Monday, July 29, 2013

मां ने देखा, मैं भूल गया..











खुली आंखों के सपनों में मां
फिर फेड-ईन होती है
छींट के अंचरा से मुंह पोंछती
दम लेती, लजायी, माफ़ी मांगती
जाने कहंवा गुमाय गई थीं बच्‍चा
रिक्‍शावाला पैसो ज़ादे मांग रहा था
अउर साड़ी के खूंटा हमरा हरमेसा
के खाली, जनते हो, केतना गजन गुजरकर
आई हूं तहरे कानी, कवने सिप चढाके
कवने मुसलमानिन के गांव भेज दिये थे बच्‍चा
केस हमरे से ज़ादा पाक गया लेकिन लरिकहानी
तोहार छूटी नहीं, पुरईन के केतना परेसान किये
पहचनबो नहीं किये अब तलक, अउर देखो, हम
अपना बंडलो जाने कहंवा तो भूल आये, बाबू
ई कवन दिसा के सपना है, संझा ले घर हम चहुंप
जायेंगे न, बिलाग में सगरे दिन हमके
जिन उलझाये रखना बच्‍चा ?

गनीमत हुई, ब्‍लाग में उलझा मैं
मां को सपने में पहचानने से भूल गया.

1 comment:

  1. सीधे साधे वाक्यों में बँधी माँ की गाढ़ी स्मृति।

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