Saturday, March 9, 2013

कनिया रे कनिया..

काट-कूट के, कांख-हांफ के, सब जतन भिड़ा के कनिया घर चलाने की कोशिश करती है, मगर साधन पूरे नहीं पड़ते, अभाव का फटा फैला चादर गोड़ और मुंह फंसाता चलता; खड़े-खड़े गिराता चलता है. मैके में तइया काकी हाय भरती हैं कि लइकी गलत ठीया व्‍याह दिये. ससुरार में शारदा मौसी को शिकायत है कि दुलहिन संभालकर चलना नहीं जानती. रात-बिरात की तो रहे दो, हम अपनी आंख देखे नहीं फिर किसी और के कहे काहे नुस्‍ख गिनायें, मगर सुबही-सकाली ई घुटना तक साड़ी उठाये दुआरे पानी का बलटी उलीचती रहती है, उघारे अंगना गीत-गजल गाती फिरती है, कवनो ऊंच-नीच घट गया तो दीवाकर बेटा हमको दोस मत देना!

दिवाकर बेटा यूं भी दोषदायी प्रकृति के नहीं. बगान में बकरी धोया कुरता चबाने लगे तो ऐसा नहीं होता कि नाथकर बकरी को थूरने लगें, या पत्‍नी को ही. या रात को मंदिर के पिछाड़े शंकर की भजन मंडली की संगत में गांजा का दम लगाकर लाल-लाल आंखें लिए घर लौटें और पत्‍नी से जिरह करें कि वह लाल पेटीकोट पहने कमरे में टहिल क्‍यों कर रही है. जिरह और आलोचना दिवाकर की प्रकृति में ही नहीं. मूलत: अवसादी हैं और अवसाद कुरते की जेब और लुंगी के फेंटे में नदी की रेती की तरह भारी व थोक में उपस्थित मिलता है. रात के दस बजे कनिया सामने खड़ी ऐलान करे कि आज रोटी घट रहा है तो दिवाकर आंखें फैलाने की जगह आंख सिकोड़ कर माथा नीचा कर लेंगे, फुसफुसाकर वही परिचित मंत्र धूकेंगे कि ठीक है, आपै खा लीजिए, हमारा मन ऐसे भी भारी भरा हुआ है!

कनिया भी ऐसी नीच जनाना नहीं कि पति को भूखा रखकर चोरी-चुप्‍पे अढ़ाई रोटी खुद भकोस ले. हंडी से दो गिलास ठंडा पानी लेकर अलसाई जिम्‍मा में पानी सधाती है, टपनी का नम रोटी ठंडी सांस छोड़ती, जाकर बकरी को खिवाय आती है. जीवन में कभी सुभीता हुआ तो तइया काकी से एक मर्तबा ज़रूर से पूछेगी कि जीवन में इतना शोक क्‍यों है, काकी? हम तो किसी का बिगाड़े नहीं, काकी, फिर?

इंदोनेशिया का कौन तो आधुनिक काल का एगो मगरूर कवि हुआ ऐसे मौके के लिए बड़ा ही मौजूं लाइन कहिस है, “मसीह जाउ लेबिह सेदिकित” (मतलब इतना होता तो भी कितना कम होता आदि-आदि).. वेस्‍टर्न यूनियन और ऑन लाइन मनी ट्रांसफर की कैसी कहां-कहां की सेवायें हैं, एक भरा-पूरा भागता हर्षिल समय है, मगर अपनी कनिया के लिए कहां है. ईंटा की टुटही फंसाईल ज़मीन पर गोड़ संभालकर चलती, अंगूठा ठिलियाती, छिलाती सिसकारी खींचती आह भरती है, कड़ु का तेल और हल्‍दी चढ़ाकर उस पर पुरनकी साड़ी का छोर बांधकर सबसे गोड़ छुपाने की कोशिश करती है, काम की भागा-भागी से मौका लगे तो बेना की चार हांकी से मिनिट भर को दम लेती है, बिजली वाले पंखा और एसी का ख्‍वाब नहीं देखने बैठ जाती. बैठ सकती भी नहीं. इतना सारा सब सोचकर बैठ जाये कनिया ने इतनी दुनिया देखी होती तब न? नहीं देखी है. ढंग से दिवाकर जी का माथा और दुख में नथुने कैसे फूलते हैं ये भी तो नहीं देखा!

सब देखना जीवन में यूं ही रह जाता है. एक स्‍त्री का तो रह ही जाता है. कुछ भागवती स्त्रियां होती हैं भागती कांदिवली और किन्‍नौर नगर का बस पकड़ लेती हैं, किन्‍नूर के रंगमंडल और कैलिफॉनिर्यन कंसर्ट की झलक पा लेती हैं, कनिया गांव नगर के कुएं के सूखे जल तक की कहां झलक पा पाती है. दिवाकर शब्‍दों में न कहते हों, नज़रों में मुंदी आंखों अरबी का गुनगुनाते रहते ही हैं, “عينيك في العالم إلا ما رخا” (तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्‍खा क्‍या है), मतलब यही कि होगा संसार में वेस्‍टर्न यूनियन, सबके लिए नहीं है, अपनी कनिया के लिए तो नहीं ही है; जैसे वोट देने का अधिकार सबके लिए भले हो, लोकतंत्र का सुख पाना नहीं है..

2 comments:

  1. घाट घाट के पानी पी के, बऊआ कहे कहानी
    सूरज उगे भले पछ्छिम से, कनिया भये न रानी।

    ReplyDelete
  2. जीवन में इतना शोक क्‍यों है, काकी? हम तो किसी का बिगाड़े नहीं, काकी, फिर?
    ***
    जाने कनिया को यह प्रश्न करने की सुभीता मिली या नहीं... पर यह मार्मिक प्रश्न हम तक पहुंचा ज़रूर, पूछा गया होता यह प्रश्न तो शायद ज़वाब में काकी मौन ही रहती... क्या कहती?
    हम भी मौन हैं!

    ReplyDelete