Saturday, July 6, 2013

योसेप का जीवन (अधूरा)..

किसी को उद्धृत कर देने मात्र से कोई किसी की वास्‍तविकता का साक्षी नहीं हो जाता, उद्धरण मन के गमलों में किसी ख़ास दिन किसी ख़ास क्षण किसी ख़ास मिजाज़ बहल आये, प्रकटाये फूल हैं, इससे ज़्यादा और क्‍या हैं, कुछ नहीं, कुछ भी नहीं, मीलार्ड! (बिछड़े सभी बारी-बारी.. पृष्‍ठागार में अजनबी देस की अजनबी ज़बान का वह बेशऊर गीत अब भी बजता रहा, ओह.. कैन समबडी गो एंड शट् दैट ओल्‍ड मग, प्‍लीज़? ओह!) जुसेप्‍पे ने भी योसेप सोरोज़ को उद्धृत मात्र किया था, उसके जीवन की वास्‍तविकता के साक्ष्‍ताकार का प्रस्‍थान-बिंदु नहीं हो रहा था, हो नहीं सकता था! जुसेप्‍पे ऑर हूएवर.. जैसेकि मैं ही अपने पिता से जीवन में इतनी मर्तबा मिला हूं, इतने मौकों पर उन्‍हें क्‍वोट किया है, मिस्‍टर, खुद को किया है, बट कैन आई से, इवन विद् एन आयोटा ऑफ़ कॉन्फिडेंस, दैट आई नो फादर, ऑर इवन माईसेल्‍फ़ फॉर दैट मैटर? इज़ नोइंग समबडी दैट ईज़ी? कम ऑन, मीलार्ड, डोंट मेक मी लाफ!

लब्‍बोलुबाब यह कि जुसेप्‍पे योसेप को क्‍वोट भले कर सकता रहा हो, जानता नहीं था. वैसे ही जैसे मैं अपने पिता को, या अपनी सिगरेटों को, नहीं जानता. सिगरेटों को सिगरेट बनानेवाली कंपनियां भी नहीं जानतीं, अपना मुनाफा और सरकार के भीतर अपनी नेटवर्किंग जानती हैं, सिगरेट की सच्‍चाई कोई नहीं जानता. किसी शायर ने कहा है ऐसे ही नहीं कहा:

डरता हूं कहीं खुश्‍क न हो जायेगा समंदर
राख अपने आप बहाता नहीं कोई
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
एटसेट्रा एटसेट्रा एटसेट्रा..

वी ऑल नो कि जीप बम दुर्घटना के एक बेमतलब हादसे की एक बेमतलब कमउम्री में योसेप एक बेमतलब मौत का शिकार हुआ, उसके बेमतलब जीवन को बचाया न जा सका, अलबत्‍ता उसके जीवन के पीछे उसके चंद कागज़ ज़रूर बचे रहे (अभी भी अप्रकाशित, मल्लिकापट्टन व मध्‍यदेश के प्रगतिकामी वितंडावादियों की दु-र्दया! ).. चरित्रहंता और वितंडावादी, एक अन्‍य स्‍थानीय एनिगमा (अप्रकाशित, अगेन, कवि व विचारक) विक्रमादित्‍या विक्रमसिंघे की कृपा से.. इसके ढेरों प्रमाण हैं कि योसेप और विक्रमादित्‍या (कवि व विचारक) के बीच संबंध थे, अलबत्‍ता कितने घनिष्‍ठ थे यू-ट्यूब पर इसके वीडियो साक्ष्‍य नहीं (पृष्‍ठभूमि में बज रहे इस बेमुरव्‍वत गाने के हैं, बट व्‍हाई, गॉड, कैन समवन गेट अप एंड गो एंड शट् दैट ओल्‍ड मग, प्‍लीज़?).. सही है कि विक्रमादित्‍या की विकटता ने योसेप के कागजों (चंद) को बचा लिया, और इससे योसेप के जीवन के प्रकट व गुप्‍त जीवन पर प्रकाश पड़ने में मदद मिल सकेगी, मगर चूंकि विक्रमादित्‍य स्‍वयं कवि व विचारक रहे हैं, व कागज़ों की रक्षा के लिए सभी दस्‍तावेज़ों का उन्‍होंने अपनी वितंडावादी भाषा (व लिपि) में नकल किया हुआ है, बहुत बार तय करने में दिक्‍कत हुई (अभी भी हो रही है) कि डायरी (या व्‍हाटेवेर) के कौन से हिस्‍से योसेप के हैं और कौन से वितंडावादी विक्रमादित्‍य के!

एनीवेज़, नीचे इन विचारमणियों की संक्षिप्‍त नकल (हिंदी में) प्रस्‍तुत है, विस्‍तृत विवरण के लिए, कृपया, विक्रमादित्‍या विक्रमसिंघे के वेबसाइट पर लॉग इन करें..

“A sudden anxiety grips me all over, what is it? Is it love (really?), or just the idea of it?”

“जो एक के बाद दो और दो के बाद तीन की तर्ज पर जीवन की व्‍याख्‍या में विश्‍वास करते हैं, उनके बीच मैं किन विश्‍वासों के साथ रह सकूंगा, और नहीं रह सका तो मेरा अंत क्‍या आर्हेंतीना के उस महान चमकीले ब्‍युनेस आयरस के रियो दे ला प्‍लाता के तटीले नीरव सूनसान में होगा? मन के बीहड़, चोटिल, मर्मांतकारी रुपान्‍तरणों की ही तरह सभ्‍यताएं भी स्‍वयं को सदा कैसे स्‍थानान्‍तरित करती रहती हैं?”

चीनो अरब हमारा, रहने को घर नहीं सारा जहां हमारा, व्‍हॉट ईडियट रोट दिस? मारलन ब्रांडो और एंथनी क्‍वीन स्‍टारर ‘विवा ज़पाता’ देखकर अपनी पहली (तेल) कंपनी का नाम जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश ने ‘ज़पाता’ रखा था, कुड देयर बी एनी लॉजिक टू इट? इज़ एवरीथिंग इन लाइफ़ इज़ ए बिग जोक ऑर व्‍हॉट?”

“कभी लगता है सिर से पैर तक मैं तरह-तरह के दर्दों की कहानी हूं. कभी लगता है तरह-तरह के भूखों से भरी एक बड़ी भूख हूं. कभी लगता है आपस में उलझे, ढेरों सवालों की उमड़ती, एक वेगवान नदी हूं जिसके धारदार पत्‍थर लगातार आपस में टकराते हों. कभी लगता है.. मगर कभी, फिर, कुछ भी नहीं लगने की अंतहीन पथरीली उदासी भी तो खिंची रहती है, कब तक कैसे खिंची रहती है?”

प्रीतम आन मिलो, प्रीतम आन मिलो.. बट इज़ एवर देयर एनी प्रीतम रियल? रियली? आंट ऑल प्रीतम्‍स मैरिड टू देयर ओन लिमिटेशंस, देयर कन्विनियेंसेस? प्रीतम्‍स कैन नॉट कम एंड टेक अवे द बिग होल इन यूअर हार्ट, दैट इज़ द बिगेस्‍ट ट्रुथ ऑफ़ युअर स्‍टुपिडियेस्‍ट लाइफ़..”

“Mother loved my wife. I never expected such a wonderful daughter-in-law, she said. Her own situation was gloomy, with no money and her husband lost, and the life of the young couple gave her new joy. She went to the house on P. B. street with gifts she could ill afford, yodeling and prancing to delight her grandson. Early one sunny morning, when she was drinking tea with my wife, I came back from a walk with my son and announced, ‘Birds don’t fly away from a man holding a baby!’ and the two women burst into laughter at the expression of awe upon my face. ”

“मेरी किसी बात का उसे भरोसा नहीं होता, और वह हर चीज़ की शिकायत करती, जब मैं घर में मौजूद रहता तो मेरी मौजूदगी में, और मेरे न रहने पर जब-तब चले आनेवाले ज़रुरतमंदों, कर्ज़दारों, किन्‍हीं भी किस्‍म के तकाजादारों से; घर के मेज, बर्तन, दीवारों सबको मेरे खिलाफ़ गोलबंद करती रहती. शर्मिंदगी में मैं घर लौटने से कतराता शहर में आवारा फिरा करता, कभी सोचता दरिया में छलांग लगाकर इस रोज़-रोज़ के शर्म की कहानी का अंत कर दूं; मगर फिर अपने छोटे बच्‍चे की सूरत याद आती, अच्‍छे दिनों में पत्‍नी के निर्दोष प्रेम का स्‍मरण होता. अंतत: बेचारी औरत का क्‍या कसूर था, सच्‍चाई थी मेरे पास रोजगार नहीं था और घर चलाने भर तक को हमारे पास कभी पर्याप्‍त पैसे नहीं होते, न उसके होने की कोई उम्‍मीद बची थी..”

“It was not long afterwards that my wife left me and went and got herself re-married with another man who had a decent job in refineries in a distant land, and, let’s not talk about me, but hopefully, for her, it was end of her suffering.”

“For years afterwards, I remained convinced that the world was systematic for a child to become lost to his father, and I continued to expect that my son would reappear at some point—if not in real life, then at least in the list of names I sometimes read to this end. Lists of sports teams and prize winners, lists of committee members, lists of students sent on exchange visits, lists of convicts, lists of important poets, lists of patriots and botanists, lists of marriages, lists of academic appointments, lists of the approved, lists of the disgraced, and the lists of the dead.”

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