्मार्थ में, स्‍थानिक कल्‍चर को कृतार्थ करेंगे. आजू-बाजू गाय और भैंसों का दुहन इनिशियेट होगा. दुहे जा सकने वाले लोगों का भी फिर प्रॉपर कैटेगेराइज़ेशन हो सकेगा.

एक तिलकुट, पिटी स्‍थली के विकास के साथ ही कितनी संभावनाएं उमगने, कलपने लगती हैं. मकानों का पीला देखिए, उसे पीलिया रोग की तरह मत देखिए. वह देखने के लिए मैं नीचे दायें की दुकान में सिगरेट खरीदने पहुंचा ही हुआ हूं. आपको दिख नहीं रहा तो जाकर अपनी आंख का इलाज़ कराइये, झरिया के झल्‍लन विकास पर सवाल मत उड़ाइये.. 

कवि के रोज़गार..

फोटो: सैकत समाद्दार
धूप का पेट और चश्‍मे पर अभावों की कजरी लगाये
अधिक से अधिक डेढ़ और अढ़ाई पुरस्‍कार पायेगा
नहीं पायेगा तो दु:ख-दहलता पुरस्‍कारों की दुरव्‍यवस्‍था पर
तीन कालम लिखेगा, चार पर अपनी राय उगलेगा
कैसा समय है क्‍या कोई काम नहीं आयेगा की सोचता
उस पर नहीं, किसी और विषय की कविता खड़ी करेगा
टटोलता, टोहता, हिलता-हिलाता, हाथ जोड़ता
ई-मेलों की मृदुता और फ़ोंनों की मधुरता में, खिलता
वर्ष में तीन विश्‍वविद्यालयी विमर्शों का आतिथ्‍य
चार साहित्यिक संभाषणों के सेकेंड एसी का किराया, खायेगा
डेढ़ सौ की ऊंघती सभा में कविता की पुरची लिए नहीं, लजायेगा
मगर इससे ज़्यादा, और आगे फिर हिन्‍दी का कवि कहां जायेगा
हाथ कंगन को आरसी क्‍या का मन ही मन जाप करता
प्रार्थना के शिल्‍प में अपना प्रार्थीपना, इनसे और उनसे, ठेलता
बेटी की अंग्रेजी से प्रभावित, 'खिल्लित', अगले पुरस्‍कार की राह तकेगा
संस्‍कृति चूड़ि‍यों के तीन और बाटा के डेढ़ मेहराये डब्‍बों में होगी
उसको देख-देखकर चकित होता, कवि हिन्‍दी कविता का भविष्‍य रचेगा.

रोशनी कहां जाती है..

मालूम नहीं फोटो में खींचनेवाला क्‍या कुछ खोज लाता है. बहुत मर्तबा तो भ्रम होता है फोटो खुदी खोज ली गयी हो. ऐसे वक्‍त में जब लगातार दृश्‍यबंध बदल रहे हों, मज़े की बात है कि अब एक अच्‍छी फोटो, हमारे भागते को क्षण भर के लिए थाम लेती है, पलटकर हम उसके मिजाज़ में अटकते, लौटते रहते हैं.. सुबह की हियां-हुआं की बेमतलब-बेमक़सद भटकन का हासिल, कुछ फोटोगारों के ठिकाने. जो यहां दिख रहा है वह कोलकतिया सैकत समाद्दार की आंख से देखी दुनिया है, उनकी अपनी, बहन, मां और घर की है.. बकिया घर से बहराये, दुनिया के छितराये रौशनीकार हैं. नाम की जगह उन्‍हें यहां नंबरों में गूंथ रहा हूं कि अपने नाम की गलत लिखाई देखकर उनके मन के साथ-साथ, मेरा भी मिजाज़, कम ही खराब हो.. एक, दो, तीन, चार, पांच, छह, सात, आठ, नौ, दस, ग्‍यारह, बारह, तेरह, चौदह, पंद्रह, सोलह, सत्रह, अट्ठारह, उन्‍नीस, बीस, इक्‍कीस..

Monday, September 2, 2013

स्‍मृति हरण: एक लघु, संदर्भित प्रबंध

फोटो: रघु राय
जायकोव्‍स्‍की ने कहा है, ‘स्‍मृति छकाने के लिए होती है[1]’, जबकि मतिराम खटिक हमें याद दिलाते हैं, ‘स्‍मरण का मूल भाव हमें बचाने, और खुद को भुलाने के लिये होता है[2]’. क्‍या होती है स्‍मृति और होकर फिर क्‍या करती है. यह प्रश्‍न हमें ही नहीं उद्बुद्ध[3] करती, याज्ञवल्‍क्‍य व वत्‍सानवल्‍क्‍य[4] के समयों में भी कितने ऋषि-वत्‍सल वल्‍क्‍य-शिशुवानर थे जो इस जिज्ञासा के कर्णभेदी बाणों व मर्मबिंधे प्राणों के संग वन, वृक्ष व वणिकाओं के बीच टहलते व मचलते रहे. तेरहवीं संदी के उत्‍तरार्द्ध में तिमासोली के तिप्‍पानोरो ने गुनगुनाते हुए घोषणा की, ‘प्रियवर, स्‍मृति और कुछ नहीं, उदासियों का वाल्‍डेनसामकेट है!’ इस पर हालांकि खुद मेरा गहरा मतभेद है, स्‍मरण के बहाने इन्वित समाजों में सुसुप्‍त संज्ञाओं की खोज के दरमियान मैंने पाया, स्‍मरण मूलत: उस इक्‍तस्‍वारपोक प्रेमिका की तरह है जिसके आने का मधुर ख़याल आता रहता है मगर जो खुद कभी आती नहीं. या उस इक्‍तस्‍वारपोक प्रेमिका की तरह है जो एक बार चली आने पर फिर ‘तुम इक गोरखधंधा हो’ का उच्‍च–स्‍तरीय विश्रृंखलित उप्‍पालाप आपसे गवाती रहती है, मगर खुद आपके जीवन से क्‍या मजाल जो कभी चली भी जाती हो!

उच्‍च–वर्णी अमृता, शेरदिल ने कहीं कोमलता की ओट में छिपे मलिनता में लिखा है ‘स्‍मृति साहिर है’, जबकि दिल्‍ली व दिल्‍ली के पड़ोस रेस कोर्स मार्ग से, व ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ की अमृता से परिचित कुछ बुजूर्ग-वय यह भी बीच-बीच में राय देते ही रहे हैं कि ‘सहर, किम्‍बा सोहर तो कतई नहीं, साहिर ही स्‍मृति है’.

बड़ा भोला, निकृष्‍ट-सा प्रश्‍न है, सचमुच, क्‍या हम स्‍मृति को कभी जान नहीं सकेंगे? स्‍मृति को जानने के लिए हमें सब भूलना होगा? इस दिशा में ‘अमृत कुंभ, किम्‍बा स्‍मृति, सांधाने’ के धृष्‍ठ र‍चयिता किसी तरह, कहीं हमारी मदद करते हैं? कर सकते हैं? ‘चैन्‍नई एक्‍सप्रैस’ पर घबराये, चोट खाये व कहीं भी नहीं पहुंचते हुए, या ‘मद्रास कैफ़े’ की सघन सत्‍याग्रही राजनीति में ऊंघते हुए, हम स्‍मृति तक पहुंच सकते हैं? या स्‍मृति हमें किसी की, किसकी कविताओं पर लेटी मिल सकती है? या स्‍मृति का हमने सचमुच विलोपन हो जाने दिया है?

पोल्‍स्‍का के वरिष्‍ठ जायकोव्‍स्‍की ने कहीं कहा है, ‘स्‍मृति हमारी गहरी उदासियों की बाल-सखा है जो आनंद-चंगुल क्षणों में हमारी उंगलियां थामे फिर-फिर हमें उदास-स्मित करने को चली आया करती है[5].’ ओह, कैसा मनोहारी शब्‍द-वृंद है. मगर जब नहीं आती तो कहां जाती है, स्‍मृति?

स्‍मृति, संसार के धृष्‍ठ, दुष्‍ट जायकोव्‍स्‍कीयों से बचो, प्रिये, तुम कहां हो? तुम्‍हारा कोई सेल नंबर, ई-मेल आई डी? प्रिये, कुछ तो कहो, पास आकर कभी तो रहो?

[1] . ‘द अफेक्‍टेड मिनिमस: थ्री एसेस ऑन मेमरी एंड लॉस, सम सोलेस’, पोल्‍स्‍का प्रेस, वॉरसा, 1979.
[2] . ‘नलिन विमोचन: किंचित क्षीण व क्षुद्र आयाम’, खंड-खंड प्रकाशन, खड़गपुर, 2003.
[3] . इसका अर्थ कृपया रामजस कालेज, दिल्‍ली के प्रो. रामजस तिवारी से पता करें.
[4] . इस नाम का कोई इतिहास-धनी हुआ है इस पर गहरा संदेह है.
[5] . वही, ‘द अफेक्‍टेड मिनिमस: थ्री एसेस ऑन मेमरी एंड लॉस, सम सोलेस’, पोल्‍स्‍का प्रेस, वॉरसा, 1979.

Sunday, September 1, 2013

भूगोल: एक संस्‍मरण

अपने दोस्‍तों में बैठे भैया को जब चुटकुलाबाजी सूझता तो मनोज को बुलाकर सबके आगे उससे उसकी प्राकृतिक संपदा पूछते। मनोज इतमीनान से भौं पर लगी चोट का निशान और सामने के डेढ़ टेढ़े, टूटे दांतों का भूखंड दिखाता। पीठ पर दोस्‍तों की मुस्‍कराहट ताड़कर भैया कहते, ठीक है, आगे बढ़ो, अब भौतिक संपदा साफ़ करो। मनोज अपने हाफ पैंट की जेब से चवन्‍नी, एक खोटे बीस पैसे का सिक्‍का, हनुमान जी का स्टिकर (और भैया से मांगकर धन्‍य हुए ‘सावन-भादो’ और ‘फिर कब मिलोगी’ का) सिनेमा टिकट बाहर करके उसे सबके आगे पेश करता।

मतलब यह कि घर में मुन्‍नी, मनोज, मुझको या दीदी को तो क्‍या, भैया तक का भूगोल 'गोले-गोल' था। किसी को भूगोल की हवा नहीं थी। जब जैसी जिसको जरुरत बनती प्राकृतिक संपदा, भौतिक संपदा, अक्षांश और विषुवत को टो-टटोलकर लोग दूसरे विषय की किताब खोल कर (और भूगोल की पटककर) चैन की सांस लेते। किसी बात पर बाबूजी के नाक के बाल पर अगर गुस्‍सा चढ़ रहा हो तो वह चीखकर बोले बिना नहीं ही रहते थे कि छुटा दें तुम्‍हारा सब भूगोल?

किसी ने कभी बाबूजी को सही नहीं किया कि बाबूजी के छुटाने की बाते नहीं थी, भूगोल सबसे वइसही छुटा हुआ था!

मुन्‍नी का गुड़ि‍या का खेल खराब करना हो, या उसकी आंख से भल्‍ल–भल्‍ल लोर बहलवाना हो तो सबसे आसान और आजमाया रास्‍ता यही था कि उसे अक्षांश और विषुवत में उलझाकर ऊष्‍ण कटिबंधीय प्रदेश के बीचों-बीच पहुंचा दिया जाये।

मैं अलबत्‍ता छुट्टी के दिनों, दोपहर में जब सब तरफ सुनसान हो, भैया की साइकिल उड़ाकर भूगोल के अन्‍वेषण में निकल जाता; और कोयल नदी, या उससे लगी छोटी पहाड़ि‍यों की पहचान में समय खराब करने की जगह, हॉकी स्‍टेडियम से लगे ट्रेनीज़ हॉस्‍टल के पीछे की अफसरों वाले ए ब्‍लॉक में अपने क्‍लास की प्रीति खरे के फ्लैट के पांच चक्‍कर लगाकर, दम भर सांस लेकर फिर से तैयार होने को, इमली के पेड़ के नीचे साइकिल रोककर खड़ा होता, दु:खी मन ही मन प्रार्थना करता कि भगवान, प्‍लीज़, कभी तो प्रीति मुझसे भी प्राकृतिक और भौतिक संपदा पूछकर, जानकर शिक्षित बने!

स्‍कूल और क्‍लास में प्रीति रोज़ दिखती, लेकिन अपने घर के बाहर मैं उसको कभी खोज नहीं सका। शायद वह समय ही ऐसा था, कि लड़कियां क्‍लास में दिख जातीं, घर देखने जाओ तो गायब मिलतीं!

साफ़-सुथरे लॉन में बेंत की दो कुर्सियां पड़ी रहतीं, हेज़ से लगा एक लंब्रेटा स्‍कूटर हमेशा वहां खड़ा मिलता, प्रीति मिलकर मुझसे भूगोल समझ सकती थी, मगर मिलती नहीं। शायद भूगोल उसका कमज़ोर विषय था ही नहीं। या मेरे भूगोल को उसने अपने काम का समझा नहीं। शेखर और मैं कभी देर सांझ कोणार्क टाकीज़ से फि‍ल्‍म देखकर, पंचर साइकिल के साथ उसके घर के सामने वाली सड़क से लौट रहे थे; खुले दरवाज़े और खिड़कियों के परदे से छनकर आती ट्यूब लाइट की रोशनी और भीनी आवाज़ों के जादू में सबकुछ भूला, भारी तनाव से भरा, मैं खिंचा-खिंचा लंब्रेटा के करीब चला गया था और उसकी नम सीट को छूकर एक राहत-सी महसूस की थी, जबकि शेखर ने तब भी मुझे सावधान किया था कि तुम लोग का भूगोल बहुत डिफरैंट है, दिलीप, तुम कहां खरे के चक्‍कर में टाइम खराब कर रहे हो, यार!

हमारे गेट के बाहर कभी लंब्रेटा खड़ी नहीं रही। सजावटी बाड़ की शक्‍ल में ऐसा कोई हेज़ भी नहीं था जिसकी लंब्रेटा शोभा बनता। फिर न ही भीतर ऐसा कोई लॉन था जिसके बचाव के लिए ही हेज़ की दरकार होती। पड़ोस के साहु अंकल के गेट पर ज़रूर कभी-कभी ऑफिस के काम से एक हरे रंग की जीप आकर ठहरा करती। मनोज मूर्खों की तरह मचलने लगता कि देखना, इस बार हमारे गेट पर आकर रुकेगी। अबकी बार साहु अंकल के आफिस से नहीं, बाबूजी के फैक्‍टरी से आयी होगी, जीप से टोपा उतारते हुए बाबूजी निकलेंगे, देखना! दीदी मन मारकर मनोज को सही करती कि कब्‍बो देखे हो, बाउजी के हाथ में टोपा? साहु अंकल जो जूता पहनते हैं वो जूता भी बाउजी वाले जूता से अलग है। एक ऑफिस वाला जूता होता है, दुसरका फैक्‍टरी वाला, फैक्‍टरी वाला जूता पहनकर आफिस वाले जीप में चढ़ना अलाऊ नहीं है। बाउजी ज्‍यादा से ज्‍यादा नारंगी रंग वाले बस में चढ़ सकते हैं, ब्‍लू कलर वाला भी उनके अलाऊ नहीं है!

दीदी का इतना कहना अभी पूरा होता भी नहीं कि मनोज गुस्‍से में फनफनाया तेज़ी से दौड़ा आता, दीदी को एक ज़ोर की चिकोटी काटते हुए, उसी तेज़ी से भागता आगे निकल जाता, दीदी की पहुंच से दूर पहुंचने की तसल्‍ली में फिर पलटकर मन का ज़हर उगलता- तुम कुच्‍छो नहीं जानती हो, भूगोल में तुमको बाईस नंबर आया था, हमको सब पता है!

दौरी में सहजन या भिंडी लिये बिक्री को बोरा सजातीं आदिवासी औरतों को निरखता मनोज कभी गुमसुम थोड़ी देर सोचता, फिर सवाल करता- अच्‍छा, एक बात बोलोगे, ई आदिवासी लोक का भी प्राकृतिक और भौतिक संपदा होता है?

रात के खाने के बाद कभी पीली फीकी रोशनी में तेजिंदर या शेखर के साथ किसी बात पर बात करते हुए अचानक जो कभी प्रीति का ख़याल मन में आकर चमक, और गायब हो जाता तो मन में देर तक खलबल मची रहती। तेजिंदर कहता क्‍या हुआ, तुम कुछ बोल नहीं रहे। मैं चिढ़कर जवाब देता, चूल्‍हे में जाओ यार तू लोक, मेरा साला यहां कोई भुगोले नहीं है!

किसी घर से लोगों के बात करने की आवाज़ें धीमी छनकर बाहर आती, कहीं सिर्फ़ पीली, साठ वॉट वाली बत्‍ती के जलने का सुनसान छाया रहता। किसी घर के बाहर रात में भी तार पर टंगी सूखने को साड़ी दिखती, कोई आदमी गेट खोलकर किसी घर में भीतर जाता दिखता, लेकिन जहां तक उस दुनिया की इन तस्‍वीरों को साफ़-साफ़ समझ लेने का सवाल है, अक्षांश और विषुवत हमेशा गड्ड-मड्ड बने रहते। जैसे शहर के बाज़ार में आदिवासी औरतों का सहजन और भिंडी लेकर बेचने चला आना। उनके वहां आकर उस तरह खड़े हो जाने में कुछ कमाकर घर ले जायेंगे की उतनी ही समझ होती जितनी हम सभी भाई-बहनों की भूगोल की हमेशा रही।

Friday, August 30, 2013

कुर्सी: एक कुर्सीजघन्‍य निम्‍नतम निबंध..

(कुर्साभाव में सीयाइन नदी की छाती दलते हुए, किन्‍हीं प्राचीनतम क्षणों में)
कुर्सी ज़रूरी है. जितनी अच्‍छी टिकाऊ और खूबसूरत होगी उतने ही अच्‍छे टिकाऊ और खूबसूरत आप भी होंगे. बड़ा सीधा सम्‍बन्‍ध है. आप जितना ज़रूरी अपने लिए हैं उससे ज्‍यादा ज़रूरी आपके लिए कुर्सी है. सारा कारोबार ही कुर्सी-अनुप्राणित है (अब अनुप्राणित का मुझसे अर्थ मत पूछिये. अनुप्राणित का अर्थ जानता होता तो मेरे कदम्‍ब नितम्‍ब के नीचे एक सुगठित प्रोफेसरायी गदरायी अहा इठलायी कुर्सी होती, नहीं होती? नहीं है). तो पहला नियम तो यह कि कुर्सी को किसी भी सूरत में मत छोड़ि‍ये. ऑफिस में तो भूलकर भी नहीं. सारे काम छूट जायें, छंटते छूटते रहें, कुर्सी किसी सूरत न छूटे. एक बार छूट गई तो दुबारा मालूम नहीं कहां, किसके चैम्‍बर में पायी जाये. दुबारा मालूम नहीं आप कहां पाये जायें. मेरे यहां गिड़गिड़़ाते नहीं ही आयें, कि भइय्या जी, बड़ा ग़ज़ब हो गया, मिनिट भर को खिड़की पर शीशा सूंघने गये रहे और इतने में.. इतने में ही तो आजकल सब होता है! इतने में ही तो आपको मनुष्‍य होने की अनुभूति होती है. इतने में ही तो आपको याद आता है कि बीसियों घंटों की हाय-हाय मचाये हुए आप अपनी कुर्सी से एक मर्तबा हिले तक नहीं हैं! तो इतने में को कम करके मत आंकिये. इतने में आपकी बीवी आपको एक मर्तबा आकर आंक गयी तो फिर आप कहीं के जहीं भी रहें, अपनी बीवी के तो नहीं ही रहेंगे. फिर आपकी बीवी और घर में उसकी कुर्सी होगी, आपका घर होगा, आप उस घर में कहीं नहीं होंगे. कवि ने वक्रोक्ति में गान कहा है ‘लोगों के घर में रहता हूं, कब अपना घर होगा,’ ऐसे मौकों के लिए ही कहा है. वक्रोक्ति का अर्थ भी मुझसे मत पूछिये. बात कुर्सी की हो रही है और बेहतर हो हम कुर्सी से हटे नहीं. (अपनी ज़रुरत के हिसाब से यहां मेरी तरह पूर्ण विराम की जगह आप विस्‍मयबोधक चिन्‍ह बरत सकते, या नहीं भी बरत सकते हैं. आपका जीवन स्‍वयं एक विस्‍मयबोधक चिन्‍ह हो तो ऐसे में अच्‍छा यही होगा कि आप विस्‍मयबोधकों को छिपाकर ही रखें, मतलब स्‍वयं को स्‍वयं से छिपाते रहें. मतलब अपने को अपने में कम, कुर्सी में ज्‍यादा देखें.)

कहीं भी खड़े रहिये (पहली कोशिश तो यही करें कि खड़ा होने का काम दूसरों को करने दें, अपने को कुर्सी में जड़ने का काम दें), चौंकन्‍नी नज़रों से ताड़ि‍ये कितनी कुर्सियां हैं, आपकी पहुंचायी वाली किधर है. एक बार इतना लोकेट हो जाये, इसके बाद उसे ओझल होने मत दीजिए. एक बार आया मौका फिर दुबारा नहीं आता (संदर्भ: ऊपर लगी मेरी फोटो को देखिए, सौंदर्य और कुर्सी की विनम्र अनुपस्थिति, विस्‍थापन को देखिए, सीयाइन नदी की पुलिया पर लेटा में, आने का एक मर्तबा पाया था, दुबारा फिर पा नहीं सका हूं. न ही अपना वह खोया हुआ काला चश्‍मा. कुर्सी तो ख़ैर तभी विस्‍थापित थी. तो अपने गाढ़े अनुभव की रौशनी में कह रहा हूं), जैसे एक बार गया वसंत फिर नहीं आता, पास्‍काल और प्रूस्‍त नहीं आते. प्रमोद सिंह आते हैं लेकिन साथ ही साथ यह भाव भी चला आता है कि कुर्सी कहां है. नहीं है. कुर्सी के अभाव में आना ‘आने’ में परिगणित नहीं हो सकता. परिगणित का अर्थ मुझसे नहीं, रामजस कालेज के सियाराम तिवारी से पूछिये.

एक बार हाथ आ जाने पर कुर्सी का ओर-छोर जान लीजिए. ऐसा न हो नितम्‍ब आपके कुर्साश्रित हों, और ओर-छोर अन्‍यान्‍याश्रित. वह ग़लत होगा. फिर आप भी अन्‍यान्‍याश्रित ही होंगे. पूरा मुल्‍क अन्‍यान्‍याश्रित हुआ खड़ा है, कम से कम आप खुद न हों. पहला काम करें उसकी गद्दी टटोलकर देखें. उसकी मजबूती. फिर कुर्सी के पाये पटककर देखिए (अपने को पटककर मत देखियेगा. करने के पहले सोचकर काम करिये कि कर क्‍या रहे हैं. आशा और राम को आसाराम से मिक्‍स मत करिये. पटकने और पीटने से अलबत्‍ता कर सकते हैं). कुर्सी को बचाने के लिए यूं भी ज़रूरी है बीच-बीच में पटकना, और पीटना. पिटना नहीं. हालांकि कुर्सी बचाने के लिए बीच-बीच में वह भी ज़रूरी हुआ ही जाता है. मूल सवाल है कुर्सी बची रहे. भले आप गड़ही में खड़े रहें. या अतल, अंतहीन समंदर के गाढ़े ठंडेपने में. दिमाग दलदल हो रहा हो, जीवन प्रतिपल दल बदल रहा हो, आप जितना भी हिले हुए हों, बस कुर्सी अपनी जगह से हिल नहीं रही हो!