Monday, July 8, 2013

फेलियर ऑफ़ मिस्टर कैफ़ी एंड अदर्स रिगार्डिंग ए सर्टेन रीडिंग दैट वॉज़ सपोज्ड टू हाउस मिस्टर बिस्वास..

कभी फ़ुरसत में पढ़ेंगे, मगर कभी फ़ुरसत होती कहां है, जबकि ग्‍लोबलाइज़ेशन तक अभी बीस बरस दूर है, फिर भी मन, अभी से, कैसा अनमना बना रहता है, मजाज़ ने (या दाग़ देहलवी ने?) इस बाबत क्‍या तो वह मौजूं शेर कहा था? खिड़की के सिल पर कुहनियां टिकाने को झुकते हैं तो देह टिकने की बजाय, लपकती नीचे चली आती है, फिर नज़र आता है मरदूद सिल तो कहीं कोई है ही नहीं. सिल क्‍या, सिल की संभाल को कोई खिड़की भी कहां है? फिर किन ख़यालों में गुमे थे, कहां गुमे रहते हैं, भई.. बेमुरव्‍वत किताब किसी जाहिल ने खरीदकर दी थी मगर जाने कहां धरी पड़ी है, ओह, कैसे नामुराद दिन हैं कि बेसाख्‍ता दिल में लाईनें उमड़ने लगती हैं, ‘आज सोचा तो आंसू भर आये, मुद्दतें हो गई मुस्‍कुराये..

कैफ़ी अकेले नहीं थे कि अपने होने में न होकर कुढ़ रहे थे, वुल्‍फगांग अमेदियस ने भी नहीं पढ़ रखी थी, बिस्‍वास का घर या व्‍हॉटेवर, ‘फिगारो’ रचने की आड़ में दरअसल वह भी चिढ़ ही रहा था, ‘अब मुझे कुछ न पता कौन हूं और करता क्‍या..

मोत्‍सार्ट से ही प्रेरणा लेकर, किताब न पढ़ पाने की, कुछ सदियों बाद श्रीयुत आनंद बक्षी ने भी वह अपनी मशहूर कालातीत रचना, कोयलकंठी लताश्री की सरस्‍वतीवाणी में, रची, ‘ना कोई उमंग है ना कोई तरंग है, मेरी ज़िंदगी है है क्‍या इक कटी पतंग है.’

लब्‍बोलुबाब यह कि महान रचनाएं घटित हो जाती हैं, सीधे-सीधे एक किताब पढ़ना अलबत्‍ता नहीं हो पाता. कम से कम कैफ़ी, वुल्‍फगांग व श्रीयुत बक्षीश्री से तो नहीं ही हो सका था.. (वैसे आजकल देख रहा हूं मुझसे भी नहीं हो पा रहा, पढ़ने की जगह मैं भी रचने लगता हूं, जैसे यह भी उत्‍कट रचनाक्षण ही है)

बिदियासागर की खुशकिस्‍मती थी, कि पहले पढ़ लिया था, पिता का जीवन, बाद में सिर्फ़ उसकी नक़ल उतार रहे थे (नकल ही है, और क्‍या)..

"The future wasn't the next day or the next week, or even the next year, times within his comprehension and therefore without dread. The future he feared could not be thought of in terms of time. It was a blankness, a void like those in dreams, into which, past tomorrow and next week and next year, he was falling..


..a boy leaning against an earth house that had no reason for being there, under the dark falling sky, a boy who didn't know where the road, and that bus, went..

Already yesterday, last night, was as remote as childhood. And mixed with this fear was this grief for a happy life never enjoyed and now lost..

He went to his room, lay down on the bed and forced himself to cry for all his lost happiness."

-- Disjointed lines from a novel, Naipaul's.

2 comments:

  1. कित्ता-कित्ता और क्या-क्या पढ़ लेते हैं आप! जय हो! :)

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  2. बढ़िया प्रस्तुति !

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