Thursday, July 25, 2013

दो पुरानी चीज़ों की फिर चिपकाई..

अचक्‍के
रोज़-रोज़ हंसता, बेमतलब
जाया होता दीखूंगा, अपने
शरम में मुंह चुराता, इस गली
उस सड़क यूं ही आता-जाता
फिर देखोगे एक दिन अचक्‍के
में ही मिलूंगा कभी

जैसे खुद को भी तुम पाओगे
ऐसे ही कभी गोपन क्षणों
अप्रत्‍याशित, अचकचाये हुए
धीमे स्‍वयं के करीब आते, दुलराते
भूले थे ज़माने से कुछ इस तरह
खुद को याद आते, उनींदे की उम्‍मीद
में मेरा नाम बुदबुदाते


रेशमी हवाओं के बीच सुरीली थपकियों
के गीत रचता, बहुत बार होगा
खुद तक को नहीं दीखूंगा मगर
तुम देखना तुमसे मिलूंगा.


आता है प्‍यार
दौड़ते हाथी की पीठ पर तुम्‍हें हंसता देखा था
स्‍टेडियम के गोल मैदान पर खिंचे चॉक की
फांक पर दौड़ता, बीच दौड़ गिरता देखा था
सपने में दीखी हों नीली पहाड़ि‍यां, उसकी
घुमराह रपटीली लाल पगडंडियों पर
अबूझ खुशियों में नहाया, भागते देखा था.


सपनों के ज़रा, एकदम ज़रा बाहर
रात-रात भर धारदार बरखते हैं
दु:ख के कंटीले तार, फिर जाने ऐसा क्‍या
कहां छुपा है, कि सब अंधेरों के बीच
जीवन आता है तुम पर इतना प्‍यार.


मई, 2010

1 comment:

  1. कि सब अंधेरों के बीच
    जीवन आता है तुम पर इतना प्‍यार.
    ***
    मन में पैठ गयीं ये पंक्तिया...

    सादर चरणस्पर्श प्रणाम!

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