Wednesday, March 20, 2013

जाने कैसी गली है, या अंधेरे की मेरी ही बेअक़्ली..

ब्‍लॉग पर की एक पुरानी चिचरीकारी का रिपीट
मालूम नहीं कैसी खजुआई पतितशील प्रगतगामिता है, कि थेथरई का समूचा मनोहर कहानियां वसंताकांक होकर भी, रहते-रहते, शर्म की लघु पत्रिका का अनियतकालीन अंक होने का चोटिल भाव खाने लगता हूं, गरदन जकड़ने घुटने अकड़ने लगते हैं, हतप्रभ हकलाने खुद से पल्‍ला छुड़ाने लगता, दीवार की ओट चेहरे पर मनोज कुमार वाली उंगलियां सजाने लगता हूं. गालियों में बजता नालियों बहलता, खाली पेट सत्तू की हरीयर डकार ठेलता, बीड़ी दर बीड़ी धूंकता महेंदर कपूर हिनहिनाता, फिर क्‍या होता कि एकदम की अकुलाई नहाने लगता, लक्ष्‍मी के पीछे दौड़ता वही, सतरह से सत्‍ताईस तक की गिनती गिनता, अपने को सरस्‍वती का प्रियजन बताने, आयं-बायं गाल बजाने लगता.

रहते-रहते, अंधेरी गली में खुद का एकदम अकेला खड़ा होना दीखता, दीवार पर कराटे सीखाने के पोस्‍टर होते, लड़की कहीं नहीं होती, देह-सौष्‍ठव की प्रतियोगिता में चंडीगढ़ से हालिया लौटे उसके भाई की टनटनाती हंसी गूंजती, साइकिल के चेन किम्‍बा बरीयर नंगे हाथ पिट लेने की सख़्त उम्‍मीदवारी, सियाही में घूमते रहने से निकल, और सियाह हो लेने की ज़ि‍म्‍मेदारी होती. पिंडलियों में तनाव के तार खिंचते चले जाते मगर मन का बीहड़ खौफियाता नहीं, शर्मिन्‍दगी का मद्धम कहीं से निकलकर कहीं पहुंचता, चुपके अपने साज़ बजाता. पसलियों में फंसे साइकिल के स्‍कोप से ज़्यादा चोट लड़की के कहे से कि इसे कैमिस्ट्रि में उन्‍नीस नंबर मिले हैं और लापरवाह सिर घुमाकर निकल जाने, शर्म की भीगी मार खाने से लगती.

जबकि सच्‍चाई है अपना खाता बेहयाई की दूकान से ही बंधा है, मुंह में उधार का पान और जेब में अनगिन झूठे बयान, और इसी छहमंजिला गली में अपना बेढब, बेसिलसिले का एक पिटा मकान भी है, और उछल-उछलकर थूकने भूंकने का सांस्‍कृतिक पर्व किसी भी क्षण मैं बिना रिहर्सल ठेलिया सकता हूं, शायद इसीलिए विशुद्ध रहस्‍यवाद है कि फिर क्‍या खाकर हरामजनी शर्मिन्‍दगी से विरहियाने लगता हूं.

1 comment: