Monday, July 29, 2013

बात कहीं नहीं पहुंचती..

थोड़ी देर तक हाथ पर हाथ धरे, कैसे-कैसे तो अरमानों का संसार (ज्‍यादा, बुखार) खोलकर, फिर बातें जाने कहां चली जाती हैं. खामख्‍वाह लड़की पीछे ‘तुम न जाने किस जहां में खो गए,’ गुनगुनाते रहने के लिए छूटी रह जाती है. या फिर हारकर ‘चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया,’ के सुर में रोने लगती है. या मदन मोहन ही, बहानों की आड़ में, खुद को भुलाने लगते हैं. क्‍या मतलब होता है आखिर, ‘पी की डगर में बैठे मैला हुआ री मेरा आंचरा, मुखड़ा है फीका-फीका, नैनों में सोहे नहीं काजरा, कोई जो देखे मइय्या, प्रीत का वासे कहूं माजरा, लट में पड़ी कैसी बिरहा की माटी, माई रे, मैं कासे कहूं पी अपने जिया की,’..

सिर्फ़ रोना रह जाता है, बातें साथ नहीं रहती, (बकौल फिर, मदन मोहन, पाकर भी नहीं उनको मैं पाती), इसके बाद फिर जानने को बचता क्‍या है? टूटे खपड़ों से बरसात के आंसू टपक-टपककर चूते हैं, ‘तुमसे कहूं एक बात’ की फ़रेबी नक़ाबों में खुद को छुपाकर, उम्‍मीदों के अंधेरों को कैमरा अपने अंधेरे में बांधकर पेश करता है, कितनी भी कही जाय बात कही जा पाती नहीं, ‘हल्‍की-हल्‍की’ ही नहीं, हलक में ही रहती है..

छोटे शहरों की यादों की पीली बत्तियां टिमटिमाती, कौंध में कुछ पल कांपती जलती, फिर बुझी जाती हैं. एक आवारा लड़का दोपहर के बरसाती अंधेरों में साइकिल से पानी और हवा को चीरता कहीं के लिए निकलता, रास्‍ते में घरछूटी किसी लड़की की मदद की उम्‍मीद में, कहीं और पहुंच जाता है, बांस वाले पुराने छाते के बावजूद मधुकर बाबू डेरा पहुंच नहीं पाते, स्‍कूल के कमरों में पानी घुसा आता है, बच्‍चे बेंच पर उछलकर चढ़ जाते हल्‍ला मचाने लगते हैं, परिड़ा सर गीली धोती से अपना गीला चश्‍मा पोंछते मिमियाने लगते हैं कि अपने जीजा सत्‍तब्रतो के कहे उन्‍होंने जीवन कहां उलझा लिया, बात इस समूचे के दरमियान, कहीं नहीं पहुंचती.

‘तुमसे एक बात कहूं, काका?’

लीला मुझसे दो हाथ की दूरी पर खड़ी है, और उसके दोनों हाथों में कुल्‍फी का तिकोना फंसा है.

कहो, मैं कहता हूं.

लड़की दो कदम आगे आती है, मगर उससे पहले, उसके हाथों की कुल्‍फी मेरे मुंह में गायब होता है. चीखती लड़की को जवाब में मैं कुछ कहता नहीं, कुल्‍फी के बर्फ से रंगे दांत दिखलाकर इशारों में समझाता हूं कि बात कहीं पहुंचती नहीं.

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