Wednesday, July 31, 2013

याद किया दिन ने कहां हो तुम..

रवीश कुमार का कहने का मन करता है, उनके ब्‍लॉग का उपशीर्षक भी यही है, जबकि राजनीति में ढेरों लोग हैं जो कहने की जगह करने में यकीन रखते हैं, लाख चिचियाता ज़माना सींखचों में बांधे रखना चाहता रहा, मधु कोडा आखिर जमानत पर बरी हो ही गए, लोगों की लाख लंगियों के बावजूद ममता दीदी पंचायत के चुनाव निकाल ही लीं, अखिलेश बाबू भी बिल्‍डर लाबी के हितों का रेत करेवाली से हाथ झटका ही लिए; फिर शरदजी पवारजी की तो बात ही क्‍या, कहनेवाला मुंह उनका बहुत वक्‍तों से भले न रहा हो, करनी के उनके बेमिसाल कारनामे महाराष्‍ट्र के नक्‍शे से ज्‍यादा बड़े हैं, या तेलंगाना से बड़े तो हैं ही (दिल्‍ली के किसी स्‍टैंड-अप कॉमिक ने दो दिन पहले अपने फेसबुकिये पेज़ पर अच्‍छा कहा ही था, कि आंध्रप्रदेश गया तेलंगाने! पता नहीं ऐसे कैसे कह लेते हैं लोग, या करनेवालों के वेबसाइट बना लेते हैं, जैसे शरदजी पवारजी की एक बच्‍चे ने बना ही रखी है! जबकि रवीश कुमार को देख रहा हूं अपनी कहनियों से बाज आ रहे हैं, आज प्रेमचंद को दुबारा विदर्भ टहलाने के, खुद को चैनल का मुंह मियां मिट्ठु बना रहे हैं. शायद इसी की तैयारी में कुछ महीनों पहले फेसबुक के पन्‍ने पर रवीश ने स्‍टेटस की शक्‍ल में एक डिसक्‍लेमर चढ़ा रखा था?

“ख़ाली होना चाहता हूं। इसलिए हज़ारों मित्रों में से कुछ से विदा लेने की कवायद चल रही है। उनसे फिर कभी मुलाकात होगी। कुछ नए लोगों से मिला जाए। उम्मीद हैं आप बुरा नहीं मानेंगे। कई बार उलीचना ज़रूरी हो जाता है वर्ना नाव पानी के बोझ से डूब जाएगी। जो मिल रहा है उसे लौटाना भी पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया को इंगलिस में डिलिट करना कहते हैं।”

जबकि मैं सामने सांझ के अंधेरे को देखकर फिर वही पुराना दुहरा रहा हूं:

कितना कुछ पीछे छूटता जाता है, स्‍कूल गुजारे के शहर कलम का सिपाही हिंद पाकेट बुक्‍स की पुरानी जिल्‍दें, पुलिस की लाठियों को धता बताकर भीड़ से भाग आना, अठन्‍नी रिक्‍शा पुलिया, निरंजन सिनेमा अप्‍सरा रज़ाक और बसंत-बिहार की तंग सीढ़ियां प्रोजेक्‍शन की टिमटिमाती बत्तियां, चौक की रात और दारागंज की सुबह, पूजा का पंडाल फ्राक के फूल प्रसाद छूटा जाता है, पुरानी चिट्ठि‍यां सूखे दवात और बलिया बस डिपो पर नोट हेराने बहन की राखी गंवाने की रुलाई, तामचीनी के बरतन एचएमटी की घड़ी और चश्‍मे का पहला फ्रेम टूटता जाता है, यार्ड का रह-रहकर अकेला धुआं छोड़ता करियाया इंजन कालिखधुली सांझ और स्‍टेशन की दीवार पर ‘समाज को बदल डालो’ का मेहराया किरकिराया पोस्‍टर, बाटा के चप्‍पल विको वज्रदंती बाम्‍बे डाइंग के सुपर विज्ञापन, माथे पर लाल रुमाल लिए बेहुदगी की हद तक सुखी मुस्‍काता राजेश खन्‍ना उड़ते जाते हैं, निम्‍मी गाना गाकर सुरैय्या को क्‍यू पास करती, काले-सफ़ेद के धुंधलकों में शेख मुख़्तार के पीछे संजीव कुमार गुनगुनाते, पृथ्‍वीराज को तैयार कराते बारिश के अंधेरों में सारा शहर डूब जाता, समय की आंख पर कोई नन्‍हीं चिरैया अपने पंख तौलती भविष्‍य की कांख में ठोर गड़ाये डोलती न सुना जा सकनेवाला इक मीठा बोलती, याद किया दिल ने कहां हो तुम, मैं अपने ब्रलॉग पर चुपके से लिखे जाता प्‍यार से पुकार लो जहां हो तुम..


वैसे कह चुकने के बाद फिर बात बच ही जाती है कि नयी यादों से कैसे मिला जाये.

(फोटो: अनुनाद ब्‍लॉग के आभारित पोस्‍ट से पुन: आभारित होकर)

Tuesday, July 30, 2013

पापा की छूटी नौकरी के बाद के सुहाने दिन..

पापा की जबसे कालेज वाली मास्‍टरी छूटी थी, घर का बुरा हाल था. पापा स्‍टूल के पीछे पैर फंसाये, जाने बाबा आदम के कि किस ज़माने के, अपने चिमरख सोफे पर अपनी किताब लिए उसे पढ़ने का अभिनय करते पड़े होते, और स्‍कूल से लौटकर घरवाली साड़ी लपेटती मां रसोई में कुनमुनाने पहुंच जाती कि अंडा खत्‍म हो रहा है, दाल के दाम कैसे आसमान छू रहे हैं, और तुमको मालूम है मुन्‍नी के लिए स्‍पोर्ट्स का एक जूता देखी, उसका क्‍या दाम बताया दुकानवाले ने? इन सब ड्रामों का यही नतीजा होता कि पापा अपनी पढ़ाई में और डूब जाते, मैं रसोई के दरवाजे पर जाके एक पैर से दूसरा खुजाती मां से झगड़ा करने पहुंच जाती कि मुझे नहीं चाहिए स्‍पोर्ट्स वाला जूता, फिर? मुझे स्‍कूल का नया बस्‍ता भी नहीं चाहिए और न ही मुझको अंडा खाने का शौक है, तुम पापा को चैन से बेचैन नहीं रहने दे सकती?

मां बड़ी-बड़ी आंखें करती मुझे तरेरती कि इस लडकी के ज़रा ढंग तो देखो, तू चुपचाप जाके अपना होमवर्क करती है कि मैं खिलाऊं तुझको तेरा अंडा!

मेरे ही ‘ढंग’ का मामला नहीं था, ऐसे लोगों की पूरी लिस्‍ट थी जिनके ढंगों से हफ्ते में चार दफे मां का दम फूलता होता. जिस दिन पापा कालेज की नौकरी से हाथ धोकर घर लौटे और अपने चिमरख सोफे पर धम्‍म् से निढाल हुए मुझसे बोले थे मुन्‍नी, तू बाहर जाके खेल, बेटी, मेरा सिर फट रहा है, और आधे घंटे के भीतर मां के लौटते ही एकदम से उठकर अपने साथ हुए हादसे का जो किस्‍सा बयान किया था तब भी मां ने आंखें फैलाकर पापा के कालेज के प्रिंसिपल की बाबत, उसके ‘ढंग’ से ऐसे ही एतराज़ ज़ाहिर किया था!

पापा बुदबुदाकर बोले थे वही तो, छोड़ो, हटाओ, फालतू की नौकरी साली, एक चाय पिलाओ, और मैं भागकर पापा की गोद में चढ़ती बताने पहुंची थी कि चीनी है घर में कि चाय पियोगे?

‘दूध भी नहीं है! जा तो मुन्‍नी, कोने वाली दुकान से दूध और चीनी लेकर आ तो, बेटी?’ मां कहकर सोची कि मैं चली जाऊंगी तो वह तसल्‍ली से पापा के प्रिंसिपल के ‘ढंग’ और आगे क्‍या किया जाये की रणनीति पर विचार करती, मगर ऐसे धमाकेदार घरेलू हादसे के बीचोंबीच पापा और मां को अकेला छोड़कर मैं कहां कहीं जानेवाली थी? मुझे भी पापा से जानकर रहना था कि आखिर कौन-सी दुनिया से खोजकर वे किस ‘ढंग’ की अपने लिए प्रिंसिपल लाये थे जिसने सिर्फ़ इस बात पर जिरह करके उन्‍हें कालेज से बाहर करवा दिया था कि दूसरे मास्‍टरों की तरह वह उस ‘खड़ूस’, ‘सटकेली’ औरत को ‘मैडम’ की जगह ‘माताजी’ बुलाने से मना कर रहे थे!

दुबारा जब मन्‍नु काकी लाला की नई (तीसरी वाली) कार में हमारे यहां आई तो उसने भी पहली बात मां से यही कही कि, 'ये कौन बात हुई, जीजी, कि इत्‍ती-सी बात पर बैठी-बिठाई नौकरी को आदमी लात मार दे, हें, बोलो तुम? अगर प्रिंसिपल चाहती है सब उसे माताजी बुलायें, और सब बुला भी रहे हैं, तो आप क्‍यों नहीं बुलाओगे, भई? चार किताबें पढ़़कर आप सबसे जुदा हो गए, हें? ये तो भाईजी ने अच्‍छा नहीं किया, तुम अकेली की कमाई से अब ये घर चलाओगी, कहां से चलाओगी, समझाओ तो जरा? आपसे दस साल बड़ी है, ऐसा क्‍या बुरा था अगर जो अपने को माताजी बुलवाना चाहती थी? मैं तो कहती हूं श्रीदेवी जी और माधुरी जी तो नहीं बुलाने को बोल रही थी, और अगर वही बोलती तो भी आपको बुलाने में हर्ज क्‍या था, भाई? आखिर को तो आप उसीकी रहम पर अपनी तनख्‍वाह काट रहे थे, मुन्‍नी के स्‍कूल का खर्चा उठा रहे थे?'

बाद के दिनों में, अखबार के पीछे सिर लटकाये पता नहीं क्‍या पढ़ने की हमेशा एक्टिंग करते पापा को देखकर कोई भी कह सकता था कि वे भी जानते हैं कि उनसे गलती हो गई थी. ईश्‍वर उन्‍हें अगर दुबारा मौका दे तो वह अपने प्रिंसिपल को सहर्ष जाकर माताजी पुकारने को तैयार हो जाते. माताजी, श्रीदेवीजी, माधुरीजी, व्‍हॉटेवर.

मगर यह मौका फिर आया ही नहीं. वक्‍त-बेवक्‍त मन्‍नु काकी ही आती रही. कभी मुझे काका की नई कार (दूसरी वाली) में बाहर ले जाकर आइसक्रीम खिला लाती, या अपने हेयर-ड्रेसर के यहां बालों की बनावट की अनोखी दुनिया की टहल करवाने लिए जाती, और फुरसत में लंबी सांस लेकर कार की पिछली सीट पर मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर मुझे दुनियादारी समझाती, ‘जानती है, मुन्‍नी, हमारे यहां का सारा हिसाब-किताब जो है, गांड़-चाटने का हिसाब-किताब है. घुसखोरी इस देश का सबसे बड़ा प्राबलम नहीं है, प्राबलम है तुम्‍हारे पापा की तरह बहुत सारे समझदार लोग अपनी वाजिब जगह पर नहीं हैं क्‍योंकि वो गांड़ चाटना नहीं जानते. या उनको मालूम नहीं कि किसकी चाटें, किस जरुरत में कितनी-कहां चाटें. अब तुम यही मेरे लाला को देख लो, कैसे तो तानपूरे जैसी नाक है, एक मर्तबा कुर्सी पर बैठ जाये तो दो लोग जब तक हाथ लगाने न आयें, अपनी मर्जी से उस कुर्सी से दुबारा खुद उठ नहीं सकते, ऐसे भैंसे को मैं नौ साल से अपनी गोद में बिठाये हूं, उसके कान और गर्दन के बाल सूंघती तारीफ़ करती रहती हूं, कोई शौक है मुझे? न करूं तो तेरे पापा की तरह पेपर लेकर सारा का सारा दिन खराब करती बैठूं? पेपर की पढ़ाई मेरे चार कमरों के मकान का किराया चुकायेगी? कम से कम मुझे मालूम तो है कि मुझे किसकी गांड़ चाटनी है, यहां तो लोगों की उम्र निकल जाती है और उनको इतना तक पता नहीं चलता कि भई, आपके चाटने के लिए किसकी गांड़ है!‘

मन्‍नु काकी और मेरे बीच जितनी बातें होतीं वो अगर मां के कान में पड़ जाये, या पापा के ही, तो मेरे लिए अपना कान बचाना मुश्किल हो जाये. मन्‍नु काकी और मेरे बीच बहुत सारे ‘सीक्रेट्स’ हैं. मन्‍नु काकी जिस तरह मेरी नाक पर अपनी तर्जनी टिकाकर मेरा माथा चूमती उस तरह मां को भी कभी मैंने खुश होते नहीं देखा. कभी-कभी लाला की कार (चौथी वाली) में अकेली बैठे सोचते हुए मुझे लगता मैं मां से कहीं ज्‍यादा मन्‍नु काकी को प्‍यार करती हूं. लंबी सांस लेकर जब मन्‍नु काकी मुझसे अपना दुखड़ा शेयर करती कि, ‘जानती है, मुन्‍नी, ऐसा नहीं कि मुझे नहीं मालूम कि भाईजी इन दिनों मकान-मालिक के तकाजों को लेकर कितना परेशान हैं, एक-एक बात की खबर है मुझे! मगर मेरे हाथ बंधे हुए हैं, बच्‍ची, लाला ऐसे ही लाला थोड़ी हुआ है, बड़े पैसों की तो रहने दे, मेरे हाथ कभी फालतू का एक घेला नहीं धरता, हरामी! महीने के जितने बिल हैं उनकी भरपाई करता है, मगर उसके बाद हर खरचे के लिए चाहता है मैं उसके आगे हाथ पसारती बैठी रहूं. कहती हूं तो गिनकर उतने पैसे मेरे हाथ में रखता है. मरद सारे हरामी ऐसे ही होते हैं. मगर तू मुंह मत लटका, किराये वाले इन पैसों का मैं कुछ करती हूं!‘

लिक्विड कैश के अकाल का काकी का ये सारा किस्‍सा मेरे लिए, सच्‍ची, आउट आफ द वर्ल्‍ड, और आउट आफ माइंड है. सोच-सोचकर मेरा माथा गरम होने लगता कि काकी के हवाले इतने सारे ताम-झाम, हेयर-ड्रेसर और मॉल की खरीददारियां, सिनेमा और साटिन के कपड़े और असली जो चीज है, बैंक अकाउंट, वहां एक रुपैय्या नहीं! यह भी कोई मन्‍नु काकी होना हुआ फिर?

और ऐसा भी नहीं कि काकी ने नौ साल से लाला को गोद में बिठा रखा था तो पलटकर लाला ने काकी की खातिर अपना घर, पत्‍नी और बच्‍चे छोड़ दिये हों. काकी तो अपनी खरीददारी करने निकलती और लाला की बीवी की खरीददारी करके लौटती, आंखें पोंछती मां को बताती, अब क्‍या करुं, जीजी, देखा, अच्‍छा लगा तो सोचा एक उसके लिए खरीदती चलूं, आखिर भगवान ने हक तो उसी को दिया है, हें? फिर देर तक नाक सुड़कती रसोई में मां से लगी बिसुरती कि नहीं, तुम बताओ, जीजी, तुम्‍हारी मन्‍नु के पास और चारा क्‍या है. खुदा न खास्‍ता आज को कुछ हो गया, सांस ही उखड़ गई, फिर यहां कौन है जो मेरी काठी को कन्‍धा देने आयेगा? लाला और उसके घर के सिवा यहां मेरा और है कौन, फिर याद आने पर अपने को दुरुस्‍त करती दोहराती, कि ‘ऐसा नहीं कि तुम लोग नहीं हो, मगर आज के इस जमाने में तुमलोगों के होने का मतलब ही क्‍या है, नहीं, बोलो जो गलत कह रही है मन्‍नु, हें?‘

और फिर एक दिन वही हुआ जिसका मन्‍नु काकी को तो नहीं, मुझे बहुत दिनों से डर था, हाथ का आइसक्रीम खत्‍म करके चहकती हुई मैं अभी घर के भीतर घुसी भी नहीं थी पापा का एक झन्‍नाटेदार तमाचा मेरे गाल लाल कर गया, और उसके पीछे फटी आवाज़ में उनका चीखना, ‘स्‍कूल से छूटकर तुमको घर आना नहीं सूझता, आइसक्रीम खाने निकल जाती हो! इसी से तुम्‍हारा शरीर बनेगा? बीमार होगी तो मन्‍नु तुम्‍हें हास्पिटल लेकर जायेगी?’

(बताओ ऐसे बाप को, मन्‍नु काकी नहीं जायेगी तो आप लेकर जाओगे? आप तो घर छै अंडा भी नहीं ला सकते? वैसे अंडा लाकर फिर रखोगे कहां, आजकल तो फ्रिज भी खराब है! फ्रिज बनवाया आपने? एक शर्ट का बटन लगाना तो आपसे होता नहीं, पापा, फिर आप क्‍यों खामख्‍वाह इतना ताव खाते रहते हो?)

पापा की कालेज वाली मास्‍टरी छूटने के बाद से घर का बुरा हाल था. बाद में और बुरा हुआ. मन्‍नु काकी के भी हुआ. हालांकि नहीं भी हो सकता था. ऐसे वाकये फिल्‍मों और किताबों की आखिर में होते हैं, जीवन में बहुत बार किसी बुरे दिन काकियां शर्म की मौत मरती हैं, जीवन में बची रह जाती हैं, लेकिन बुरा संयोग था कि काकी लाला की (चौथी वाली) नई कार में व्‍यूटी-सैलून से लौट रही थीं कि नगरपालिका की बस के एकदम सामने आ गईं. ड्राईवर, कार और उनका ऐसा कचूमर निकला था कि दुर्घटना के बाद किसी की पहचान नहीं हो पा रही थी. जबकि पिछले ही हफ्ते मां को रसोई में खड़ी काकी बता रही थी कि पता नहीं, जीजी, तुम अब भी कैसे बस में यहां-वहां आती जाती रहती हो, मुझे तो अब जोर डालने पर भी याद नहीं आता कि बस में बैठकर लगता कैसा है!

(एक राज़ की बात बताऊं, किस्‍सा मेरा गढ़ा नहीं है, एक अफ्रीकी उपन्‍यास पढ़ रहा हूं, नाम नहीं बताऊंगा, आइडिया वहां से उड़ाया है)

Monday, July 29, 2013

बात कहीं नहीं पहुंचती..

थोड़ी देर तक हाथ पर हाथ धरे, कैसे-कैसे तो अरमानों का संसार (ज्‍यादा, बुखार) खोलकर, फिर बातें जाने कहां चली जाती हैं. खामख्‍वाह लड़की पीछे ‘तुम न जाने किस जहां में खो गए,’ गुनगुनाते रहने के लिए छूटी रह जाती है. या फिर हारकर ‘चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया,’ के सुर में रोने लगती है. या मदन मोहन ही, बहानों की आड़ में, खुद को भुलाने लगते हैं. क्‍या मतलब होता है आखिर, ‘पी की डगर में बैठे मैला हुआ री मेरा आंचरा, मुखड़ा है फीका-फीका, नैनों में सोहे नहीं काजरा, कोई जो देखे मइय्या, प्रीत का वासे कहूं माजरा, लट में पड़ी कैसी बिरहा की माटी, माई रे, मैं कासे कहूं पी अपने जिया की,’..

सिर्फ़ रोना रह जाता है, बातें साथ नहीं रहती, (बकौल फिर, मदन मोहन, पाकर भी नहीं उनको मैं पाती), इसके बाद फिर जानने को बचता क्‍या है? टूटे खपड़ों से बरसात के आंसू टपक-टपककर चूते हैं, ‘तुमसे कहूं एक बात’ की फ़रेबी नक़ाबों में खुद को छुपाकर, उम्‍मीदों के अंधेरों को कैमरा अपने अंधेरे में बांधकर पेश करता है, कितनी भी कही जाय बात कही जा पाती नहीं, ‘हल्‍की-हल्‍की’ ही नहीं, हलक में ही रहती है..

छोटे शहरों की यादों की पीली बत्तियां टिमटिमाती, कौंध में कुछ पल कांपती जलती, फिर बुझी जाती हैं. एक आवारा लड़का दोपहर के बरसाती अंधेरों में साइकिल से पानी और हवा को चीरता कहीं के लिए निकलता, रास्‍ते में घरछूटी किसी लड़की की मदद की उम्‍मीद में, कहीं और पहुंच जाता है, बांस वाले पुराने छाते के बावजूद मधुकर बाबू डेरा पहुंच नहीं पाते, स्‍कूल के कमरों में पानी घुसा आता है, बच्‍चे बेंच पर उछलकर चढ़ जाते हल्‍ला मचाने लगते हैं, परिड़ा सर गीली धोती से अपना गीला चश्‍मा पोंछते मिमियाने लगते हैं कि अपने जीजा सत्‍तब्रतो के कहे उन्‍होंने जीवन कहां उलझा लिया, बात इस समूचे के दरमियान, कहीं नहीं पहुंचती.

‘तुमसे एक बात कहूं, काका?’

लीला मुझसे दो हाथ की दूरी पर खड़ी है, और उसके दोनों हाथों में कुल्‍फी का तिकोना फंसा है.

कहो, मैं कहता हूं.

लड़की दो कदम आगे आती है, मगर उससे पहले, उसके हाथों की कुल्‍फी मेरे मुंह में गायब होता है. चीखती लड़की को जवाब में मैं कुछ कहता नहीं, कुल्‍फी के बर्फ से रंगे दांत दिखलाकर इशारों में समझाता हूं कि बात कहीं पहुंचती नहीं.

मां ने देखा, मैं भूल गया..











खुली आंखों के सपनों में मां
फिर फेड-ईन होती है
छींट के अंचरा से मुंह पोंछती
दम लेती, लजायी, माफ़ी मांगती
जाने कहंवा गुमाय गई थीं बच्‍चा
रिक्‍शावाला पैसो ज़ादे मांग रहा था
अउर साड़ी के खूंटा हमरा हरमेसा
के खाली, जनते हो, केतना गजन गुजरकर
आई हूं तहरे कानी, कवने सिप चढाके
कवने मुसलमानिन के गांव भेज दिये थे बच्‍चा
केस हमरे से ज़ादा पाक गया लेकिन लरिकहानी
तोहार छूटी नहीं, पुरईन के केतना परेसान किये
पहचनबो नहीं किये अब तलक, अउर देखो, हम
अपना बंडलो जाने कहंवा तो भूल आये, बाबू
ई कवन दिसा के सपना है, संझा ले घर हम चहुंप
जायेंगे न, बिलाग में सगरे दिन हमके
जिन उलझाये रखना बच्‍चा ?

गनीमत हुई, ब्‍लाग में उलझा मैं
मां को सपने में पहचानने से भूल गया.

घर कहां है.

लुंगी को पैरों के बीच खोंसाये, घर के अपनेपने में अनमना आदमी सोचता कुनमुनाये कि घर कहां है, अच्‍छा नहीं लगता. ताज़ा बनी चाय की चुस्‍की जीभ पर घर का स्‍वाद नहीं चढ़ाती. नहानघर की दीवार अजनबी लगती है, आईने में अपना चेहरा किसी और का मांगा लगता है; अखबार में लिपटी बाज़ार की चार चपातियां, कुर्सी के हत्‍थे पर छुटा गमछा बोलता है हम घर नहीं हैं, हमको घर ले चलो. मगर कौन-से नक्‍शे में कैसे उंगलियां फिराकर किधर ले चलें, भाई?

पिछड़े समाजों के लिथड़ों में अझुराये वो दीन अभी भी सुखी हैं जिनकी छाती और पीठ को दो दीवारें रोके हुए हैं. पचास और पांच सौ कदमों का भूगोल अपने में बझाये हुए है. जिनकी देह पर ज़रा-सा कपड़ा और गोड़ में उतना भर ही सफर है. जिनकी थकी चमकती आंखों में भूख का प्राथमिक ककहरा अभी उदासियों की उलझी शायरी में नहीं बदला, जिनकी एक गंगौली है और अपने अलीगढ़ और नखलऊ में हाथ और कांख का पसीना सूंघकर उनके पास उनकी गंगौली लौट आती है और मन भराये वो सुखी हो लेते हैं. सुखी न भी हुए, होने की उम्‍मीद में एक बरसाती नाला कमर तक हेलते हुए हंस लेते हैं. हंसी की इन फीकी तस्‍वीरों में घर का एक उदास अक्स बुन जाता है, कमज़ोर काया के सींक-से पैरों वाली, सस्‍ते फ्रॉक की सजावट में दो बच्चियां आपस में उंग‍लियां फंसाये भागती दोपहर का भोजन पाने स्‍कूल पहुंच जाती हैं, क्‍योंकि उनके पीछे, टूटी दीवार पर कुहनी टिकाये, कद में उनसे बस बित्‍ता-भर ऊपर निकली एक कमज़ोर मां एक कमज़ोर घर में उनकी राह तकती बैठी होती है, और एक बकरी के मिमियाने और डिब्‍बे में रोपे तुलसी के कुनमुनाने में घर का एक ख़याल रह-रहकर सिर उठाता मुस्‍कराता मिलता होता है.

.. लेकिन फिर एक और मां होती है, पुरइन, बच्‍चों से छुटी, अकेली; ज़माने और समय के बीचों-बीच बसा, मगर उतना ही ज़माने और समय से दूर, गांव में पड़ोसिन से बतियाती, ज़रा-सा सौदा-सुलुफ खरीदने के बहाने बाहर हवा पहचानने निकली, जबकि मन रह-रहकर उसकी छाती से निकलकर उड़ता बच्‍चों को ढ़ूढ़ने निकला जाता हो, और वह खुद से न भी पूछती हो, तो भी अंतस में कोई मुंह दाबे, उससे पूछे जाता हो कि हे अम्‍मन, घर कहां है?

दूर अपने माथे के अंधेरों में उलझी एक और पुरइन मां होती, अस्‍पताल के बिछौने पर अपनी खरखराती सांसों को सुनने की कोशिश में जूझती, हारती, उंगलियां फैलाकर बिस्‍तरे के उस कोने को टटोलती जहां अभी दूर शहर से उससे मिलने आया बेटा आई-फ़ोन पर दूर दुनिया की खबर लेता बैठा, अपनी मां की खबर से रह-रहकर छूट जाता, पत्‍नी के एसएमएस का जवाब सोचता, परसों वापसी की फ्लाईट की इत्तिला करता, ज़माने पहले इस सवाल से मुंह चुराकर निकल आया होता कि घर कहां है.

मालूम नहीं घर कहां होता है. दीवार ज़मीन अहाता बरामदों में शायद नहीं ही होता. शायद आंसुओं से भीजकर सूखते किसी गाल की नमी, कंधे पर गिरते सांसों की गरमी में, उंगलियों में दबी किसी किताब के पन्‍नों के बीच, उमगते मन किसी ठिकाने तक पहुंचने की उम्‍मीदबर खुशी में, किसी के आने की आहटों में, छिपा होता है, सचमुच का, हाथ चढ़कर थिर हो जाये जैसा कोई घर नहीं होता.

घाना से छूटी, उसका गाना गुनगुनाती, देखिए, ताइये सेलासी घर की कहानी क्‍या बताती हैं. और भीड़ के बीच सबके होकर सबसे अकेले चलते गए, पिको आयर.


बरखा रानी ज़रा ठहिर के बरसो!














मैं जो बरखा होता
बरसने से आजिज आता
जरा बरसकर बहुत लजाता
पूछकर बरखता कि कौन घर’
कौन गांव, भाई, बहुतै आपद आई?
कोठारे ओसारे अंगना
सब ई हम्‍मर चुवाई?
मुआफ़ी करो मामी
मौसी, जीयन, काकी, ताई
गलती भई, हम त रहे
पड़ोसी के दुआरे आई
इतने महीने की भूख रही
तनी ज़ादा डकार लिए
होश रहा नहीं बइठहीं
इत्‍ता जल निकाल दिये
जा रहे हैं दुबारा संभलके आवेंगे
मुंह पे रुमाल अउर आंख पे
कजरा मां कसम जे सजायेंगे
मुकेस जी का गाना त अल्‍ला किरिया
सगरे गांवो हल्‍ला करे
तब्‍बो न बजवायेंगे!

Friday, July 26, 2013

दिन-चिरैया..

चलना मुहाल है. चलने में बहुत शोर है. पैर उठता नहीं कि हल्‍ले जाग जाते हैं. मानो ठीक पीठ पीछे किसी प्रचंड ऑर्केस्‍ट्रा का प्रचंड रिहर्सल चल रहा हो. पैर इस ऑर्केस्‍ट्रल अनुगूंज में गुम जायेंगे. बड़ी गड़बड़ हो जायेगी. पैरों की संभाल जरूरी है. हाथ पैरों को बचा लें. मगर हाथ ही कहां हिल रहे.

हाथों को पाला मार गया है. बरसात की सीलन है या ठहरी हवा, कि खिड़की की फांक से दिखते ऊपर आसमान में स्थिर डैनों के साथ उड़ते पंछी, क्‍या जाने किसका असर है कि हाथ स्थिर हो गए हैं. उधारी के हाथ हो गए हैं. दो हाथ की दूरी से मैं उधारी के हाथ को सिगरेट की राख झाड़ता देखता हूं. चिल्‍लर उठाकर मेज़ पर रखता और फिर गत्‍ते की कटी तलवार की तरह झूल जाता देखता हूं.

देखना मुहाल है. जैसे इतनी चीज़ें हो देखने को और आंखें लहक जाती हों कि कहां जायें, कितना-क्‍या देखें. देखने के कितने सिलसिले हैं, मुंदी आंखों को इतना दीखता है जगी आंखें कितना देखना प्रोसेस करती रहें. आंखों को चश्‍मे में लपेटकर देखने की कोशिश मत करना क्‍योंकि अनुभव से जानते हो तब चश्‍मा मुहाल होगा.

हवा का एक आवारा तिनका कांपता आकर उंगलियों पर बैठता है, उंगलियां आजिज़ आकर कहती हैं, हटो, देखते नहीं, खुद हम अपनी खातिर मुहाल हुई जाती हैं? पूरी अपनी कहती भी नहीं और उंगलियां निढाल हुई जाती हैं.

बस एक पंखा है जो घूमे जाता है. की-बोर्ड अधलेटा कुनमुनाता कि अभी रहूं जागा, कि मैं भी मुहाल हुआ जाऊं?

Thursday, July 25, 2013

पैट मैथेनी, चार्ली हैडेन, टूट्स थ्‍येलमेंस की संगतकारी..

बहेलिया का बहंगी में कौची का खजाना लुक्‍कल है हो?.. दिपुआ त अप्‍पन शरीफा अउर आम सब चाउर के बोरा में लुकाइल रहिस है, बब्‍बन-बो जइसे बोरी के गेंहू को सल्‍फास के गोली से बचा लेती हैं.. कइसन अन्‍हारा का सांझी है, महताब मियां?

हुआं ईनारा का पीछे कउन शेर पढ़ि‍स रहा रे,
अंगड़ाई भी वह लेने न पाये उठा के हाथ,
देखा मुझे तो छोड़ दिये मुस्‍करा के हाथ?

दीवारों के लगले मत जाइये, मंजूर भैया, बगिल-बगिल निकल जाइये, आदमी के गुजरे काबिल गली में जमीन न बची, ससुरन, हिंयां..

बड़कन की हियां बात होय रही, हुआं कवन खांसा रे?
खांसे नहीं, जब्‍बार साहब, मुन्‍नन पादे हैं, बड़ि‍का वाला!

हम त जब शहर जायें, या रेलवा में सफ़र करें, कवनो किसिम के बाथरुम होवे, भुले से उनकी ओर नज़र न करें, क्‍योंकि जान्‍यो हौ, खाला, ऐसी गंदगी पे एक बार हमरी नज़र गई नहीं कि मेदा का सब बाहिर फेंके लगता है!

हूं उधर तार कवन छेड़ा है रे, दुल्‍लन?
सफेद चमड़ीयन के दू ठो मेहमान हैं, मौसा, जाने कैसी दुखती की तान रहे?

दो पुरानी चीज़ों की फिर चिपकाई..

अचक्‍के
रोज़-रोज़ हंसता, बेमतलब
जाया होता दीखूंगा, अपने
शरम में मुंह चुराता, इस गली
उस सड़क यूं ही आता-जाता
फिर देखोगे एक दिन अचक्‍के
में ही मिलूंगा कभी

जैसे खुद को भी तुम पाओगे
ऐसे ही कभी गोपन क्षणों
अप्रत्‍याशित, अचकचाये हुए
धीमे स्‍वयं के करीब आते, दुलराते
भूले थे ज़माने से कुछ इस तरह
खुद को याद आते, उनींदे की उम्‍मीद
में मेरा नाम बुदबुदाते


रेशमी हवाओं के बीच सुरीली थपकियों
के गीत रचता, बहुत बार होगा
खुद तक को नहीं दीखूंगा मगर
तुम देखना तुमसे मिलूंगा.


आता है प्‍यार
दौड़ते हाथी की पीठ पर तुम्‍हें हंसता देखा था
स्‍टेडियम के गोल मैदान पर खिंचे चॉक की
फांक पर दौड़ता, बीच दौड़ गिरता देखा था
सपने में दीखी हों नीली पहाड़ि‍यां, उसकी
घुमराह रपटीली लाल पगडंडियों पर
अबूझ खुशियों में नहाया, भागते देखा था.


सपनों के ज़रा, एकदम ज़रा बाहर
रात-रात भर धारदार बरखते हैं
दु:ख के कंटीले तार, फिर जाने ऐसा क्‍या
कहां छुपा है, कि सब अंधेरों के बीच
जीवन आता है तुम पर इतना प्‍यार.


मई, 2010

Sunday, July 21, 2013

अजनबी सांझें..

जामा मस्जिद पर इफ़तार, फ़ोटो: मीनू देसाई
सांझों के साथ जाने क्‍या कैसी कोई रहस्‍यकथा चलती रहती है, कि उसके तार पहचानना, उसकी संगत में मिजाज़ दुरुस्‍त रखना, एकदम दुश्‍वार हो जाता है. इतने सारे रंगों में घुली, ‘कटी पतंग’ के किशोर कुमार वाले ‘ये शाम मस्‍तानी..’ में सजी, सांझ में कुछ ऐसा होता है कि हमारे हाथ लगाते ही रंगों की सारी गुफ़्तग़ू हवा हो जाती है. खाली सूनसान दूर-दूर तक बस एक रंगहीन मैदान तैरता, पसरा नज़रों में सवालों के जाल बुनता चला जाता है.. जबकि बहुत सारे तन्‍नुओं की तरह ‘बहके-महके-से गुज़र जाने’ की हमारी कहानी भी हो सकता था, आह, नहीं होता..

..तन्‍नू ने वह रास्‍ता पकड़ लिया जिससे उत्‍तर पट्टी वाले आज भी दसवीं का जुलूस लेकर गुज़रते हैं. उसको फुस्‍सू मियां के यहां जाना नहीं था. वह तो बस अकेला रहना चाहता था, ताकि बिछुड़ी हुई यादों से मिल सके और टूटे हुए रिश्‍तों को जोड़ सके. ज़मीन से आदमी का कोई रिश्‍ता ज़रूर होता है वरना रूम (रोम) के अज़ीम खंडहर देखने के बाद और अहराम से आंखें मिलाने के बाद कोई गंगौली के कच्‍चे मकानों और काली मिट्टी की तरह सोंधे-सोंधे लोगों में वापस आकर खुश कैसे हो सकता है! मिट्टी की इन इन दीवारों में तो कोई हुस्‍न भी नहीं है. काली मिट्टी के इन आदमियों में कोई ख़ास बात नहीं है. क्‍या रक्‍खा है इन हकीम अली कबीरों और मौलवी बेदारों में! क्‍या रक्‍खा है इन फुन्‍नन मियाओं और हम्‍माद मियाओं में! क्‍या रक्‍खा है इस झंगटिया-बो, इस सैफ़ुनिया, बछनिया, रब्‍बन-बी, कनीज़ और सक़ीना में! मगर लोग इन्‍हीं के लिए कलकत्‍ता, बंबई, कानपुर और ढाका के जीते-जागते बाज़ारों से लौट आते हैं. तन्‍नू ने ये बातें नहीं सोचीं. वह ये बातें सोच भी नहीं सकता था. वह तो सिर्फ़ यह जानता था कि गंगौली आकर वह खुश है. वह यह जानता है कि रब्‍बन की बूढ़ी आंख देखने के लिए वह तड़प उठा करता था और उसे सईदा याद आया करती थी जो छह बरस में बिलकुल जवान हो गयी है. वह मुस्‍करा दिया और फुस्‍सू मियां के घर का रास्‍ता छोड़कर सिब्‍तू मियां के घर से होता हुआ अग्‍गू मियां के घर में चला गया.

‘घड़ी में सांझ का क्‍या बखत हुआ है, भाई साहब?’

चुप. एकदम चुप.

सुनते हैं स्‍टेशन से लगी पीछे वाली सड़क पर आज फिर किशोर कुमार के कुछ पुराने गानों की चोरी हुई है!

Thursday, July 18, 2013

ज़िंदगी पूरी नहीं होती, जैसे गांव नहीं होते.. उर्फ़ प्‍यास और पानी..

जीवन कैसी-कैसी पटखनी खिलाता है, मगर लोग हैं कि उम्‍मीद फांकने से बाज नहीं आते! मूर्खता है गंवरपना है, क्‍या है जो लोगों को इस कदर, बेहयायी की हद तक, उम्‍मीदों के पालने हिलवाता रहता है? मातमी अंधे कुओं में घूमते लोग सपनों की आवारा पतंगें काटते रहते हैं, कैसे कितने कटे लोग हैं? जैसे, हकीम सय्यद अली कबीर ज़ैदी कटे हुए थे, कि पहली मर्तबा रेल का सफर क्‍या किया बरसों तक “रेल और उसके डिब्‍बों और इंजन की सीटी और गाड़ी की धड़धड़ाहट की बात करते रहे- और गांव के लोग मुंह खोले उनकी बातें सुना किये. बस, रक़ि‍याने के लोगों को कोई अचंभा नहीं हुआ, क्‍योंकि वे लोग व्‍यापारी थे और बहुत पहले से रेल में सफ़र कर रहे थे.” मगर रक़ि‍याने से बाहर के बकिया सब? सारा समाज तो व्‍यापारी नहीं हो जाता न! बड़े फाटक वाले बड़के सय्यद जंमीदार हों कि फुन्‍नन मियां माफिक छोटके, ऐसे मामूली जंमीदार कि पाजामा नहीं, लुंगी बांधते हों, वह भी सिली हुई नहीं, कसाइयों की तरह फेंटेदार लुंगी, कि अहीरों और भर टोले के हदबदाये लइकन हों जो स्‍कूल में दुपहरिया का खाना खाकर हलकान होने पहुंच जावें, सच्‍चाई थी “गंगौली के बहुत-से लोगों ने रेल नहीं देखी थी, क्‍योंकि स्‍टेशन गंगौली से कोई दस मील पर है और गाज़ीपुर बारह मील पर. इसलिए लोग ज्‍यादातर इक़्कों से सफ़र किया करते थे. और चूंकि मियां लोगों के ख़याल में दुनिया गाज़ीपुर की कचहरी के बाद ख़त्‍म हो जाती थी, इसलिए भी उन्‍हें नहीं मालूम था कि दुनिया में क्‍या हो रहा है और क्‍या नहीं हो रहा है.”

गंगौली की ही बात नहीं है, बड़का सिंघनपुरा के पड़ोस महरौली का होकर, गुड़गांवा के पड़ोस मेहरौली में रहते आदमी (या औरत) को कहां ख़बर हो पाती है कि दुनिया में क्‍या हो रहा है और क्‍या नहीं. या यही कि उसके जीवन का- बच्‍चों के लिए टिफिन बनाने और माहवारी बिलों की भुगतान करने और फेसबुक पर तीन तस्‍वीरें टांक देने से अलग- ठीक-ठीक मतलब क्‍या है? आता है समझ? एक अकेली झंगटिया-बो ही अपने अकेले में सोचती तने तार की तरह तनी नहीं जाती कि ‘जिस दुनिया में वह रह रही है वह उसकी अपनी दुनिया नहीं है.’ नज्‍जन और गफ़ूरन और सितारा किसी की वह दुनिया कहां होती है जिसमें वह रह रहे होते हैं!

“नज्‍जन की आवाज़ झंगटिया-बो की आवाज़ से भी अच्‍छी थी. वह अकसर रात-गये अपनी दोनों लड़कियों- दिलआरा और सितारा के साथ अपने लिए, और आसमान पर टपके हुए महुओं की तरह बिखरे हुए सितारों के लिए, और ज़मीन पर लड़खड़ाती हुई हवाओं और दीवारों से चिपकी हुई परछाइयों के लिए सोजख़्वानी किया करते थे.. और उनकी आवाज़ सुनकर झंगटिया-बो जाग उठा करती थी.”

चार बीघे खुदकाश्‍त के वायदे के लालच में जौनपुर छोड़कर गाज़ीपुर, और उसके पीछे गंगौली चले आये नज्‍जन की क़ि‍स्‍मत में कोई दुनिया थी, हो सकती थी? जवान हो रही उसकी बेटी सितारा, तीखे नाक-नक़्श, नमकीन सांवले रंग और गहरी भूरी आंखें और बड़े-बड़े गहरे सियाह बालों वाली, कि ‘उसके बाल इतने बड़े थे कि अगर वह चाहती जो जाड़े में उन्‍हें ओढ़ सकती थी’ की मलिका सितारा की, दुनिया हो सकती थी?

“सितारा जानती थी कि अब्‍बास उसी से मिलने आता है. हालांकि यह बात अब्‍बास ने कभी उससे कही नहीं थी. बस, होता यह कि अब्‍बास आता और वह न होती तो वह उदास हो जाता. और जब वह आ जाता तो बज़ाहिर तो उससे बेख़बर ही रहता, लेकिन उसकी आवाज़ में एक खनक आ जाती, और सितारा की नस-नस में कलियां चिटकने लगतीं.”

कितनी तो ज़ाहिल कैसी ऊटपटांग दुनिया थी और वैसे ही बेसिरों के अरमान, कि “..वह कुछ कहना ही चाहती थी कि आसमान भनभनाने लगा. सबकी आंखें आसमान की तरफ़ उठ गयीं. लोहे की एक चील-सी दिखाई दी, जो पंख हिलाये बिना उड़ी चली जा रही थी. तमाम औरतें एक-दूसरे को हवाई जहाज दिखलाने लगीं. बच्‍चों ने आंगन में उछलना-कूदना शुरू कर दिया. कैसर तो उसको दिखा-दिखाकर पेशाब करने लगा. सितारा और दिलआरा, जो उस वक़्त कैसर ही की तरफ़ देख रही थीं, घबराकर शरमा गयीं. फिर हवाई जहाज़ एकदम से आंगन पर आ गया तो कुछ परदेवाली बीवियों ने आंचल की ओट कर ली और कुछ ‘उई’ और ‘माटी-मिली’ कहती हुई गिरती-पड़ती दालान में भाग गयीं.”

ऐसी ही आपाधापी, कन्‍फ़्यूज़न के घटाटोप में अब्‍बास ने सितारा को अकेली पाकर, ज़रा-सा इतनी तो बात कही थी कि “तुम इतनी खूबसूरत क्‍यों हो जी?” और इस, इतनी ज़रा-सी पूछ में नज्‍जन और गफ़ूरन मीरासन की बेटी सितारा, जवाब तो खाक़ क्‍या देती, जो ‘अपनी सांसों की झाड़ि‍यों में उलझ-उलझकर गिरी-गिरी पड़ रही थी’, अलग से अपना कोख रंग लिया. और वैसे नहीं रंगा जैसे झंगटिया-बो की बिटिया बछनिया ‘कभी-कभार वज़ीर मियां के लड़के बिक्‍कन के साथ दोपहर के वीरान किये हुए किसी गलियारे में या कोठे पर व्‍याह के खेल खेला करती थी. बिक्‍कन मियां बनता और वह बीवी. और जब एक दिन उसके पेट से एक केंचुआ गिरा तो उसने चुपके से बिक्‍कन के कान में यह कहा कि उसका पेट गिर गया है.’

गोकि ‘नौहों की धुनें इस एहतियात से बनायी जाती थीं कि ईद की सिवैयां शरमा जायं’, और टामी बाई की लज़ीज़ बातें सुनकर लिखनेवाले ने जान लिया था कि ‘शब्‍द की कोई हैसियत नहीं होती.. शब्‍दों से परिचित हुए बिना भी बातें सुनी और समझी जा सकती हैं.’ मगर नज्‍जन की बेटी सितारा अब न बछनिया की तरह बच्‍ची थी न लेखक की तरह समझदार, किसी काल्‍पनिक केंचुए को हटाकर वह अपना पेट बचा नहीं सकी, बेटी की तक़दीर बचाने की उसकी मां गफ़ूरन को यही गरज सूझी कि गंगौली से उस परिवार का घर उठ गया!

“इस हंगामे में भला यह कौन सोचता कि कल्‍लू की ख़लवत में बसाया जानेवाला परिवार कहां गया और क्‍यों गया. अब्‍बास ने उन्‍हें दो-चार दिन याद ज़रूर किया, मगर फिर उन्‍हें वह भी भूल गया. उसे एक जुलाई अच्‍छी लगने लगी. मगर गफ़ूरन गंगौली को न भूल सकी. बात यह है कि वह सितारा की मां थी. उसने झट से सितारा को व्‍याह दिया कि इसके सिवाय कोई चारा न था. उसके यहां सतमासा बच्‍चा हुआ. एक बड़ा तंदरुस्‍त बच्‍चा. इस बच्‍चे को सितारा के ससुरालवालों ने शक से देखा. सितारा के मियां ने उसे तलाक़ दे दी. वह गाज़ीपुर वापस आ गयी.
और उसने अपने बेटे का नाम अब्‍बास रखा.”

कहां से आता है इतना कलेजा कि ऐसी हाराई में भी मन उड़ाता है अरमानों के पतंग, गाता है ‘दिल मेरा एक आस का पंछी..’, लिखनेवाला लिखता है दिल को मरोड़ने, भिंजोनेवाली, ऐसी बेशऊर बेमक़सद कहानियां?

Monday, July 8, 2013

फेलियर ऑफ़ मिस्टर कैफ़ी एंड अदर्स रिगार्डिंग ए सर्टेन रीडिंग दैट वॉज़ सपोज्ड टू हाउस मिस्टर बिस्वास..

कभी फ़ुरसत में पढ़ेंगे, मगर कभी फ़ुरसत होती कहां है, जबकि ग्‍लोबलाइज़ेशन तक अभी बीस बरस दूर है, फिर भी मन, अभी से, कैसा अनमना बना रहता है, मजाज़ ने (या दाग़ देहलवी ने?) इस बाबत क्‍या तो वह मौजूं शेर कहा था? खिड़की के सिल पर कुहनियां टिकाने को झुकते हैं तो देह टिकने की बजाय, लपकती नीचे चली आती है, फिर नज़र आता है मरदूद सिल तो कहीं कोई है ही नहीं. सिल क्‍या, सिल की संभाल को कोई खिड़की भी कहां है? फिर किन ख़यालों में गुमे थे, कहां गुमे रहते हैं, भई.. बेमुरव्‍वत किताब किसी जाहिल ने खरीदकर दी थी मगर जाने कहां धरी पड़ी है, ओह, कैसे नामुराद दिन हैं कि बेसाख्‍ता दिल में लाईनें उमड़ने लगती हैं, ‘आज सोचा तो आंसू भर आये, मुद्दतें हो गई मुस्‍कुराये..

कैफ़ी अकेले नहीं थे कि अपने होने में न होकर कुढ़ रहे थे, वुल्‍फगांग अमेदियस ने भी नहीं पढ़ रखी थी, बिस्‍वास का घर या व्‍हॉटेवर, ‘फिगारो’ रचने की आड़ में दरअसल वह भी चिढ़ ही रहा था, ‘अब मुझे कुछ न पता कौन हूं और करता क्‍या..

मोत्‍सार्ट से ही प्रेरणा लेकर, किताब न पढ़ पाने की, कुछ सदियों बाद श्रीयुत आनंद बक्षी ने भी वह अपनी मशहूर कालातीत रचना, कोयलकंठी लताश्री की सरस्‍वतीवाणी में, रची, ‘ना कोई उमंग है ना कोई तरंग है, मेरी ज़िंदगी है है क्‍या इक कटी पतंग है.’

लब्‍बोलुबाब यह कि महान रचनाएं घटित हो जाती हैं, सीधे-सीधे एक किताब पढ़ना अलबत्‍ता नहीं हो पाता. कम से कम कैफ़ी, वुल्‍फगांग व श्रीयुत बक्षीश्री से तो नहीं ही हो सका था.. (वैसे आजकल देख रहा हूं मुझसे भी नहीं हो पा रहा, पढ़ने की जगह मैं भी रचने लगता हूं, जैसे यह भी उत्‍कट रचनाक्षण ही है)

बिदियासागर की खुशकिस्‍मती थी, कि पहले पढ़ लिया था, पिता का जीवन, बाद में सिर्फ़ उसकी नक़ल उतार रहे थे (नकल ही है, और क्‍या)..

"The future wasn't the next day or the next week, or even the next year, times within his comprehension and therefore without dread. The future he feared could not be thought of in terms of time. It was a blankness, a void like those in dreams, into which, past tomorrow and next week and next year, he was falling..


..a boy leaning against an earth house that had no reason for being there, under the dark falling sky, a boy who didn't know where the road, and that bus, went..

Already yesterday, last night, was as remote as childhood. And mixed with this fear was this grief for a happy life never enjoyed and now lost..

He went to his room, lay down on the bed and forced himself to cry for all his lost happiness."

-- Disjointed lines from a novel, Naipaul's.

Sunday, July 7, 2013

गैरबराबरी गुंठियां, इंडिया..

“पैसा, पैसा, पैसा, पैसे के सिवा हमारे पास सोचने को और कुछ नहीं? यही, यही, इतना भर ही है हमारा जीवन?” – मुकुदंन, रात के सवा नौ बजे, सिनेमा हाल से बाहर पीछे की नल्‍ली गली में.
 “’पैसा मिलना’- वेरियेर में हर बात को निर्धारित करनेवाला जादू का मन्‍त्र यही है. यहां की तीन-चौथाई से अधिक आबादी के लिए यह अपने आप में एक विचारणीय विषय बना रहता है. इतने सुन्‍दर दिखाई पड़नेवाले इस छोटे-से शहर में हर बात का असली कारण ‘पैसा मिलना’ ही है.” – स्‍तान्‍धाल, ‘सुर्ख़ और स्‍याह’, 1830 का फ्रेंच कस्‍बाई ज़माना.
 “द रिचनेस ऑफ़ द हार्ट, सेंसिबिलि‍टीज़, इमोशंस, इट्स ऑल फेक, ए पुट ऑन एंड शो टू डिस्‍ट्रैक्‍ट एंड कन्‍फ़्यूज़ वलनरेबल व्‍युअर्स, जहां टमाटर खाना तक दुश्‍वार हो, जहां अभी भी हर वर्ष दुनिया के किसी भी हिस्‍से से ज्‍यादा बच्‍चे डायरिया या आम बिमारियों की बेमतलब मौतें मरते हों, सोचो, पांच साल से कम उम्र के सत्रह लाख, हर साल.. और पांच साल से ऊपर जिन्‍हें किसी तरह जीवन का ईनाम मिल जाता है उसमें भी 48 फ़ीसदी उपयुक्‍त आहार के अभाव में कटे-पिटे बड़े होते है. इरिट्रिया जैसे झंट मुल्‍क में भी हमसे बेहतर बच्‍चों का पोषण है, और ऐसे मुल्‍क में घंटा आप सेंसिबिलिटीज़ की बात करते हो!” –प्रोमोद कोमार गांगोली, चिरैया टांड़ पुल के नीचे, अभी-अभी गंदे-उबकाई मारते दीवार पर पेशाब करके फारिग होते, पैंट में उल्‍टा हाथ पोंछते हुए.
 “South Asia fares distinctly worse than sub-Saharan Africa. More than 40 per cent of South Asian children (and a slightly higher proportion of Indian children) are underweight in terms of WHO norms, compared with 25 per cent in sub-Saharan Africa... Likewise, the most basic health measure that any government can provide for its people is to immunise very young children but, in India, only 43.5 per cent of children are completely immunised, compared to 73.1 per cent in Bangladesh: “India is falling behind every other South Asian country, with the exception of Pakistan, in terms of social indicators.” For instance, life expectancy was the same in India and in Bangladesh in 1990 but today it is “four years higher in Bangladesh than India, 69 and 65 respectively. Similarly, child mortality, a tragic indicator, was estimated to be about 20 per cent higher in Bangladesh than India in 1990, but has fallen rapidly in Bangladesh to now being 25 per cent lower than in India by 2011.
In sub-Saharan Africa, only eight out of 25 countries have immunisation figures as bad as India’s. India’s adult literacy is not quite the lowest in the world but, at 65 per cent, it is the same as in Malawi and Sudan. Adult literacy in China, by comparison, is 91 per cent. So bad is the situation that Sen and Drèze go as far as stating that Indian democracy is “seriously compromised by the extent and form of social inequality”. – डैरलिंपल, न्‍यू स्‍टेट्समेन में अर्मत्‍य सेन और ज़्यां द्रेज़ से सिर भिड़ाते हुए.
 “मगर पिछले दो दशकों में इंडिया कितना मनीड हुआ है, एक्‍सेप्‍ट करोगे नहीं? भेड़-बकरी की तरह बांगाली रा योरोप-टुरोप घूमने जा रहा है? ये सही है कि सब्‍जी खरीदारी करते समय अब डर लगता है, पेट्रौल का रेट भी कब बढ़ जायेगा सोचके धुकधुकी बनी रहती है, बट अमीराती तो बढ़ा है, हां कि ना?” – नीलोत्‍पल मोइत्रा, बांस बहाल बस डिपो के बाहर गुमटी पर सिगरेट खरीदते, और सिगरेट की कीमत पर हुज्‍जत करते हुए.
 “A quarter of the Indian population.. remain effectively illiterate”. Physical infrastructure is badly neglected: “The general state of public services in India remains absolutely dismal, and the country’s health and education systems in particular have been severely messed up.” Even today, a third of Indians do not have electricity, compared to 1 per cent in China. “Half of Indian homes remain without toilets, forcing half of all Indians to practise open defecation.” Wages in manufacturing in China have grown by 12 per cent since 2000, compared with 2.5 per cent in India, and 90 per cent of Indians still work in what is referred to as “the informal sector”. While India has climbed rapidly up the ladder of economic growth rates, it has fallen behind Nepal and Bangladesh in the scale of social indicators. Brazil, with much slower economic growth, has a far better record of poverty reduction. India remains an oddity among the Bric countries: “India’s per capita GDP is less than half of China’s, one third of Brazil’s and one fourth of Russia’s.” – डैरलिंपल, वही.
 “एइ शोबाई किंतु भीषोण.. दुर्दांत, दादा!” – राजा घोष, चार दिन बासी मिलावटी तेल में सिंघड़ा छानते हुए.

Saturday, July 6, 2013

बीतना

इकहरे दिनों की इकहरी बातों के बाहर भेदों का जो कोई भरपूर संसार होगा, भहरती बरसातों-सा वह अपना भी कभी यार होगा, कि हम बुद्धू के बुद्धू के बुद्धू न रहेंगे, कि एक दिन होगा ऐसा, कि ऐसा ही होगा, हेड टू टो का एक समूचा पूरा दिन, बुद्धि बुलबुल की गलबंहिया अझुराये, कुछ लजाए और कितनी सारी तो ऐंठ में पिघले-पिघलाये, एक छोर से, अन्‍हरियाये पोरों से छूटे, फिसल-सिल फिसले, हम किन मुंहअंजोरों में खुलें, आह, कैसे तो खिलेंगे, एक पूरा समूचा!

कैसे तो बीतता यह जाता है जीवन, साथी, कैसी मुर्दा उदासियों और बेमुरव्‍वत लाचारियों में, कैसे तो सांस अकड़ी रहती है, दिल की गांठ, अखबारों व जीवन के जाने किन निर्दयी कारोबारों के गिरह बंधे रहते हैं, आकर कोई समझाता नहीं, देखें कहां से समझें किस क्षण शुरु कर दें कहां से करें की डगर अंधेरों में घिरी सोती है, शाम का सूनसान चीखता, कोई लालटेन की आग ज़रा-सा गिराता नहीं, कैसे तो बीतता जाता है यह जीवन, साथी!

कितने तो वृक्ष हैं सुदूर प्रातंरों तक फैला वन, जीवनियां कितनी सारी, मार्मिक सघन, कांपती रातों में भय का भीषण प्रचंड देश जितना जो दीखता है उतना ही तीक्ष्‍ण व विलक्षण यह संभव कि नीति की एक नाव इस नदी में उतर सकती, सब बाढ़ों अकालों भौकालों पर भारी, लेकिन उतरती नहीं, अगवायी नाव, राज़ वह छिपा रहता है, सब कहीं राजनीति ज़मीन नापती है उसे घर के बच्‍चे का दुलार नहीं देती, रोज़ सारी दुनिया की संगत में बड़ा होता रह सके मनुष्‍यता का वह प्‍यार.

हम देखते रहते हैं देखते देखते, जैसे जीवन कोई हिन्‍दी सिनेमा हो बेशऊर उछलने फुदकने के बीत जाने रीत जाने की कहानी, इकहरे दिनों की इकहरी बातों के बाहर भेदों का भरपूर संसार रहता छिपा. 

योसेप का जीवन (अधूरा)..

किसी को उद्धृत कर देने मात्र से कोई किसी की वास्‍तविकता का साक्षी नहीं हो जाता, उद्धरण मन के गमलों में किसी ख़ास दिन किसी ख़ास क्षण किसी ख़ास मिजाज़ बहल आये, प्रकटाये फूल हैं, इससे ज़्यादा और क्‍या हैं, कुछ नहीं, कुछ भी नहीं, मीलार्ड! (बिछड़े सभी बारी-बारी.. पृष्‍ठागार में अजनबी देस की अजनबी ज़बान का वह बेशऊर गीत अब भी बजता रहा, ओह.. कैन समबडी गो एंड शट् दैट ओल्‍ड मग, प्‍लीज़? ओह!) जुसेप्‍पे ने भी योसेप सोरोज़ को उद्धृत मात्र किया था, उसके जीवन की वास्‍तविकता के साक्ष्‍ताकार का प्रस्‍थान-बिंदु नहीं हो रहा था, हो नहीं सकता था! जुसेप्‍पे ऑर हूएवर.. जैसेकि मैं ही अपने पिता से जीवन में इतनी मर्तबा मिला हूं, इतने मौकों पर उन्‍हें क्‍वोट किया है, मिस्‍टर, खुद को किया है, बट कैन आई से, इवन विद् एन आयोटा ऑफ़ कॉन्फिडेंस, दैट आई नो फादर, ऑर इवन माईसेल्‍फ़ फॉर दैट मैटर? इज़ नोइंग समबडी दैट ईज़ी? कम ऑन, मीलार्ड, डोंट मेक मी लाफ!

लब्‍बोलुबाब यह कि जुसेप्‍पे योसेप को क्‍वोट भले कर सकता रहा हो, जानता नहीं था. वैसे ही जैसे मैं अपने पिता को, या अपनी सिगरेटों को, नहीं जानता. सिगरेटों को सिगरेट बनानेवाली कंपनियां भी नहीं जानतीं, अपना मुनाफा और सरकार के भीतर अपनी नेटवर्किंग जानती हैं, सिगरेट की सच्‍चाई कोई नहीं जानता. किसी शायर ने कहा है ऐसे ही नहीं कहा:

डरता हूं कहीं खुश्‍क न हो जायेगा समंदर
राख अपने आप बहाता नहीं कोई
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
एटसेट्रा एटसेट्रा एटसेट्रा..

वी ऑल नो कि जीप बम दुर्घटना के एक बेमतलब हादसे की एक बेमतलब कमउम्री में योसेप एक बेमतलब मौत का शिकार हुआ, उसके बेमतलब जीवन को बचाया न जा सका, अलबत्‍ता उसके जीवन के पीछे उसके चंद कागज़ ज़रूर बचे रहे (अभी भी अप्रकाशित, मल्लिकापट्टन व मध्‍यदेश के प्रगतिकामी वितंडावादियों की दु-र्दया! ).. चरित्रहंता और वितंडावादी, एक अन्‍य स्‍थानीय एनिगमा (अप्रकाशित, अगेन, कवि व विचारक) विक्रमादित्‍या विक्रमसिंघे की कृपा से.. इसके ढेरों प्रमाण हैं कि योसेप और विक्रमादित्‍या (कवि व विचारक) के बीच संबंध थे, अलबत्‍ता कितने घनिष्‍ठ थे यू-ट्यूब पर इसके वीडियो साक्ष्‍य नहीं (पृष्‍ठभूमि में बज रहे इस बेमुरव्‍वत गाने के हैं, बट व्‍हाई, गॉड, कैन समवन गेट अप एंड गो एंड शट् दैट ओल्‍ड मग, प्‍लीज़?).. सही है कि विक्रमादित्‍या की विकटता ने योसेप के कागजों (चंद) को बचा लिया, और इससे योसेप के जीवन के प्रकट व गुप्‍त जीवन पर प्रकाश पड़ने में मदद मिल सकेगी, मगर चूंकि विक्रमादित्‍य स्‍वयं कवि व विचारक रहे हैं, व कागज़ों की रक्षा के लिए सभी दस्‍तावेज़ों का उन्‍होंने अपनी वितंडावादी भाषा (व लिपि) में नकल किया हुआ है, बहुत बार तय करने में दिक्‍कत हुई (अभी भी हो रही है) कि डायरी (या व्‍हाटेवेर) के कौन से हिस्‍से योसेप के हैं और कौन से वितंडावादी विक्रमादित्‍य के!

एनीवेज़, नीचे इन विचारमणियों की संक्षिप्‍त नकल (हिंदी में) प्रस्‍तुत है, विस्‍तृत विवरण के लिए, कृपया, विक्रमादित्‍या विक्रमसिंघे के वेबसाइट पर लॉग इन करें..

“A sudden anxiety grips me all over, what is it? Is it love (really?), or just the idea of it?”

“जो एक के बाद दो और दो के बाद तीन की तर्ज पर जीवन की व्‍याख्‍या में विश्‍वास करते हैं, उनके बीच मैं किन विश्‍वासों के साथ रह सकूंगा, और नहीं रह सका तो मेरा अंत क्‍या आर्हेंतीना के उस महान चमकीले ब्‍युनेस आयरस के रियो दे ला प्‍लाता के तटीले नीरव सूनसान में होगा? मन के बीहड़, चोटिल, मर्मांतकारी रुपान्‍तरणों की ही तरह सभ्‍यताएं भी स्‍वयं को सदा कैसे स्‍थानान्‍तरित करती रहती हैं?”

चीनो अरब हमारा, रहने को घर नहीं सारा जहां हमारा, व्‍हॉट ईडियट रोट दिस? मारलन ब्रांडो और एंथनी क्‍वीन स्‍टारर ‘विवा ज़पाता’ देखकर अपनी पहली (तेल) कंपनी का नाम जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश ने ‘ज़पाता’ रखा था, कुड देयर बी एनी लॉजिक टू इट? इज़ एवरीथिंग इन लाइफ़ इज़ ए बिग जोक ऑर व्‍हॉट?”

“कभी लगता है सिर से पैर तक मैं तरह-तरह के दर्दों की कहानी हूं. कभी लगता है तरह-तरह के भूखों से भरी एक बड़ी भूख हूं. कभी लगता है आपस में उलझे, ढेरों सवालों की उमड़ती, एक वेगवान नदी हूं जिसके धारदार पत्‍थर लगातार आपस में टकराते हों. कभी लगता है.. मगर कभी, फिर, कुछ भी नहीं लगने की अंतहीन पथरीली उदासी भी तो खिंची रहती है, कब तक कैसे खिंची रहती है?”

प्रीतम आन मिलो, प्रीतम आन मिलो.. बट इज़ एवर देयर एनी प्रीतम रियल? रियली? आंट ऑल प्रीतम्‍स मैरिड टू देयर ओन लिमिटेशंस, देयर कन्विनियेंसेस? प्रीतम्‍स कैन नॉट कम एंड टेक अवे द बिग होल इन यूअर हार्ट, दैट इज़ द बिगेस्‍ट ट्रुथ ऑफ़ युअर स्‍टुपिडियेस्‍ट लाइफ़..”

“Mother loved my wife. I never expected such a wonderful daughter-in-law, she said. Her own situation was gloomy, with no money and her husband lost, and the life of the young couple gave her new joy. She went to the house on P. B. street with gifts she could ill afford, yodeling and prancing to delight her grandson. Early one sunny morning, when she was drinking tea with my wife, I came back from a walk with my son and announced, ‘Birds don’t fly away from a man holding a baby!’ and the two women burst into laughter at the expression of awe upon my face. ”

“मेरी किसी बात का उसे भरोसा नहीं होता, और वह हर चीज़ की शिकायत करती, जब मैं घर में मौजूद रहता तो मेरी मौजूदगी में, और मेरे न रहने पर जब-तब चले आनेवाले ज़रुरतमंदों, कर्ज़दारों, किन्‍हीं भी किस्‍म के तकाजादारों से; घर के मेज, बर्तन, दीवारों सबको मेरे खिलाफ़ गोलबंद करती रहती. शर्मिंदगी में मैं घर लौटने से कतराता शहर में आवारा फिरा करता, कभी सोचता दरिया में छलांग लगाकर इस रोज़-रोज़ के शर्म की कहानी का अंत कर दूं; मगर फिर अपने छोटे बच्‍चे की सूरत याद आती, अच्‍छे दिनों में पत्‍नी के निर्दोष प्रेम का स्‍मरण होता. अंतत: बेचारी औरत का क्‍या कसूर था, सच्‍चाई थी मेरे पास रोजगार नहीं था और घर चलाने भर तक को हमारे पास कभी पर्याप्‍त पैसे नहीं होते, न उसके होने की कोई उम्‍मीद बची थी..”

“It was not long afterwards that my wife left me and went and got herself re-married with another man who had a decent job in refineries in a distant land, and, let’s not talk about me, but hopefully, for her, it was end of her suffering.”

“For years afterwards, I remained convinced that the world was systematic for a child to become lost to his father, and I continued to expect that my son would reappear at some point—if not in real life, then at least in the list of names I sometimes read to this end. Lists of sports teams and prize winners, lists of committee members, lists of students sent on exchange visits, lists of convicts, lists of important poets, lists of patriots and botanists, lists of marriages, lists of academic appointments, lists of the approved, lists of the disgraced, and the lists of the dead.”

Wednesday, July 3, 2013

मंत्र

मालूम नहीं यह जीवन क्‍या करता है
खड़खड़ि‍याते डेढ़ कदम आगे कहां पड़ें
तब तलक खींचकर पीछे तीन करता है
गीली धुंधलायी आंखों के पेर, मन के अंधेर में
बेतुकी पगलायी हंसियों की ज़ि‍द करता है

कहता है वो कौन सी तो ज़हरघुली रात
झमझम की बरसात जंगली हाथियों की बारात थी
क़ि‍स्‍मत के फेर की ऐसी सब सारी कमीनी सभाओं
में लिये चलो टहलाओ मुझे, पूछना हिलाना बजाना, देखना
जानता हूं अपना नाम, दुनिया में अपने होने का सबब
अपने काम, देखना, तब भी हंसता हूं या चेहरे का रंग
पड़ जाता है जर्द, घर-गांव की बेतरतीबी भुनभुनाने लगता हूं
या छाती पर खुदी दुश्‍वारियां लंबी सांस खींचे थाम लेती हैं
चुप्‍प चुप्‍प चुप्‍प.. 

अंधेरा बढ़कर, अपने ही दुश्‍चक्र में उलझ टूट जाता है
या जागी आंखों के सपने में बहली आयी किसी तस्‍वीर के फ़रेब में
कोई बच्‍ची चिड़ि‍या पंख फड़फड़ाने, अपने को उड़ाने लगती है
दबी आवाज़ गुनगुनाने, कि यह जीवन क्‍या करता है

सिर झुकाये, नम आंखें गिराये, कोई मुझ-सा ही

दूर खड़ा, खड़खड़ाता, अपने से लजाने लगता है. 

द आर्ट ऑफ़ द नॉवल, एंड हार्ट..

हार्ट हैज़ नो सेंटर, इल कोम्‍पान्‍यो, जुसेप्‍पे ने हंगारी मूल के यहूदी योसेप सोरोज़ को क्‍वोट किया, उसके कोनों से खून रिसता है तो पूरी दुनिया उसकी दुश्‍मन होवे, वह किसी का नहीं होता!

बड़ी लड़ाई के बुरे दिनों में योसेप की जवान, लंगड़ी मां बच्‍चे को गुदड़ी में छुपाकर किसी तरह मॉंट्रियल, कैनेडा पहुंची, मगर आसरा अंतत: अरकान्‍सास के घेनेरों में मिला, एक आर्मेनियन ग्रोसरी स्‍टोर की दुछत्‍ती में पैर और पीठ टिकाने भर को जगह मिली, जहां अपलक बच्‍चे को निहारती जार-जार रोती लंगड़न उम्र से पहले बूढ़ी हुई, जबकि बच्‍चा बिना कुछ समझे बात-बात पर खिल्‍ल हंसता ज़माने को ताज्‍जुब भरे औंजाये रहता, और समझने की जब ज़रा उम्र हुई तो दिनों-दिन चुपकी मारे आवारा फिरा करता. लंगड़न के दुनिया से उठने के बहुत पहले योसेप एक बीट कवियत्री की मोहब्‍बत में दीवाना उसके पीछे-पीछे पहले रोमानिया, बुल्‍गारिया, फिर वहां से ग्रीस के रास्‍ते काठमांडू, नेपाल चला आया था, फिर लौटकर कभी मॉंट्रियल जाने की जगह मल्लिकापट्टन में एक तेल कंपनी के निगरानी क्‍लर्क की नौकरी थाम ली और वहीं, तिरालीस वर्ष की बेमतलब उम्र में, जीप में बम फटने की एक दुर्घटना की बेमतलब मौत का शिकार हुआ. कहते हैं योसेप सोरोज़ ने तिरालीस वर्षों के इन घनघोर, और बहुत हद तक बेमतलब भी, अपने जीवनानुभवों का निचोड़ तीन काव्‍य-संचयनों में संचित किया था (तीनों की पृष्‍ठ-संख्‍या निन्‍यानबे, और तीनों ही अप्रकाशित; कहते हैं मल्लिकापट्टन की प्रगतिशील प्रकाशन बिरादरी ने योसेपीय साहित्‍य को अपर्याप्‍त प्रगतिकामी मानते हुए उससे जुड़ने की किसी भी संभावना से अपने को मुक्‍त कर लिया था).

बट, व्‍हॉट अबाउट ‘हार्ट इज़ अॅ लोनली हंटर’, ऐं? एंड, इफ़ देयर इज़ हार्ट देन देयर इज़ हर्ट? बीट कवियत्रियों के फेर में आदमी कहां-कहां बीटाता है, दुख में हेंठाता है, हां? बेचैनी में मैंने नाक सुड़कते (रात को तक़लीफ़घुला माथे पर ‘फ्लाइंग टाइगर कब बाम’ की जो बेमुरव्‍वत मरहम की थी, उससे जन्‍य लाल चकत्‍तों की टीस में जलते मुलायम कड़वाहट में) सिर खुजाते कहा, ऐनी आपा ऐसे ही पंक्तियां लिखकर ठेले जाती हैं, “काई लगे घड़े से पानी निकालकर कटोरा धोया”, आं? आगे बूढ़े बुद्ध को क्‍वोट करती हैं, सर्वम दुक्‍खम दुक्‍खम, ऐसे ही करती हैं? आगे मैंने ऐनी स्‍वीटी को क्‍वोट करते दुखों की दुहाई दी, रोना जीवन की मूल सच्‍चाई है. सैराब कुश्‍ता शुद? न कस आबश न दाद? हंसी, खुशी कोई मायने नहीं रखती. चूं शुद? शहीद शुद- बकुजा? दश्‍ते मारिया.. बताओ, बताओ, जुसे, योसेप का जीवन कहां पहुंचा, उसकी कविताएं, कहीं पहुंचीं? पैरागुए का एक गुमनाम लेखक है हुआन मानुएल मारकोस, दूतावासी सांस्‍कृतिक उद्यम में पैरागुए की माली छतरी के नीचे साहित्‍य अकादमी ने लेखक के उपन्‍यास का पांच-छह सौ छापकर निकाल दिया था, वह अब तक मेरे पास नहीं पहुंच सकी, समाज में क्‍या खाकर पहुंचती? समाज में सिर्फ़ दुख पहुंचता है, हवाला का बेनामी पैसा हौलवालों के इंगित तक ही पहुंचता है, और नहीं पहुंचता तो इसलिए नहीं कि पहले वहां पुलिस पहुंच जाती है, बल्कि इसलिए कि पुलिस से भी पहले वहां तमाशबीनों की कंगली भीड़ पहुंच जाती है!

ओह गॉड, व्‍हॉट इज़ द मीनिंग ऑफ़ ऑल दिस? कांट देयर बी एनी मीनिंग टू ऑल द (मर्सीलेस, सब्‍स्टैंशियल) हर्ट वन गोज़ थ्रू? वृद्ध बुद्ध ने इसके बाबत कैसी-कैसी ग़लतफ़हमियां फैला रखीं (कृपया रेफ़र करें शिशुपुरी हाइपर मॉल के समक्ष पगलाई भीड़ के कोलाहल में दिया अनडेसाइफरेबल भासन), क्‍यों फैलाईं? उनकी तर्ज़ पर दुनिया में सब ‘निर्वाणा’ प्राप्ति के लिए तो नहीं न आए, जी? स्‍वयं निर्वाणा बैंड निर्वाण से ज्‍यादा गांजे और गंजीलेस गर्ल्‍स के फेर में रहता था, इज़ंट इट अॅ फैक्‍ट? हार्ट, आफ्टर ऑल, इज़ अॅ लोनली हंटर, और सेंटर होगा नहीं तो घंटा, हंट के लिए जाएगी कौने डैरेक्‍शन में, डज़ इट मेक एनी सेंस? योसेप ग़लत था, जुसे, ऐसे ही न हुआ कि मल्लिकापट्टन के मुर्दों ने उसको छापने में दिलचस्‍पी नहीं ली!

जैसाकि स्‍वाभाविक था मुझे सीधे जवाब देने की जगह जुसेप्‍पे फिर अपना ज्ञान ठेलने लगा, तुमने सादेह हेदायत का ‘अंधा उलूक’, जूनिकिरो तानीज़ाकी की ‘नाओमी’, एहमत हमदी तानपीनार का ‘समय संचालन संस्‍थान’ पढ़ा है?

मेरे गुप्‍पे मुंह दाबे रहने पर मुस्‍कराते फिर सीधे पामुक का अंग्रेजी तर्जुमाओं की क्‍वोट कूटने लगा, “To go beyond the limits of our selves, to perceive everyone and everything as a great whole, to identify with as many people as possible, to see as much as possible: in this way, the novelist comes to resemble those ancient Chinese painters who climbed mountain peaks in order to capture the poetry of vast landscapes.”

It was by taking novels seriously in my youth that I learned to take life seriously, मैं नहीं, पामुक कहता है, जुसेप्‍पे ने कहा, “Literary novels persuade us to take life seriously by showing that we in fact have the power to influence events and that our personal decisions shape our lives. In closed or semi-closed societies, where individual choice is restricted, the art of the novel remains underdeveloped.”

दॉ, द हर्ट ऑफ़ द हार्ट डज़ंट, आई पेंस्‍ड. हार्टलेसली.

(प्रियबर प्रियंकर, और मनीष के लिए)