Thursday, July 25, 2013

पैट मैथेनी, चार्ली हैडेन, टूट्स थ्‍येलमेंस की संगतकारी..

बहेलिया का बहंगी में कौची का खजाना लुक्‍कल है हो?.. दिपुआ त अप्‍पन शरीफा अउर आम सब चाउर के बोरा में लुकाइल रहिस है, बब्‍बन-बो जइसे बोरी के गेंहू को सल्‍फास के गोली से बचा लेती हैं.. कइसन अन्‍हारा का सांझी है, महताब मियां?

हुआं ईनारा का पीछे कउन शेर पढ़ि‍स रहा रे,
अंगड़ाई भी वह लेने न पाये उठा के हाथ,
देखा मुझे तो छोड़ दिये मुस्‍करा के हाथ?

दीवारों के लगले मत जाइये, मंजूर भैया, बगिल-बगिल निकल जाइये, आदमी के गुजरे काबिल गली में जमीन न बची, ससुरन, हिंयां..

बड़कन की हियां बात होय रही, हुआं कवन खांसा रे?
खांसे नहीं, जब्‍बार साहब, मुन्‍नन पादे हैं, बड़ि‍का वाला!

हम त जब शहर जायें, या रेलवा में सफ़र करें, कवनो किसिम के बाथरुम होवे, भुले से उनकी ओर नज़र न करें, क्‍योंकि जान्‍यो हौ, खाला, ऐसी गंदगी पे एक बार हमरी नज़र गई नहीं कि मेदा का सब बाहिर फेंके लगता है!

हूं उधर तार कवन छेड़ा है रे, दुल्‍लन?
सफेद चमड़ीयन के दू ठो मेहमान हैं, मौसा, जाने कैसी दुखती की तान रहे?

1 comment:

  1. आपने लिखा....हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए शनिवार 27/07/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
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    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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