Wednesday, July 3, 2013

द आर्ट ऑफ़ द नॉवल, एंड हार्ट..

हार्ट हैज़ नो सेंटर, इल कोम्‍पान्‍यो, जुसेप्‍पे ने हंगारी मूल के यहूदी योसेप सोरोज़ को क्‍वोट किया, उसके कोनों से खून रिसता है तो पूरी दुनिया उसकी दुश्‍मन होवे, वह किसी का नहीं होता!

बड़ी लड़ाई के बुरे दिनों में योसेप की जवान, लंगड़ी मां बच्‍चे को गुदड़ी में छुपाकर किसी तरह मॉंट्रियल, कैनेडा पहुंची, मगर आसरा अंतत: अरकान्‍सास के घेनेरों में मिला, एक आर्मेनियन ग्रोसरी स्‍टोर की दुछत्‍ती में पैर और पीठ टिकाने भर को जगह मिली, जहां अपलक बच्‍चे को निहारती जार-जार रोती लंगड़न उम्र से पहले बूढ़ी हुई, जबकि बच्‍चा बिना कुछ समझे बात-बात पर खिल्‍ल हंसता ज़माने को ताज्‍जुब भरे औंजाये रहता, और समझने की जब ज़रा उम्र हुई तो दिनों-दिन चुपकी मारे आवारा फिरा करता. लंगड़न के दुनिया से उठने के बहुत पहले योसेप एक बीट कवियत्री की मोहब्‍बत में दीवाना उसके पीछे-पीछे पहले रोमानिया, बुल्‍गारिया, फिर वहां से ग्रीस के रास्‍ते काठमांडू, नेपाल चला आया था, फिर लौटकर कभी मॉंट्रियल जाने की जगह मल्लिकापट्टन में एक तेल कंपनी के निगरानी क्‍लर्क की नौकरी थाम ली और वहीं, तिरालीस वर्ष की बेमतलब उम्र में, जीप में बम फटने की एक दुर्घटना की बेमतलब मौत का शिकार हुआ. कहते हैं योसेप सोरोज़ ने तिरालीस वर्षों के इन घनघोर, और बहुत हद तक बेमतलब भी, अपने जीवनानुभवों का निचोड़ तीन काव्‍य-संचयनों में संचित किया था (तीनों की पृष्‍ठ-संख्‍या निन्‍यानबे, और तीनों ही अप्रकाशित; कहते हैं मल्लिकापट्टन की प्रगतिशील प्रकाशन बिरादरी ने योसेपीय साहित्‍य को अपर्याप्‍त प्रगतिकामी मानते हुए उससे जुड़ने की किसी भी संभावना से अपने को मुक्‍त कर लिया था).

बट, व्‍हॉट अबाउट ‘हार्ट इज़ अॅ लोनली हंटर’, ऐं? एंड, इफ़ देयर इज़ हार्ट देन देयर इज़ हर्ट? बीट कवियत्रियों के फेर में आदमी कहां-कहां बीटाता है, दुख में हेंठाता है, हां? बेचैनी में मैंने नाक सुड़कते (रात को तक़लीफ़घुला माथे पर ‘फ्लाइंग टाइगर कब बाम’ की जो बेमुरव्‍वत मरहम की थी, उससे जन्‍य लाल चकत्‍तों की टीस में जलते मुलायम कड़वाहट में) सिर खुजाते कहा, ऐनी आपा ऐसे ही पंक्तियां लिखकर ठेले जाती हैं, “काई लगे घड़े से पानी निकालकर कटोरा धोया”, आं? आगे बूढ़े बुद्ध को क्‍वोट करती हैं, सर्वम दुक्‍खम दुक्‍खम, ऐसे ही करती हैं? आगे मैंने ऐनी स्‍वीटी को क्‍वोट करते दुखों की दुहाई दी, रोना जीवन की मूल सच्‍चाई है. सैराब कुश्‍ता शुद? न कस आबश न दाद? हंसी, खुशी कोई मायने नहीं रखती. चूं शुद? शहीद शुद- बकुजा? दश्‍ते मारिया.. बताओ, बताओ, जुसे, योसेप का जीवन कहां पहुंचा, उसकी कविताएं, कहीं पहुंचीं? पैरागुए का एक गुमनाम लेखक है हुआन मानुएल मारकोस, दूतावासी सांस्‍कृतिक उद्यम में पैरागुए की माली छतरी के नीचे साहित्‍य अकादमी ने लेखक के उपन्‍यास का पांच-छह सौ छापकर निकाल दिया था, वह अब तक मेरे पास नहीं पहुंच सकी, समाज में क्‍या खाकर पहुंचती? समाज में सिर्फ़ दुख पहुंचता है, हवाला का बेनामी पैसा हौलवालों के इंगित तक ही पहुंचता है, और नहीं पहुंचता तो इसलिए नहीं कि पहले वहां पुलिस पहुंच जाती है, बल्कि इसलिए कि पुलिस से भी पहले वहां तमाशबीनों की कंगली भीड़ पहुंच जाती है!

ओह गॉड, व्‍हॉट इज़ द मीनिंग ऑफ़ ऑल दिस? कांट देयर बी एनी मीनिंग टू ऑल द (मर्सीलेस, सब्‍स्टैंशियल) हर्ट वन गोज़ थ्रू? वृद्ध बुद्ध ने इसके बाबत कैसी-कैसी ग़लतफ़हमियां फैला रखीं (कृपया रेफ़र करें शिशुपुरी हाइपर मॉल के समक्ष पगलाई भीड़ के कोलाहल में दिया अनडेसाइफरेबल भासन), क्‍यों फैलाईं? उनकी तर्ज़ पर दुनिया में सब ‘निर्वाणा’ प्राप्ति के लिए तो नहीं न आए, जी? स्‍वयं निर्वाणा बैंड निर्वाण से ज्‍यादा गांजे और गंजीलेस गर्ल्‍स के फेर में रहता था, इज़ंट इट अॅ फैक्‍ट? हार्ट, आफ्टर ऑल, इज़ अॅ लोनली हंटर, और सेंटर होगा नहीं तो घंटा, हंट के लिए जाएगी कौने डैरेक्‍शन में, डज़ इट मेक एनी सेंस? योसेप ग़लत था, जुसे, ऐसे ही न हुआ कि मल्लिकापट्टन के मुर्दों ने उसको छापने में दिलचस्‍पी नहीं ली!

जैसाकि स्‍वाभाविक था मुझे सीधे जवाब देने की जगह जुसेप्‍पे फिर अपना ज्ञान ठेलने लगा, तुमने सादेह हेदायत का ‘अंधा उलूक’, जूनिकिरो तानीज़ाकी की ‘नाओमी’, एहमत हमदी तानपीनार का ‘समय संचालन संस्‍थान’ पढ़ा है?

मेरे गुप्‍पे मुंह दाबे रहने पर मुस्‍कराते फिर सीधे पामुक का अंग्रेजी तर्जुमाओं की क्‍वोट कूटने लगा, “To go beyond the limits of our selves, to perceive everyone and everything as a great whole, to identify with as many people as possible, to see as much as possible: in this way, the novelist comes to resemble those ancient Chinese painters who climbed mountain peaks in order to capture the poetry of vast landscapes.”

It was by taking novels seriously in my youth that I learned to take life seriously, मैं नहीं, पामुक कहता है, जुसेप्‍पे ने कहा, “Literary novels persuade us to take life seriously by showing that we in fact have the power to influence events and that our personal decisions shape our lives. In closed or semi-closed societies, where individual choice is restricted, the art of the novel remains underdeveloped.”

दॉ, द हर्ट ऑफ़ द हार्ट डज़ंट, आई पेंस्‍ड. हार्टलेसली.

(प्रियबर प्रियंकर, और मनीष के लिए)

4 comments:

  1. आई पेंस्‍ड. गॉट टेंस्‍ड की तर्ज़ पर. 'पेंसारे' (विचारना) क्रिया से. 'टेंशनियाये हुए' क्रियारूप से बहुत दूर नहीं.

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  2. दुबारा बांच लिये। :)

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  3. @अनूप, अरे,
    दुबारा टमाटर की खोज में नहीं निकल सकते थे? ब्‍लाग लिखाई की वैसे भी अब कहीं पहुंचाई है?

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  4. आपकी सूचना के लिये बताया जा रहा है कि प्रियंकर जी को इस पोस्ट की सूचना उसई दिन दे दी गयी थी। यह भी उनकी कौन सी कविता लिंकित है। अभी तक उन्होंने पोस्ट बांची नहीं है। :)

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