Saturday, July 6, 2013

बीतना

इकहरे दिनों की इकहरी बातों के बाहर भेदों का जो कोई भरपूर संसार होगा, भहरती बरसातों-सा वह अपना भी कभी यार होगा, कि हम बुद्धू के बुद्धू के बुद्धू न रहेंगे, कि एक दिन होगा ऐसा, कि ऐसा ही होगा, हेड टू टो का एक समूचा पूरा दिन, बुद्धि बुलबुल की गलबंहिया अझुराये, कुछ लजाए और कितनी सारी तो ऐंठ में पिघले-पिघलाये, एक छोर से, अन्‍हरियाये पोरों से छूटे, फिसल-सिल फिसले, हम किन मुंहअंजोरों में खुलें, आह, कैसे तो खिलेंगे, एक पूरा समूचा!

कैसे तो बीतता यह जाता है जीवन, साथी, कैसी मुर्दा उदासियों और बेमुरव्‍वत लाचारियों में, कैसे तो सांस अकड़ी रहती है, दिल की गांठ, अखबारों व जीवन के जाने किन निर्दयी कारोबारों के गिरह बंधे रहते हैं, आकर कोई समझाता नहीं, देखें कहां से समझें किस क्षण शुरु कर दें कहां से करें की डगर अंधेरों में घिरी सोती है, शाम का सूनसान चीखता, कोई लालटेन की आग ज़रा-सा गिराता नहीं, कैसे तो बीतता जाता है यह जीवन, साथी!

कितने तो वृक्ष हैं सुदूर प्रातंरों तक फैला वन, जीवनियां कितनी सारी, मार्मिक सघन, कांपती रातों में भय का भीषण प्रचंड देश जितना जो दीखता है उतना ही तीक्ष्‍ण व विलक्षण यह संभव कि नीति की एक नाव इस नदी में उतर सकती, सब बाढ़ों अकालों भौकालों पर भारी, लेकिन उतरती नहीं, अगवायी नाव, राज़ वह छिपा रहता है, सब कहीं राजनीति ज़मीन नापती है उसे घर के बच्‍चे का दुलार नहीं देती, रोज़ सारी दुनिया की संगत में बड़ा होता रह सके मनुष्‍यता का वह प्‍यार.

हम देखते रहते हैं देखते देखते, जैसे जीवन कोई हिन्‍दी सिनेमा हो बेशऊर उछलने फुदकने के बीत जाने रीत जाने की कहानी, इकहरे दिनों की इकहरी बातों के बाहर भेदों का भरपूर संसार रहता छिपा. 

4 comments:

  1. कैसे तो खिलेंगे पूरा- :)

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  2. कोई लालटेन की आग ज़रा-सा गिराता नहीं, कैसे तो बीतता जाता है यह जीवन, साथी!
    ***
    बीत रहे हैं, हर पल हम रीत रहे हैं, और सजा संवेदना को शब्दों में वे स्वयं कविता के मीत रहे हैं!
    ***
    आपकी कविता को आपने बँटवार में तुकबंदी लेबल किया है... हमने भी ऊपर एक तुकबंदी कर दी बस!

    चरणस्पर्श प्रणाम!

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    1. तुकमंदी को तुकबंदी पढ़ रही हो, आंखी पर काला चस्‍मा लगाके पढ़ रही हो?

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  3. Rectified!!!

    आपकी कविता को आपने बँटवार में तुकमंदी लेबल किया है... हमने भी ऊपर एक तुकमंदी कर दी बस!

    and whatever it is mandi or bandi, the fact remains::
    ...सजा संवेदना को शब्दों में वे स्वयं कविता के मीत रहे हैं!

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