Saturday, March 9, 2013

बिन पैसे वाले पसीने..

जो नया था अभी भी पहेलियों में उलझा अदृश्‍यमान था, पुराना सिर्फ़ मलबे की शक्‍ल में बचा था, मैं सांस लेता संभवत: नये की उम्‍मीद में ज़िंदा था, लेकिन खरखराहटों वाली जैसी जितनी सांस ले रहा था कहना मुश्किल है कितना था. ज़िंदा. बुनकी बुआ उम्‍मीदों नहायी बिला वजह उत्‍फुल्लित हो रही थी. उनका उत्‍फुल्‍लन होगा, मेरे लिए तनाव का खिंचकर घाव हो रहा था. हाथ में आईना होता तो मैं उसमें अपना चेहरा देखना चाहता, कि इन तन्नियाये क्षणों में दीख कैसा रहा हूं. मगर कहां से होता. घर का जो भी था कार्टनों और चादरों की गठरी में बंद था, पड़ोस की छत और मेरी छाती के बोझ में कैद था. नये आईने की कीमत की सोचकर उसे हाथ में लेना किसी नई गिरह में शामिल होना और ख़तरे से कतई खाली नहीं होता. सड़ रहे दांतों के पीछे पान की लाली छुपाये बुनकी बुआ अलबत्‍ता धीमे-धीमे मुस्‍की काट रही थी. मैंने चिढ़कर कहा तुमने कहां आईने की कीमत पढ़ ली जो फालतुए मुस्‍की मार रही हो? बुआ कंधा उचकाकर उछलीं, आईना नहीं अक्‍वागार्ड का रेट पढ़ रहे हैं, ओको कहंवा से लहाओगे, बउआ, सोचके हमरा मिजाज मचल रहा है! खी-खी की फिर उत्‍फुल्‍लन कुलांचें!

बोरा-बोरा भर किताबन फैलाये रहे, ओकर क्‍या बेटा? उनके साज-संभाल बदे सोचे हो? कि लंदन पैरिस की कवनो बाला उनको अपने गोदी और गर्दन पर सजायके तुम्‍मर उद्धार करेगी, आंयं?
बुआ की इन मचलनों का मेरे पास जवाब नहीं, सिवाय इसके कि तीन हाथ की दूरी पर सीढ़ि‍यों से उसे नीचे धकेलकर हल्‍ला करने लगूं कि होल्‍लो लो, दइया गे, बुढ़ि‍या के गोड़ बिछिल गइल हो?

मगर बुआ भी जानती है कितना-कितना तो सोचता हूं, करता कहां हूं. अभी भी बुआ की नाटी टीपने की जगह तन्नियाया दांत दिखाने लगा, बोला, मालूम नहीं, बुआ, किताबन के क्‍या होगा, हम एगो कुरसी देखे हैं, ओही पर किताबी सब चांपेंगे, जरा जगह बची तो उसीमें कहीं बइठबो के इंतजाम निकालेंगे.

बूढ़ी हो-हो करके हंसने लगी. मैं सीढ़ि‍यों से फिसलकर नीचे गिर रहा हूं की एक्टिंग कर सकता था, नहीं की, मोबाइल पर ज़रूरी खबर पढ़ रहा हूं की आड़ में महंगे फ्रिज और एसी की कीमतें ब्राउज़ करता रहा.

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