Monday, March 25, 2013

गिरता हुआ कटहल..

“आप लंगे कब्‍बो खुद को आईना में देखी हैं, तइय्यन?”

तइय्यन ठेहुने तक सलवार चढ़ाये, नल के आगे उकड़ू बैठी बर्तन मांज रही थी, गरदन मोड़कर ज़रा भर मुस्‍करा दी. जीयन जैसे सवाल करती है उनका जवाब दिया जा सकता है? खुद को भी?
जीयन पलंग पर पेटकुइयां ढेर, कुहनियों के दम गरदन उचकाये, तकिये पर आईना अधलेटा गिराये, कनपटी के पीछे के अपने केश फेर रही थी, लजाकर कैसी दिखती हूं सोचती आईने में लजाकर स्‍वयं को निहारती रही, “आपसे एगो कोस्‍चन किये, तइय्यन? हूं-हां कुच्‍छो नहीं बोलियेगा?”

आंगन के बड़के पेड़ का कटहल भद्द की आवाज़ के साथ नीचे गिरकर कभी भी बुइयां बिलार, या जेतन बो की पुचकी को घायल कर सकता था, मगर पड़ोस के छौ छतों तक इन दिनों अपना भौकाल फैलाये गेंहुअन के भय से गिर नहीं रहा था. गिर रहे हैं गिर रहे हैं की अदाबाजी में उमठा पड़ रहा था, गिरने के ख़याल से घिग्‍घी बंधवाने लगता. गो बुइयां बिलार आंगनवाली किसी भी कवायद से पहले बायें पैर का पंजा ज़मीन में अडा़कर दो मर्तबा ऊपर देख लेना न भूलता. औरत का भरोसा नहीं तो फिर क्‍या पीकर कटहल का भरोसा करे? जेतन बो कभी भी छनौटा उछालकर निशाना साधती है, दुष्‍टन, तीन कटोरा दूध चाट गए तो ऐसे दुश्‍मन होये गए आपके, हैं?

दामोदर भौजी साड़ी के खूंटे से चाभियों का भारी गुच्‍छा बहिरयाती बिपिन के मुखातिब होती हैं, बिपिन के एक पैर में गुलाबी चप्‍पल है, दुसरके वाले के बाबत डाउट है बुइयां ने उसका कौनो खेल किया है, “ध्‍यान खोलके सुन लो समझ लो, बाबू, क्‍या? चप्‍पल-लोटा वाली कहानी हमरी चाभी के साथ घटी तो हम ईनारा में छलांग लगा देंगे, या तोहर कालेज छोड़ा देंगे, क्‍या?”

बिपिन पैंतालीस मिनट से बुइयां के इंतज़ार में खीझा कुनमुनाकर शिकायती लहजे में कुछ बकता रहा जिसका सीधा मतलब इतना भर था कि बेहतर हो अपने साथ-साथ भौजी अपनी चाभियां भी लिये जायें, अपना कॉलेज छुड़वाने, या किसी के कुआं में कुदवाने की जिम्‍मेदारी उससे नहीं उठ सकती!

ऐसे कपटी जवाब से दामोदर भौजी का चेहरा तिरछा हो गया, मुंह पर साड़ी दाबकर सुबुकने लगीं.
जीयन छूटी हुई गोली-सी भागी तइय्यन के आगे एक फोटो लहराकर वापस पलंग के नजीके अपने खूबसूरत दांत दिखाती हंसती रही, फोटो की याद और उससे जुड़े संभावित सब नतीजों की सोचती तइय्यन का पारा उमगने लगा, सुलगती सायं-सायं के भेदी सुर में बोली, “चइली खींचके ऊ मारेंगे कि तोर मुंह फूट जायेगा! लौटके बहरी से आयें तो आज ऊहो देख लें तोहार कारस्‍तानी?”

“मुबारक ने देखी है. और इमरानो ने!” लाज से दोहरी हुई जीयन बताती रही.

दामोदर भौजी के पीछे तइय्यन अभी गुस्‍से में फूटने को थी ही, कि बुइयां बिलार का म्‍यावं गूंजा. बिपिन चौंकन्‍ना हुए लपके.

सधे रहने की सारी प्रैक्टिस धरी रह गई, कटहल घबराकर गिरा, गो अभी हवा में ही था!

1 comment:

  1. इतना सहज स्लाइस ऑफ लाइफ सिर्फ दो-तीन मुस्लिम नामों की मौजूदगी भर से परीकथा बन गया है।

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