Monday, July 29, 2013

बरखा रानी ज़रा ठहिर के बरसो!














मैं जो बरखा होता
बरसने से आजिज आता
जरा बरसकर बहुत लजाता
पूछकर बरखता कि कौन घर’
कौन गांव, भाई, बहुतै आपद आई?
कोठारे ओसारे अंगना
सब ई हम्‍मर चुवाई?
मुआफ़ी करो मामी
मौसी, जीयन, काकी, ताई
गलती भई, हम त रहे
पड़ोसी के दुआरे आई
इतने महीने की भूख रही
तनी ज़ादा डकार लिए
होश रहा नहीं बइठहीं
इत्‍ता जल निकाल दिये
जा रहे हैं दुबारा संभलके आवेंगे
मुंह पे रुमाल अउर आंख पे
कजरा मां कसम जे सजायेंगे
मुकेस जी का गाना त अल्‍ला किरिया
सगरे गांवो हल्‍ला करे
तब्‍बो न बजवायेंगे!

1 comment:

  1. जरा बरसकर बहुत लजाता
    पूछकर बरखता कि कौन घर’
    कौन गांव, भाई, बहुतै आपद आई?
    कोठारे ओसारे अंगना
    सब ई हम्‍मर चुवाई?
    मुआफ़ी करो मामी
    मौसी, जीयन, काकी, ताई
    गलती भई, हम त रहे
    पड़ोसी के दुआरे आई
    ***
    बरखा रानी को बरसने का तरीका बताती कविता... सच! ऐसा होता तो कितनी आदर्श स्थिति होती न!

    ReplyDelete