Monday, March 4, 2013

फिर वही घात..


जाने क्‍या-क्‍या तो बातें होती रहीं, बेतरतीबी के किस्‍से, बेमतलब के घमासान. इस बीच बच्‍चा सो गया था, या एसी की हवाओं में गुम गया था इसकी किसे सुध थी. नसीम को नहीं थी. अपनी महीन पतली उंगलियों तक की न थी, मेरे बहककर दूर निकल जाने, तोड़ी गई इमारतों के गाढ़े अंधेरों में देर तक बहके फिरने को ढ़ूंढ़ती नसीम नहीं आई थी, अपनी चुपचाप की आवाज़ों में डूबी ख़ामोश मुझसे जुदा समय और मन के फ़सील गिनती और उलझाती रही, सुध के दरवाज़े पर हाथ नहीं थपथपाये. मैं बच्‍चे की सांसें गिन रहा हूं के ख़याल में देर तक एसी की सांसें गिनता रहा.
जबकि कोई है जो इतनी देर से बातें करता रहा है. नसीम नहीं है, न ही मैं हूं और बच्‍चा तो हर्गिज़ ही नहीं है. मगर इतनी जानी-पहचानी आवाज़ों के घेर और घनघोर का मतलब साफ़ है, है कोई हमारे बीच का ही किस्‍साख़़ोर. सप्‍तर्षि, सरोवर, भोर का तारा, दक्खिनी आकाश की पगडंडी और गुलकंद की तश्‍तरी की बातें आज कौन करता है. कराची के इफ़्तिख़ार मियां अपनी मौसेरी बहन को लिखे और फिर छिपा लिए ख़तों में करते हों बात समझ में आती है, हमारे यहां नसीम के तकियों और बिछावन के गिलाफों को ऐसे गुफ्तग़ू की आहटों की पहचान है, वर्ना किसी अभागे की फटी दुपहरिया पतंग कट जाये और बात है, ऐसे बिसरों पर घोड़े भी अब कहां पूंछ झटकते हैं.
पानी के कलकल की कोई लकीर है जिसके गिर्द नसीम ख़ामोशी का अपना इकतारा बजाती खड़ी है. मैं डोलता उसकी पीठ की महक तक पहुंचने का रास्‍ता टटोलता हूं. पीठ ढीठ कहती है मैं यहां नहीं हूं, महक का किस्‍सा सपने में गाया कोई अजनबी गाना है, यथार्थ के उबड़खाबड़ में सपने की लीक मत उलझाओ, कहीं और जाओ.
शीशम का वह भारी वृक्ष, बेंत की बेतरतीब छूटी कुर्सियां, तार पर रह-रहकर फड़फड़ाते वे तीन बड़े चादर, बच्‍चे की चिंहुक सब सपना है? पीठ की महक से मैं सवाल करना चाहता हूं, मगर इतने में नसीम एकदम से भागी आकर मुझसे लिपट जाती है, मैं कुछ कह सकूं इससे पहले दूर आसमान में हरी पहाड़़ि‍यों की दो काया उड़ती दीखती है, या महादेव हैं मुस्‍कराकर कोई इशारा करते हैं कहना मुश्किल है.

3 comments:

  1. पीठ के महक से सवाल! :)

    बहुत दिन पढ़ रहे हैं आपका लिखा!

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  2. एक अच्छी रचना ,

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