Friday, April 5, 2013

पपीते के पेड़ पर कौवा..

(कौवा, मेरी नहीं, मार्था वर्थी की, कलमकारी है) 
वर्माजी के नये बन रहे मकान की भव्‍य चिरकुट छत्रछाया. लंच की छुट्टी में मजदूर रोटी टूंग रहे थे. अल्‍लम-बल्‍लम के ढेर से लगे साइकिल के नजदीक दायें-बायें होता श्रीप्रकाश विचारलीन था कि बनवारी के ठेले पर जाकर वह भी दो समोसे दाब ले, या आज फिर लंच को लंगी लगाये. तिन्‍नी तभी दिखी. साठ के दशक की ढेरों हिन्‍दी कहानियों में जैसे नायिकाएं दिखती रही होंगी. गुलज़ार की पहली फ़ि‍ल्‍म ‘मेरे अपने’ में जैसे साइकिल के रॉड पर पैर तिरछे अड़ाये, बीच सड़क रौब पेलने की कोशिश कर रहे विनोद खन्‍ना को औचक करती रिक्‍शे से गुज़रती योगिता बाली दिखती है.
रिक्‍शे से उतरकर, परम्‍पराबद्ध अन्‍य नायिकाओं की तरह, तिन्‍नी मंदिर की सीढ़ि‍यां चढ़ सकती थी. मंदिर की जगह, मन की सीढ़ि‍यों को पैरों से चांपती, श्रीप्रकाश की ओर खिंची आई. घबराकर श्रीप्रकाश ने साइकिल की हैंडिल से हटाकर हाथों को पैंट की जेब में छिपा लिया. सूखते कंठ में जीभ घुमाकर तेजी से खुद को सुस्थिर करने की कोशिश की. मगर अब पिंडलियां कांप रही थीं. छाती पर मानो किसी ने एकदम से बर्फ़ की सिल्‍ली रख दी हो. भागकर तिन्‍नी को छाती में भर लेने की इच्‍छा हुई. लगा एकदम से ऐसा नहीं किया तो उसके भीतर कोई बम फूट जाएगा और उसके चिथड़े उड़कर हवा में लहराते फिरेंगे. मगर श्रीप्रकाश ने ऐसा कुछ नहीं किया, जो करना था वह तिन्‍नी ही कर रही थी, श्रीप्रकाश पालतू कुत्‍ते की तरह बिना कूं-कूं किये और बिना दुम हिलाये अपनी जगह चुपचाप, गेंदे के मुरझाये पौधे-सा, खड़ा रहा.
तिन्‍नी पूरे तीन वर्षों बाद दिखी थी. और कैसी भरी-पूरी अमीर दिख रही थी? ज़रा-सा हाथ बढ़ाकर श्रीप्रकाश उसकी साड़ी छू सकता था, उसके गाल.. मगर श्रीप्रकाश के हाथ फिलहाल उसके साथ नहीं, उसके जेबों में बंद थे, और उनमें 440 वॉल्‍ट की बिजलियां दौड़ रही थीं.
- तुम यहां?
तिन्‍नी ने पूछा था.
हां, मैं यहां. वर्माजी के नये बन रहे मकान की सुपरवाइजरी के चिरकुट मड़ैये के नीचे छिपा. खींच-खांचके बी. कॉम पास करके और एक इलैक्‍ट्रि‍कल के बेमतलब के डिप्‍लोमा के साथ और कहां होता?
मगर यह सब कुछ कहने की जगह श्रीप्रकाश के मुंह से निकला, मंदिरा, तुम खुश हो?
- एक बेटी हुई है.
बेटी हुई है यानी? स्‍त्री स्‍थानांतरित इस नये प्रेम में स्‍वयं की व्‍याख्‍या करती है? प्रेम के पहचाने संसार से पार की यह कोई नई जगह है? श्रीप्रकाश अपने प्रेम की किस संदर्भ में व्‍याख्‍या करे?
पपीते के पेड़ पर आकर बैठे एक कौवे की कांव-कांव से प्रेमीयुग्‍म की तंद्रा टूटी. कांव-कांव की ककर्शता ने थोड़ी देर के लिए श्रीप्रकाश की बदहाली, सारी व्‍याख्‍याकांक्षाओं को बेमानी कर दिया.

2 comments:

  1. कोई होता जिसको अपना ... गाना नहीं बजेगा अब |

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  2. जिसके हिस्से जो टिकेगा, मन को कितना दुखे, वही दिखेगा...

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