Friday, July 26, 2013

दिन-चिरैया..

चलना मुहाल है. चलने में बहुत शोर है. पैर उठता नहीं कि हल्‍ले जाग जाते हैं. मानो ठीक पीठ पीछे किसी प्रचंड ऑर्केस्‍ट्रा का प्रचंड रिहर्सल चल रहा हो. पैर इस ऑर्केस्‍ट्रल अनुगूंज में गुम जायेंगे. बड़ी गड़बड़ हो जायेगी. पैरों की संभाल जरूरी है. हाथ पैरों को बचा लें. मगर हाथ ही कहां हिल रहे.

हाथों को पाला मार गया है. बरसात की सीलन है या ठहरी हवा, कि खिड़की की फांक से दिखते ऊपर आसमान में स्थिर डैनों के साथ उड़ते पंछी, क्‍या जाने किसका असर है कि हाथ स्थिर हो गए हैं. उधारी के हाथ हो गए हैं. दो हाथ की दूरी से मैं उधारी के हाथ को सिगरेट की राख झाड़ता देखता हूं. चिल्‍लर उठाकर मेज़ पर रखता और फिर गत्‍ते की कटी तलवार की तरह झूल जाता देखता हूं.

देखना मुहाल है. जैसे इतनी चीज़ें हो देखने को और आंखें लहक जाती हों कि कहां जायें, कितना-क्‍या देखें. देखने के कितने सिलसिले हैं, मुंदी आंखों को इतना दीखता है जगी आंखें कितना देखना प्रोसेस करती रहें. आंखों को चश्‍मे में लपेटकर देखने की कोशिश मत करना क्‍योंकि अनुभव से जानते हो तब चश्‍मा मुहाल होगा.

हवा का एक आवारा तिनका कांपता आकर उंगलियों पर बैठता है, उंगलियां आजिज़ आकर कहती हैं, हटो, देखते नहीं, खुद हम अपनी खातिर मुहाल हुई जाती हैं? पूरी अपनी कहती भी नहीं और उंगलियां निढाल हुई जाती हैं.

बस एक पंखा है जो घूमे जाता है. की-बोर्ड अधलेटा कुनमुनाता कि अभी रहूं जागा, कि मैं भी मुहाल हुआ जाऊं?

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