Monday, July 29, 2013

घर कहां है.

लुंगी को पैरों के बीच खोंसाये, घर के अपनेपने में अनमना आदमी सोचता कुनमुनाये कि घर कहां है, अच्‍छा नहीं लगता. ताज़ा बनी चाय की चुस्‍की जीभ पर घर का स्‍वाद नहीं चढ़ाती. नहानघर की दीवार अजनबी लगती है, आईने में अपना चेहरा किसी और का मांगा लगता है; अखबार में लिपटी बाज़ार की चार चपातियां, कुर्सी के हत्‍थे पर छुटा गमछा बोलता है हम घर नहीं हैं, हमको घर ले चलो. मगर कौन-से नक्‍शे में कैसे उंगलियां फिराकर किधर ले चलें, भाई?

पिछड़े समाजों के लिथड़ों में अझुराये वो दीन अभी भी सुखी हैं जिनकी छाती और पीठ को दो दीवारें रोके हुए हैं. पचास और पांच सौ कदमों का भूगोल अपने में बझाये हुए है. जिनकी देह पर ज़रा-सा कपड़ा और गोड़ में उतना भर ही सफर है. जिनकी थकी चमकती आंखों में भूख का प्राथमिक ककहरा अभी उदासियों की उलझी शायरी में नहीं बदला, जिनकी एक गंगौली है और अपने अलीगढ़ और नखलऊ में हाथ और कांख का पसीना सूंघकर उनके पास उनकी गंगौली लौट आती है और मन भराये वो सुखी हो लेते हैं. सुखी न भी हुए, होने की उम्‍मीद में एक बरसाती नाला कमर तक हेलते हुए हंस लेते हैं. हंसी की इन फीकी तस्‍वीरों में घर का एक उदास अक्स बुन जाता है, कमज़ोर काया के सींक-से पैरों वाली, सस्‍ते फ्रॉक की सजावट में दो बच्चियां आपस में उंग‍लियां फंसाये भागती दोपहर का भोजन पाने स्‍कूल पहुंच जाती हैं, क्‍योंकि उनके पीछे, टूटी दीवार पर कुहनी टिकाये, कद में उनसे बस बित्‍ता-भर ऊपर निकली एक कमज़ोर मां एक कमज़ोर घर में उनकी राह तकती बैठी होती है, और एक बकरी के मिमियाने और डिब्‍बे में रोपे तुलसी के कुनमुनाने में घर का एक ख़याल रह-रहकर सिर उठाता मुस्‍कराता मिलता होता है.

.. लेकिन फिर एक और मां होती है, पुरइन, बच्‍चों से छुटी, अकेली; ज़माने और समय के बीचों-बीच बसा, मगर उतना ही ज़माने और समय से दूर, गांव में पड़ोसिन से बतियाती, ज़रा-सा सौदा-सुलुफ खरीदने के बहाने बाहर हवा पहचानने निकली, जबकि मन रह-रहकर उसकी छाती से निकलकर उड़ता बच्‍चों को ढ़ूढ़ने निकला जाता हो, और वह खुद से न भी पूछती हो, तो भी अंतस में कोई मुंह दाबे, उससे पूछे जाता हो कि हे अम्‍मन, घर कहां है?

दूर अपने माथे के अंधेरों में उलझी एक और पुरइन मां होती, अस्‍पताल के बिछौने पर अपनी खरखराती सांसों को सुनने की कोशिश में जूझती, हारती, उंगलियां फैलाकर बिस्‍तरे के उस कोने को टटोलती जहां अभी दूर शहर से उससे मिलने आया बेटा आई-फ़ोन पर दूर दुनिया की खबर लेता बैठा, अपनी मां की खबर से रह-रहकर छूट जाता, पत्‍नी के एसएमएस का जवाब सोचता, परसों वापसी की फ्लाईट की इत्तिला करता, ज़माने पहले इस सवाल से मुंह चुराकर निकल आया होता कि घर कहां है.

मालूम नहीं घर कहां होता है. दीवार ज़मीन अहाता बरामदों में शायद नहीं ही होता. शायद आंसुओं से भीजकर सूखते किसी गाल की नमी, कंधे पर गिरते सांसों की गरमी में, उंगलियों में दबी किसी किताब के पन्‍नों के बीच, उमगते मन किसी ठिकाने तक पहुंचने की उम्‍मीदबर खुशी में, किसी के आने की आहटों में, छिपा होता है, सचमुच का, हाथ चढ़कर थिर हो जाये जैसा कोई घर नहीं होता.

घाना से छूटी, उसका गाना गुनगुनाती, देखिए, ताइये सेलासी घर की कहानी क्‍या बताती हैं. और भीड़ के बीच सबके होकर सबसे अकेले चलते गए, पिको आयर.


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