Wednesday, July 3, 2013

मंत्र

मालूम नहीं यह जीवन क्‍या करता है
खड़खड़ि‍याते डेढ़ कदम आगे कहां पड़ें
तब तलक खींचकर पीछे तीन करता है
गीली धुंधलायी आंखों के पेर, मन के अंधेर में
बेतुकी पगलायी हंसियों की ज़ि‍द करता है

कहता है वो कौन सी तो ज़हरघुली रात
झमझम की बरसात जंगली हाथियों की बारात थी
क़ि‍स्‍मत के फेर की ऐसी सब सारी कमीनी सभाओं
में लिये चलो टहलाओ मुझे, पूछना हिलाना बजाना, देखना
जानता हूं अपना नाम, दुनिया में अपने होने का सबब
अपने काम, देखना, तब भी हंसता हूं या चेहरे का रंग
पड़ जाता है जर्द, घर-गांव की बेतरतीबी भुनभुनाने लगता हूं
या छाती पर खुदी दुश्‍वारियां लंबी सांस खींचे थाम लेती हैं
चुप्‍प चुप्‍प चुप्‍प.. 

अंधेरा बढ़कर, अपने ही दुश्‍चक्र में उलझ टूट जाता है
या जागी आंखों के सपने में बहली आयी किसी तस्‍वीर के फ़रेब में
कोई बच्‍ची चिड़ि‍या पंख फड़फड़ाने, अपने को उड़ाने लगती है
दबी आवाज़ गुनगुनाने, कि यह जीवन क्‍या करता है

सिर झुकाये, नम आंखें गिराये, कोई मुझ-सा ही

दूर खड़ा, खड़खड़ाता, अपने से लजाने लगता है. 

3 comments:

  1. उमड़ता है, घुमड़ता है, अवसर पाकर रगड़ता है।

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  2. गीली धुंधलायी आंखों के पेर, मन के अंधेर में
    बेतुकी पगलायी हंसियों की ज़ि‍द करता है
    ***
    आज जो लेकर आया जीवन आपकी नोटबुक तक... उस क्षण का शुक्रिया...!

    पुनः प्रणाम निवेदित करते है आपके श्रीचरणों में!

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    1. ऐसी, इतनी भावुकता से मधुमेह जोर मारने लगता है. निरुपमता आंखों के कोर से बहने लगता है, संभलकर शब्‍द चलना चाहिए, नहीं?

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