Wednesday, July 31, 2013

याद किया दिन ने कहां हो तुम..

रवीश कुमार का कहने का मन करता है, उनके ब्‍लॉग का उपशीर्षक भी यही है, जबकि राजनीति में ढेरों लोग हैं जो कहने की जगह करने में यकीन रखते हैं, लाख चिचियाता ज़माना सींखचों में बांधे रखना चाहता रहा, मधु कोडा आखिर जमानत पर बरी हो ही गए, लोगों की लाख लंगियों के बावजूद ममता दीदी पंचायत के चुनाव निकाल ही लीं, अखिलेश बाबू भी बिल्‍डर लाबी के हितों का रेत करेवाली से हाथ झटका ही लिए; फिर शरदजी पवारजी की तो बात ही क्‍या, कहनेवाला मुंह उनका बहुत वक्‍तों से भले न रहा हो, करनी के उनके बेमिसाल कारनामे महाराष्‍ट्र के नक्‍शे से ज्‍यादा बड़े हैं, या तेलंगाना से बड़े तो हैं ही (दिल्‍ली के किसी स्‍टैंड-अप कॉमिक ने दो दिन पहले अपने फेसबुकिये पेज़ पर अच्‍छा कहा ही था, कि आंध्रप्रदेश गया तेलंगाने! पता नहीं ऐसे कैसे कह लेते हैं लोग, या करनेवालों के वेबसाइट बना लेते हैं, जैसे शरदजी पवारजी की एक बच्‍चे ने बना ही रखी है! जबकि रवीश कुमार को देख रहा हूं अपनी कहनियों से बाज आ रहे हैं, आज प्रेमचंद को दुबारा विदर्भ टहलाने के, खुद को चैनल का मुंह मियां मिट्ठु बना रहे हैं. शायद इसी की तैयारी में कुछ महीनों पहले फेसबुक के पन्‍ने पर रवीश ने स्‍टेटस की शक्‍ल में एक डिसक्‍लेमर चढ़ा रखा था?

“ख़ाली होना चाहता हूं। इसलिए हज़ारों मित्रों में से कुछ से विदा लेने की कवायद चल रही है। उनसे फिर कभी मुलाकात होगी। कुछ नए लोगों से मिला जाए। उम्मीद हैं आप बुरा नहीं मानेंगे। कई बार उलीचना ज़रूरी हो जाता है वर्ना नाव पानी के बोझ से डूब जाएगी। जो मिल रहा है उसे लौटाना भी पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया को इंगलिस में डिलिट करना कहते हैं।”

जबकि मैं सामने सांझ के अंधेरे को देखकर फिर वही पुराना दुहरा रहा हूं:

कितना कुछ पीछे छूटता जाता है, स्‍कूल गुजारे के शहर कलम का सिपाही हिंद पाकेट बुक्‍स की पुरानी जिल्‍दें, पुलिस की लाठियों को धता बताकर भीड़ से भाग आना, अठन्‍नी रिक्‍शा पुलिया, निरंजन सिनेमा अप्‍सरा रज़ाक और बसंत-बिहार की तंग सीढ़ियां प्रोजेक्‍शन की टिमटिमाती बत्तियां, चौक की रात और दारागंज की सुबह, पूजा का पंडाल फ्राक के फूल प्रसाद छूटा जाता है, पुरानी चिट्ठि‍यां सूखे दवात और बलिया बस डिपो पर नोट हेराने बहन की राखी गंवाने की रुलाई, तामचीनी के बरतन एचएमटी की घड़ी और चश्‍मे का पहला फ्रेम टूटता जाता है, यार्ड का रह-रहकर अकेला धुआं छोड़ता करियाया इंजन कालिखधुली सांझ और स्‍टेशन की दीवार पर ‘समाज को बदल डालो’ का मेहराया किरकिराया पोस्‍टर, बाटा के चप्‍पल विको वज्रदंती बाम्‍बे डाइंग के सुपर विज्ञापन, माथे पर लाल रुमाल लिए बेहुदगी की हद तक सुखी मुस्‍काता राजेश खन्‍ना उड़ते जाते हैं, निम्‍मी गाना गाकर सुरैय्या को क्‍यू पास करती, काले-सफ़ेद के धुंधलकों में शेख मुख़्तार के पीछे संजीव कुमार गुनगुनाते, पृथ्‍वीराज को तैयार कराते बारिश के अंधेरों में सारा शहर डूब जाता, समय की आंख पर कोई नन्‍हीं चिरैया अपने पंख तौलती भविष्‍य की कांख में ठोर गड़ाये डोलती न सुना जा सकनेवाला इक मीठा बोलती, याद किया दिल ने कहां हो तुम, मैं अपने ब्रलॉग पर चुपके से लिखे जाता प्‍यार से पुकार लो जहां हो तुम..


वैसे कह चुकने के बाद फिर बात बच ही जाती है कि नयी यादों से कैसे मिला जाये.

(फोटो: अनुनाद ब्‍लॉग के आभारित पोस्‍ट से पुन: आभारित होकर)

5 comments:

  1. मतलबी जहां ,मेहरबां हो तुम .

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  2. ऐसे सुलेमां, लमही के बनारस, कहां हो तुम..
    शिप आफ थीसियस का जो नया प्रिंट आ रहा है उसमें इस गाने को शामिल किया है. आवाज़ नैचुरली अपने रफ़ी साहब की ही है.

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  3. ye bina coma kii ke sentences fir padein, atpatein hain, baat nahin bantii....

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  4. @सुजानदरसी,
    पड रहा हूं, एक्‍सेप्‍टेड, बात वइसेइच किदर कब्‍बू बनती?

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