Tuesday, May 21, 2013

गर्म हवायें..

( दादुशिन की चिरतकारी)
अबे, कितनी गरमी है, अच्‍छे आदमी, हैं? की आवाज़ लगाता, धम्‍म से चार सैकेंड के लिए घास पर निढाल गिरकर, और फिर उतनी ही प्रवीण तत्‍परता से देह खुजाते मैंने जुसेप्‍पे को ख़बरदार किया.

टखने, पिंडलियां, जांघ के भीतरी हिस्‍से, पीठ, गर्दन, कान के निचले, बाहरी किनारे, कनपटी, माथा, ओह, खुजावन के कितने केंद्र थे, और उन सभी केंद्रों तक खरखराती उंगलियों के ब्‍लेड को घुमाने का कैसा अनूठा, सेंसुअस परमानन्‍द था! गरमी का तो था ही. अलसाया, चार कदम पीछे टहलता, लगा-लगा जुसेप्‍पे भी आकर घास पर मेरे बाजू बैठ गया.

“जैतपुर, श्रावंती, देहुना, बलराजनगर क्‍या टोहेंगे ऐसी गर्मी में, कहीं एसी वाले होटल में कमरा लेकर दो दिन पहले हवा खाते हैं, ऐं, क्‍या कहते हो? तुमको निकलना हो तो निकलो, मैं तो आगे चलने से बाज आया?” मैंने इत्तिला की और आंखें मूंद देह-खुजावन के रक्तिम अनुच्‍छेदों में वापस लौट गया.

“अपने को देखकर तुम्‍हें शर्म नहीं आती?” एक उचक्‍के किस्‍म के मुरझाये, बुढ़ाये, पत्रहीन गाछ को देखते जुसेप्‍पे ने ऐसे खोये स्‍वर में कहा मानो मुझसे नहीं, पत्रहीन गाछ व प्रकृति से संवाद कर रहा हो.

“तुमको दया नहीं आती?” चिढ़कर मैंने जवाब दिया, “मुझे गुस्‍सा आता है. किसी दिव्‍यपुरुष की तरह छै बाहुधारी होता तो सोचो, खुजलाने का कितना महीन, मार्मिक आनन्‍दलोक होता.. तुम रेसपेक्‍टफुली एड्रेस करते, पड़ोस में रक्‍ताभ व रक्‍तवर्णी नहीं, वास्‍तविक रक्‍तनदी बहती होती, औरतें माथे पर आंचल व गोद में स्‍टील की थाली लिए चढ़ावा चढ़ाने पंक्तिबद्ध खड़ी मिलतीं.. खरखराती, डोलती आवाज़ में तलत महमूद भजन गाते मिलते, हैं?”

जुसेप्‍पे ने एक पत्रहीन गाछ से नज़र हटाकर एक अन्‍य पर गाड़ लिया, दोनों के बीच जैसे पत्रहीनता की कोई मलिन प्रतियोगिता चल रही हो. मेरे भीतर है नहीं, अगर होती, दया, तो अपने टखनों की जगह, जाकर कुछ देर के लिए पेड़ के खुजा आता, उसकी जगह जबकि, जुसेप्‍पे की ही खुजाता रहा, “जुसे, ये समय और इतिहास की कैसी त्रासदियां है, यार, टैक्‍सास में भी गरमी पड़ती है, ओसाका में किमोनो और चेहरे के आगे बेना लहराता मैं सड़क पार करता गरमी की शिकायत करता होता, यहां ‘जली घास पर घंटा भर’ वाली कविता बुनने की क्‍यों कर रहा हूं, हैं?”

पत्रहीन गाछ से नज़र फेरकर व घास पर टिकी कुहनी को गिराकर जुसेप्‍पे ने एक आह भरी, आंखें मूंद पीठ के बल लम्‍बलेट हो गया, कुछ क्षणों के अंतरालोपरांत अपनी शिकायत दर्ज़ की, “पता नहीं मुझे ज्ञानकोश की तरह बरतने की तुम्‍हारी यह गंदी आदत कब जायेगी..”

“कभी जाएगी?” मैंने चिल्‍लाकर त्‍वरित उत्‍तर दिया.

“और हर तीसरे घंटे पर अंदाज़ के दिलीप कुमार की तरह मुंह लटकाकर दुखी होने की..”

“मगर जीवन में इतना दुख क्‍यों है, जुसे,” मैंने एकदम से छूटकर कहा, “गरमी तो ख़ैर है ही?”
जुसेप्‍पे ने छूटकर जवाब नहीं दिया. दरअसल नहीं ही दिया.

थोड़ी देर तक उम्‍मीद बनाये रखने के बाद फिर मैंने भी हार मान ली, छाती पर हाथ बांधे, आंखें मूंद ली और जुसेप्‍पे के सानिध्‍य में ठहरी हवाओं के न आते झोंकों का गरम-गरम आनन्‍द मार्मिकता से महसूसने लगा..