Sunday, March 10, 2013

ढलती जाये सांझ..

सांझ के धुंधलके में याद आएंगे फिर दिन के तमाशे. धूप के जंगलों पथहारे का बेसबब बिसुरना, अचानक हकलाने लगना पानी पानी, धूल झाड़कर पसीना पोंछते चौंके फिरना कि उम्‍मीद की बेहया सीढ़ि‍यां किधर जाती हैं. सांझ की मटमैली फीकी पीली रौशनी में मन करेगा हाय कितनी हाय हाय, सूने परदे फड़फड़ाते परिंदे खुद से दूर भागते खालीपन का कैसा भारिल बोझिल बोल सजाते. अस्‍पष्‍ट आवाज़ों की भीड़ में छत से निकलकर गली के आख़ि‍र तक ठहरी हवाओं की संगत सूनापन अबोली सिसकारियों चित्‍कारियों के कोरस सजाता फिरता फुसफुसाता, धीमी तैयारियों की तान लम्‍बी गाता, खुद को कितना थकाता, मन फिर भी खाली न होता. पुराने रुमाल में छूटी, टूटी आसरे की धानी लाल चूड़ि‍यां पतलून की जेबों में गड़तीं, शर्ट का कोई टूटता बटना लटका शिकायत दोहराता सियो, मुझे, अब, कब सियो. उलझी उंगलियां आपस में गड़तीं, गाल पर गर्म सांसों की धूलिया चादर, वोदका की बोतल बीयर की खाली से अचकचाई टकरा जाती, घबराती, गांजा फुसफुसाता इधर क्‍या है, असित सेन की फ़ि‍ल्‍म हेमन्‍त कुमार का गाना है, खुश होना ढलती सांझ का अगले दिन को बहाना है, किस्‍सा पुराना है.

4 comments:

  1. वाह क्या बात है

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  2. शब्दों के प्रवाह में बह गई एक ढलती शाम..

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  3. बात यहीं से शुरू होती गई गुरु - फिर नया गाना रहा क्या करें क्या ना करें ...इत्यादि लेकिन किन्तु परन्तु पुराना गाना भी था लड़कपन खेल में खोया...दिन ऐसे ही हैं आप भी वापस और हम भी लौटे ..

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  4. याद आ रहे हैं धुंधलके में दिन के तमाशे...!
    कल के लिए उम्मीद दिए जा रहा है रात का अँधेरा.

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