Tuesday, July 30, 2013

पापा की छूटी नौकरी के बाद के सुहाने दिन..

पापा की जबसे कालेज वाली मास्‍टरी छूटी थी, घर का बुरा हाल था. पापा स्‍टूल के पीछे पैर फंसाये, जाने बाबा आदम के कि किस ज़माने के, अपने चिमरख सोफे पर अपनी किताब लिए उसे पढ़ने का अभिनय करते पड़े होते, और स्‍कूल से लौटकर घरवाली साड़ी लपेटती मां रसोई में कुनमुनाने पहुंच जाती कि अंडा खत्‍म हो रहा है, दाल के दाम कैसे आसमान छू रहे हैं, और तुमको मालूम है मुन्‍नी के लिए स्‍पोर्ट्स का एक जूता देखी, उसका क्‍या दाम बताया दुकानवाले ने? इन सब ड्रामों का यही नतीजा होता कि पापा अपनी पढ़ाई में और डूब जाते, मैं रसोई के दरवाजे पर जाके एक पैर से दूसरा खुजाती मां से झगड़ा करने पहुंच जाती कि मुझे नहीं चाहिए स्‍पोर्ट्स वाला जूता, फिर? मुझे स्‍कूल का नया बस्‍ता भी नहीं चाहिए और न ही मुझको अंडा खाने का शौक है, तुम पापा को चैन से बेचैन नहीं रहने दे सकती?

मां बड़ी-बड़ी आंखें करती मुझे तरेरती कि इस लडकी के ज़रा ढंग तो देखो, तू चुपचाप जाके अपना होमवर्क करती है कि मैं खिलाऊं तुझको तेरा अंडा!

मेरे ही ‘ढंग’ का मामला नहीं था, ऐसे लोगों की पूरी लिस्‍ट थी जिनके ढंगों से हफ्ते में चार दफे मां का दम फूलता होता. जिस दिन पापा कालेज की नौकरी से हाथ धोकर घर लौटे और अपने चिमरख सोफे पर धम्‍म् से निढाल हुए मुझसे बोले थे मुन्‍नी, तू बाहर जाके खेल, बेटी, मेरा सिर फट रहा है, और आधे घंटे के भीतर मां के लौटते ही एकदम से उठकर अपने साथ हुए हादसे का जो किस्‍सा बयान किया था तब भी मां ने आंखें फैलाकर पापा के कालेज के प्रिंसिपल की बाबत, उसके ‘ढंग’ से ऐसे ही एतराज़ ज़ाहिर किया था!

पापा बुदबुदाकर बोले थे वही तो, छोड़ो, हटाओ, फालतू की नौकरी साली, एक चाय पिलाओ, और मैं भागकर पापा की गोद में चढ़ती बताने पहुंची थी कि चीनी है घर में कि चाय पियोगे?

‘दूध भी नहीं है! जा तो मुन्‍नी, कोने वाली दुकान से दूध और चीनी लेकर आ तो, बेटी?’ मां कहकर सोची कि मैं चली जाऊंगी तो वह तसल्‍ली से पापा के प्रिंसिपल के ‘ढंग’ और आगे क्‍या किया जाये की रणनीति पर विचार करती, मगर ऐसे धमाकेदार घरेलू हादसे के बीचोंबीच पापा और मां को अकेला छोड़कर मैं कहां कहीं जानेवाली थी? मुझे भी पापा से जानकर रहना था कि आखिर कौन-सी दुनिया से खोजकर वे किस ‘ढंग’ की अपने लिए प्रिंसिपल लाये थे जिसने सिर्फ़ इस बात पर जिरह करके उन्‍हें कालेज से बाहर करवा दिया था कि दूसरे मास्‍टरों की तरह वह उस ‘खड़ूस’, ‘सटकेली’ औरत को ‘मैडम’ की जगह ‘माताजी’ बुलाने से मना कर रहे थे!

दुबारा जब मन्‍नु काकी लाला की नई (तीसरी वाली) कार में हमारे यहां आई तो उसने भी पहली बात मां से यही कही कि, 'ये कौन बात हुई, जीजी, कि इत्‍ती-सी बात पर बैठी-बिठाई नौकरी को आदमी लात मार दे, हें, बोलो तुम? अगर प्रिंसिपल चाहती है सब उसे माताजी बुलायें, और सब बुला भी रहे हैं, तो आप क्‍यों नहीं बुलाओगे, भई? चार किताबें पढ़़कर आप सबसे जुदा हो गए, हें? ये तो भाईजी ने अच्‍छा नहीं किया, तुम अकेली की कमाई से अब ये घर चलाओगी, कहां से चलाओगी, समझाओ तो जरा? आपसे दस साल बड़ी है, ऐसा क्‍या बुरा था अगर जो अपने को माताजी बुलवाना चाहती थी? मैं तो कहती हूं श्रीदेवी जी और माधुरी जी तो नहीं बुलाने को बोल रही थी, और अगर वही बोलती तो भी आपको बुलाने में हर्ज क्‍या था, भाई? आखिर को तो आप उसीकी रहम पर अपनी तनख्‍वाह काट रहे थे, मुन्‍नी के स्‍कूल का खर्चा उठा रहे थे?'

बाद के दिनों में, अखबार के पीछे सिर लटकाये पता नहीं क्‍या पढ़ने की हमेशा एक्टिंग करते पापा को देखकर कोई भी कह सकता था कि वे भी जानते हैं कि उनसे गलती हो गई थी. ईश्‍वर उन्‍हें अगर दुबारा मौका दे तो वह अपने प्रिंसिपल को सहर्ष जाकर माताजी पुकारने को तैयार हो जाते. माताजी, श्रीदेवीजी, माधुरीजी, व्‍हॉटेवर.

मगर यह मौका फिर आया ही नहीं. वक्‍त-बेवक्‍त मन्‍नु काकी ही आती रही. कभी मुझे काका की नई कार (दूसरी वाली) में बाहर ले जाकर आइसक्रीम खिला लाती, या अपने हेयर-ड्रेसर के यहां बालों की बनावट की अनोखी दुनिया की टहल करवाने लिए जाती, और फुरसत में लंबी सांस लेकर कार की पिछली सीट पर मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर मुझे दुनियादारी समझाती, ‘जानती है, मुन्‍नी, हमारे यहां का सारा हिसाब-किताब जो है, गांड़-चाटने का हिसाब-किताब है. घुसखोरी इस देश का सबसे बड़ा प्राबलम नहीं है, प्राबलम है तुम्‍हारे पापा की तरह बहुत सारे समझदार लोग अपनी वाजिब जगह पर नहीं हैं क्‍योंकि वो गांड़ चाटना नहीं जानते. या उनको मालूम नहीं कि किसकी चाटें, किस जरुरत में कितनी-कहां चाटें. अब तुम यही मेरे लाला को देख लो, कैसे तो तानपूरे जैसी नाक है, एक मर्तबा कुर्सी पर बैठ जाये तो दो लोग जब तक हाथ लगाने न आयें, अपनी मर्जी से उस कुर्सी से दुबारा खुद उठ नहीं सकते, ऐसे भैंसे को मैं नौ साल से अपनी गोद में बिठाये हूं, उसके कान और गर्दन के बाल सूंघती तारीफ़ करती रहती हूं, कोई शौक है मुझे? न करूं तो तेरे पापा की तरह पेपर लेकर सारा का सारा दिन खराब करती बैठूं? पेपर की पढ़ाई मेरे चार कमरों के मकान का किराया चुकायेगी? कम से कम मुझे मालूम तो है कि मुझे किसकी गांड़ चाटनी है, यहां तो लोगों की उम्र निकल जाती है और उनको इतना तक पता नहीं चलता कि भई, आपके चाटने के लिए किसकी गांड़ है!‘

मन्‍नु काकी और मेरे बीच जितनी बातें होतीं वो अगर मां के कान में पड़ जाये, या पापा के ही, तो मेरे लिए अपना कान बचाना मुश्किल हो जाये. मन्‍नु काकी और मेरे बीच बहुत सारे ‘सीक्रेट्स’ हैं. मन्‍नु काकी जिस तरह मेरी नाक पर अपनी तर्जनी टिकाकर मेरा माथा चूमती उस तरह मां को भी कभी मैंने खुश होते नहीं देखा. कभी-कभी लाला की कार (चौथी वाली) में अकेली बैठे सोचते हुए मुझे लगता मैं मां से कहीं ज्‍यादा मन्‍नु काकी को प्‍यार करती हूं. लंबी सांस लेकर जब मन्‍नु काकी मुझसे अपना दुखड़ा शेयर करती कि, ‘जानती है, मुन्‍नी, ऐसा नहीं कि मुझे नहीं मालूम कि भाईजी इन दिनों मकान-मालिक के तकाजों को लेकर कितना परेशान हैं, एक-एक बात की खबर है मुझे! मगर मेरे हाथ बंधे हुए हैं, बच्‍ची, लाला ऐसे ही लाला थोड़ी हुआ है, बड़े पैसों की तो रहने दे, मेरे हाथ कभी फालतू का एक घेला नहीं धरता, हरामी! महीने के जितने बिल हैं उनकी भरपाई करता है, मगर उसके बाद हर खरचे के लिए चाहता है मैं उसके आगे हाथ पसारती बैठी रहूं. कहती हूं तो गिनकर उतने पैसे मेरे हाथ में रखता है. मरद सारे हरामी ऐसे ही होते हैं. मगर तू मुंह मत लटका, किराये वाले इन पैसों का मैं कुछ करती हूं!‘

लिक्विड कैश के अकाल का काकी का ये सारा किस्‍सा मेरे लिए, सच्‍ची, आउट आफ द वर्ल्‍ड, और आउट आफ माइंड है. सोच-सोचकर मेरा माथा गरम होने लगता कि काकी के हवाले इतने सारे ताम-झाम, हेयर-ड्रेसर और मॉल की खरीददारियां, सिनेमा और साटिन के कपड़े और असली जो चीज है, बैंक अकाउंट, वहां एक रुपैय्या नहीं! यह भी कोई मन्‍नु काकी होना हुआ फिर?

और ऐसा भी नहीं कि काकी ने नौ साल से लाला को गोद में बिठा रखा था तो पलटकर लाला ने काकी की खातिर अपना घर, पत्‍नी और बच्‍चे छोड़ दिये हों. काकी तो अपनी खरीददारी करने निकलती और लाला की बीवी की खरीददारी करके लौटती, आंखें पोंछती मां को बताती, अब क्‍या करुं, जीजी, देखा, अच्‍छा लगा तो सोचा एक उसके लिए खरीदती चलूं, आखिर भगवान ने हक तो उसी को दिया है, हें? फिर देर तक नाक सुड़कती रसोई में मां से लगी बिसुरती कि नहीं, तुम बताओ, जीजी, तुम्‍हारी मन्‍नु के पास और चारा क्‍या है. खुदा न खास्‍ता आज को कुछ हो गया, सांस ही उखड़ गई, फिर यहां कौन है जो मेरी काठी को कन्‍धा देने आयेगा? लाला और उसके घर के सिवा यहां मेरा और है कौन, फिर याद आने पर अपने को दुरुस्‍त करती दोहराती, कि ‘ऐसा नहीं कि तुम लोग नहीं हो, मगर आज के इस जमाने में तुमलोगों के होने का मतलब ही क्‍या है, नहीं, बोलो जो गलत कह रही है मन्‍नु, हें?‘

और फिर एक दिन वही हुआ जिसका मन्‍नु काकी को तो नहीं, मुझे बहुत दिनों से डर था, हाथ का आइसक्रीम खत्‍म करके चहकती हुई मैं अभी घर के भीतर घुसी भी नहीं थी पापा का एक झन्‍नाटेदार तमाचा मेरे गाल लाल कर गया, और उसके पीछे फटी आवाज़ में उनका चीखना, ‘स्‍कूल से छूटकर तुमको घर आना नहीं सूझता, आइसक्रीम खाने निकल जाती हो! इसी से तुम्‍हारा शरीर बनेगा? बीमार होगी तो मन्‍नु तुम्‍हें हास्पिटल लेकर जायेगी?’

(बताओ ऐसे बाप को, मन्‍नु काकी नहीं जायेगी तो आप लेकर जाओगे? आप तो घर छै अंडा भी नहीं ला सकते? वैसे अंडा लाकर फिर रखोगे कहां, आजकल तो फ्रिज भी खराब है! फ्रिज बनवाया आपने? एक शर्ट का बटन लगाना तो आपसे होता नहीं, पापा, फिर आप क्‍यों खामख्‍वाह इतना ताव खाते रहते हो?)

पापा की कालेज वाली मास्‍टरी छूटने के बाद से घर का बुरा हाल था. बाद में और बुरा हुआ. मन्‍नु काकी के भी हुआ. हालांकि नहीं भी हो सकता था. ऐसे वाकये फिल्‍मों और किताबों की आखिर में होते हैं, जीवन में बहुत बार किसी बुरे दिन काकियां शर्म की मौत मरती हैं, जीवन में बची रह जाती हैं, लेकिन बुरा संयोग था कि काकी लाला की (चौथी वाली) नई कार में व्‍यूटी-सैलून से लौट रही थीं कि नगरपालिका की बस के एकदम सामने आ गईं. ड्राईवर, कार और उनका ऐसा कचूमर निकला था कि दुर्घटना के बाद किसी की पहचान नहीं हो पा रही थी. जबकि पिछले ही हफ्ते मां को रसोई में खड़ी काकी बता रही थी कि पता नहीं, जीजी, तुम अब भी कैसे बस में यहां-वहां आती जाती रहती हो, मुझे तो अब जोर डालने पर भी याद नहीं आता कि बस में बैठकर लगता कैसा है!

(एक राज़ की बात बताऊं, किस्‍सा मेरा गढ़ा नहीं है, एक अफ्रीकी उपन्‍यास पढ़ रहा हूं, नाम नहीं बताऊंगा, आइडिया वहां से उड़ाया है)

6 comments:

  1. भले पाठक, कृपया भाषा को अन्‍यथा नहीं लेंगे. जीवन के अन्‍यथा लिए जाने पर बहुत मर्तबा आप एक आह तक नहीं भरते, भाषा के लिए 'ओह!' वाला मुंह फुलाने लगिएगा? पिलीज़, मत फुलाइयेगा.

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  2. "जीवन में बहुत बार काकियां शर्म की मौत मरती हैं, जीवन में बची रह जाती हैं." मार्मिक !

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  3. न जाने कितने जमाने बाद आज कुछ लगातार ( वैसे तीन किश्तों में, किन्तु एक ही दिन में)पढ़ा.मुन्नी को जीवन दर्शन कुछ जल्दी ही सीखने को मिल गया.काकी की मौत तो बहुत ही परफेक्ट सी मौत रही.
    घुघूती बासूती

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  4. शुक्रिया, घुघूती जी.. सुकिरिया कसम, पीरहरंकरो जी..

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  5. @तुम पापा को चैन से बेचैन नहीं रहने दे सकती?


    सिरिअसली, बहोत दिन बाद पूरी कहानी पढ़ी, परमोद सिंघ जी, तुसी ग्रेट हो.... बकिया इस देश में गांड चाटने की विधा में निरंतर निखार आ रहा है. पापा जैसे प्राणी अब नहीं हैं और मन्नू काकी जैसे मौज काट रही हैं.

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  6. हम तो समझे कि प्रेमचन्द्र की कहानी है, पर श्रीदेवी आदि का संदर्भ देख मन बदल लिया।

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