Thursday, July 18, 2013

ज़िंदगी पूरी नहीं होती, जैसे गांव नहीं होते.. उर्फ़ प्‍यास और पानी..

जीवन कैसी-कैसी पटखनी खिलाता है, मगर लोग हैं कि उम्‍मीद फांकने से बाज नहीं आते! मूर्खता है गंवरपना है, क्‍या है जो लोगों को इस कदर, बेहयायी की हद तक, उम्‍मीदों के पालने हिलवाता रहता है? मातमी अंधे कुओं में घूमते लोग सपनों की आवारा पतंगें काटते रहते हैं, कैसे कितने कटे लोग हैं? जैसे, हकीम सय्यद अली कबीर ज़ैदी कटे हुए थे, कि पहली मर्तबा रेल का सफर क्‍या किया बरसों तक “रेल और उसके डिब्‍बों और इंजन की सीटी और गाड़ी की धड़धड़ाहट की बात करते रहे- और गांव के लोग मुंह खोले उनकी बातें सुना किये. बस, रक़ि‍याने के लोगों को कोई अचंभा नहीं हुआ, क्‍योंकि वे लोग व्‍यापारी थे और बहुत पहले से रेल में सफ़र कर रहे थे.” मगर रक़ि‍याने से बाहर के बकिया सब? सारा समाज तो व्‍यापारी नहीं हो जाता न! बड़े फाटक वाले बड़के सय्यद जंमीदार हों कि फुन्‍नन मियां माफिक छोटके, ऐसे मामूली जंमीदार कि पाजामा नहीं, लुंगी बांधते हों, वह भी सिली हुई नहीं, कसाइयों की तरह फेंटेदार लुंगी, कि अहीरों और भर टोले के हदबदाये लइकन हों जो स्‍कूल में दुपहरिया का खाना खाकर हलकान होने पहुंच जावें, सच्‍चाई थी “गंगौली के बहुत-से लोगों ने रेल नहीं देखी थी, क्‍योंकि स्‍टेशन गंगौली से कोई दस मील पर है और गाज़ीपुर बारह मील पर. इसलिए लोग ज्‍यादातर इक़्कों से सफ़र किया करते थे. और चूंकि मियां लोगों के ख़याल में दुनिया गाज़ीपुर की कचहरी के बाद ख़त्‍म हो जाती थी, इसलिए भी उन्‍हें नहीं मालूम था कि दुनिया में क्‍या हो रहा है और क्‍या नहीं हो रहा है.”

गंगौली की ही बात नहीं है, बड़का सिंघनपुरा के पड़ोस महरौली का होकर, गुड़गांवा के पड़ोस मेहरौली में रहते आदमी (या औरत) को कहां ख़बर हो पाती है कि दुनिया में क्‍या हो रहा है और क्‍या नहीं. या यही कि उसके जीवन का- बच्‍चों के लिए टिफिन बनाने और माहवारी बिलों की भुगतान करने और फेसबुक पर तीन तस्‍वीरें टांक देने से अलग- ठीक-ठीक मतलब क्‍या है? आता है समझ? एक अकेली झंगटिया-बो ही अपने अकेले में सोचती तने तार की तरह तनी नहीं जाती कि ‘जिस दुनिया में वह रह रही है वह उसकी अपनी दुनिया नहीं है.’ नज्‍जन और गफ़ूरन और सितारा किसी की वह दुनिया कहां होती है जिसमें वह रह रहे होते हैं!

“नज्‍जन की आवाज़ झंगटिया-बो की आवाज़ से भी अच्‍छी थी. वह अकसर रात-गये अपनी दोनों लड़कियों- दिलआरा और सितारा के साथ अपने लिए, और आसमान पर टपके हुए महुओं की तरह बिखरे हुए सितारों के लिए, और ज़मीन पर लड़खड़ाती हुई हवाओं और दीवारों से चिपकी हुई परछाइयों के लिए सोजख़्वानी किया करते थे.. और उनकी आवाज़ सुनकर झंगटिया-बो जाग उठा करती थी.”

चार बीघे खुदकाश्‍त के वायदे के लालच में जौनपुर छोड़कर गाज़ीपुर, और उसके पीछे गंगौली चले आये नज्‍जन की क़ि‍स्‍मत में कोई दुनिया थी, हो सकती थी? जवान हो रही उसकी बेटी सितारा, तीखे नाक-नक़्श, नमकीन सांवले रंग और गहरी भूरी आंखें और बड़े-बड़े गहरे सियाह बालों वाली, कि ‘उसके बाल इतने बड़े थे कि अगर वह चाहती जो जाड़े में उन्‍हें ओढ़ सकती थी’ की मलिका सितारा की, दुनिया हो सकती थी?

“सितारा जानती थी कि अब्‍बास उसी से मिलने आता है. हालांकि यह बात अब्‍बास ने कभी उससे कही नहीं थी. बस, होता यह कि अब्‍बास आता और वह न होती तो वह उदास हो जाता. और जब वह आ जाता तो बज़ाहिर तो उससे बेख़बर ही रहता, लेकिन उसकी आवाज़ में एक खनक आ जाती, और सितारा की नस-नस में कलियां चिटकने लगतीं.”

कितनी तो ज़ाहिल कैसी ऊटपटांग दुनिया थी और वैसे ही बेसिरों के अरमान, कि “..वह कुछ कहना ही चाहती थी कि आसमान भनभनाने लगा. सबकी आंखें आसमान की तरफ़ उठ गयीं. लोहे की एक चील-सी दिखाई दी, जो पंख हिलाये बिना उड़ी चली जा रही थी. तमाम औरतें एक-दूसरे को हवाई जहाज दिखलाने लगीं. बच्‍चों ने आंगन में उछलना-कूदना शुरू कर दिया. कैसर तो उसको दिखा-दिखाकर पेशाब करने लगा. सितारा और दिलआरा, जो उस वक़्त कैसर ही की तरफ़ देख रही थीं, घबराकर शरमा गयीं. फिर हवाई जहाज़ एकदम से आंगन पर आ गया तो कुछ परदेवाली बीवियों ने आंचल की ओट कर ली और कुछ ‘उई’ और ‘माटी-मिली’ कहती हुई गिरती-पड़ती दालान में भाग गयीं.”

ऐसी ही आपाधापी, कन्‍फ़्यूज़न के घटाटोप में अब्‍बास ने सितारा को अकेली पाकर, ज़रा-सा इतनी तो बात कही थी कि “तुम इतनी खूबसूरत क्‍यों हो जी?” और इस, इतनी ज़रा-सी पूछ में नज्‍जन और गफ़ूरन मीरासन की बेटी सितारा, जवाब तो खाक़ क्‍या देती, जो ‘अपनी सांसों की झाड़ि‍यों में उलझ-उलझकर गिरी-गिरी पड़ रही थी’, अलग से अपना कोख रंग लिया. और वैसे नहीं रंगा जैसे झंगटिया-बो की बिटिया बछनिया ‘कभी-कभार वज़ीर मियां के लड़के बिक्‍कन के साथ दोपहर के वीरान किये हुए किसी गलियारे में या कोठे पर व्‍याह के खेल खेला करती थी. बिक्‍कन मियां बनता और वह बीवी. और जब एक दिन उसके पेट से एक केंचुआ गिरा तो उसने चुपके से बिक्‍कन के कान में यह कहा कि उसका पेट गिर गया है.’

गोकि ‘नौहों की धुनें इस एहतियात से बनायी जाती थीं कि ईद की सिवैयां शरमा जायं’, और टामी बाई की लज़ीज़ बातें सुनकर लिखनेवाले ने जान लिया था कि ‘शब्‍द की कोई हैसियत नहीं होती.. शब्‍दों से परिचित हुए बिना भी बातें सुनी और समझी जा सकती हैं.’ मगर नज्‍जन की बेटी सितारा अब न बछनिया की तरह बच्‍ची थी न लेखक की तरह समझदार, किसी काल्‍पनिक केंचुए को हटाकर वह अपना पेट बचा नहीं सकी, बेटी की तक़दीर बचाने की उसकी मां गफ़ूरन को यही गरज सूझी कि गंगौली से उस परिवार का घर उठ गया!

“इस हंगामे में भला यह कौन सोचता कि कल्‍लू की ख़लवत में बसाया जानेवाला परिवार कहां गया और क्‍यों गया. अब्‍बास ने उन्‍हें दो-चार दिन याद ज़रूर किया, मगर फिर उन्‍हें वह भी भूल गया. उसे एक जुलाई अच्‍छी लगने लगी. मगर गफ़ूरन गंगौली को न भूल सकी. बात यह है कि वह सितारा की मां थी. उसने झट से सितारा को व्‍याह दिया कि इसके सिवाय कोई चारा न था. उसके यहां सतमासा बच्‍चा हुआ. एक बड़ा तंदरुस्‍त बच्‍चा. इस बच्‍चे को सितारा के ससुरालवालों ने शक से देखा. सितारा के मियां ने उसे तलाक़ दे दी. वह गाज़ीपुर वापस आ गयी.
और उसने अपने बेटे का नाम अब्‍बास रखा.”

कहां से आता है इतना कलेजा कि ऐसी हाराई में भी मन उड़ाता है अरमानों के पतंग, गाता है ‘दिल मेरा एक आस का पंछी..’, लिखनेवाला लिखता है दिल को मरोड़ने, भिंजोनेवाली, ऐसी बेशऊर बेमक़सद कहानियां?

2 comments:

  1. मैं देख रहा हूं कि आप देख नहीं रहे, 'देख नहीं रहीं' का हिसाब अलग से लगाया, लगवाया जाएगा? (पता नहीं यह कौन है जो पीठ और गरदन से मुंह सटाये फुसफुसाये गया है..)

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  2. राही मासूम रज़ा साहब के इस शानदार उपन्यास की कथा सचमुच बार-बार मन में कौंधती है. कितनी ही उपकथाएं हैं जो झिंझोड़ती रहती है . प्रेम की,रूमान की,त्याग की,पूर्वग्रहों की,घृणा की,विद्वेष की,मारने की और मर मिटने की . और सब कुछ एक गांव की हथेली पर. याद दिलाने के लिए आभार !

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