Friday, August 30, 2013

कुर्सी: एक कुर्सीजघन्‍य निम्‍नतम निबंध..

(कुर्साभाव में सीयाइन नदी की छाती दलते हुए, किन्‍हीं प्राचीनतम क्षणों में)
कुर्सी ज़रूरी है. जितनी अच्‍छी टिकाऊ और खूबसूरत होगी उतने ही अच्‍छे टिकाऊ और खूबसूरत आप भी होंगे. बड़ा सीधा सम्‍बन्‍ध है. आप जितना ज़रूरी अपने लिए हैं उससे ज्‍यादा ज़रूरी आपके लिए कुर्सी है. सारा कारोबार ही कुर्सी-अनुप्राणित है (अब अनुप्राणित का मुझसे अर्थ मत पूछिये. अनुप्राणित का अर्थ जानता होता तो मेरे कदम्‍ब नितम्‍ब के नीचे एक सुगठित प्रोफेसरायी गदरायी अहा इठलायी कुर्सी होती, नहीं होती? नहीं है). तो पहला नियम तो यह कि कुर्सी को किसी भी सूरत में मत छोड़ि‍ये. ऑफिस में तो भूलकर भी नहीं. सारे काम छूट जायें, छंटते छूटते रहें, कुर्सी किसी सूरत न छूटे. एक बार छूट गई तो दुबारा मालूम नहीं कहां, किसके चैम्‍बर में पायी जाये. दुबारा मालूम नहीं आप कहां पाये जायें. मेरे यहां गिड़गिड़़ाते नहीं ही आयें, कि भइय्या जी, बड़ा ग़ज़ब हो गया, मिनिट भर को खिड़की पर शीशा सूंघने गये रहे और इतने में.. इतने में ही तो आजकल सब होता है! इतने में ही तो आपको मनुष्‍य होने की अनुभूति होती है. इतने में ही तो आपको याद आता है कि बीसियों घंटों की हाय-हाय मचाये हुए आप अपनी कुर्सी से एक मर्तबा हिले तक नहीं हैं! तो इतने में को कम करके मत आंकिये. इतने में आपकी बीवी आपको एक मर्तबा आकर आंक गयी तो फिर आप कहीं के जहीं भी रहें, अपनी बीवी के तो नहीं ही रहेंगे. फिर आपकी बीवी और घर में उसकी कुर्सी होगी, आपका घर होगा, आप उस घर में कहीं नहीं होंगे. कवि ने वक्रोक्ति में गान कहा है ‘लोगों के घर में रहता हूं, कब अपना घर होगा,’ ऐसे मौकों के लिए ही कहा है. वक्रोक्ति का अर्थ भी मुझसे मत पूछिये. बात कुर्सी की हो रही है और बेहतर हो हम कुर्सी से हटे नहीं. (अपनी ज़रुरत के हिसाब से यहां मेरी तरह पूर्ण विराम की जगह आप विस्‍मयबोधक चिन्‍ह बरत सकते, या नहीं भी बरत सकते हैं. आपका जीवन स्‍वयं एक विस्‍मयबोधक चिन्‍ह हो तो ऐसे में अच्‍छा यही होगा कि आप विस्‍मयबोधकों को छिपाकर ही रखें, मतलब स्‍वयं को स्‍वयं से छिपाते रहें. मतलब अपने को अपने में कम, कुर्सी में ज्‍यादा देखें.)

कहीं भी खड़े रहिये (पहली कोशिश तो यही करें कि खड़ा होने का काम दूसरों को करने दें, अपने को कुर्सी में जड़ने का काम दें), चौंकन्‍नी नज़रों से ताड़ि‍ये कितनी कुर्सियां हैं, आपकी पहुंचायी वाली किधर है. एक बार इतना लोकेट हो जाये, इसके बाद उसे ओझल होने मत दीजिए. एक बार आया मौका फिर दुबारा नहीं आता (संदर्भ: ऊपर लगी मेरी फोटो को देखिए, सौंदर्य और कुर्सी की विनम्र अनुपस्थिति, विस्‍थापन को देखिए, सीयाइन नदी की पुलिया पर लेटा में, आने का एक मर्तबा पाया था, दुबारा फिर पा नहीं सका हूं. न ही अपना वह खोया हुआ काला चश्‍मा. कुर्सी तो ख़ैर तभी विस्‍थापित थी. तो अपने गाढ़े अनुभव की रौशनी में कह रहा हूं), जैसे एक बार गया वसंत फिर नहीं आता, पास्‍काल और प्रूस्‍त नहीं आते. प्रमोद सिंह आते हैं लेकिन साथ ही साथ यह भाव भी चला आता है कि कुर्सी कहां है. नहीं है. कुर्सी के अभाव में आना ‘आने’ में परिगणित नहीं हो सकता. परिगणित का अर्थ मुझसे नहीं, रामजस कालेज के सियाराम तिवारी से पूछिये.

एक बार हाथ आ जाने पर कुर्सी का ओर-छोर जान लीजिए. ऐसा न हो नितम्‍ब आपके कुर्साश्रित हों, और ओर-छोर अन्‍यान्‍याश्रित. वह ग़लत होगा. फिर आप भी अन्‍यान्‍याश्रित ही होंगे. पूरा मुल्‍क अन्‍यान्‍याश्रित हुआ खड़ा है, कम से कम आप खुद न हों. पहला काम करें उसकी गद्दी टटोलकर देखें. उसकी मजबूती. फिर कुर्सी के पाये पटककर देखिए (अपने को पटककर मत देखियेगा. करने के पहले सोचकर काम करिये कि कर क्‍या रहे हैं. आशा और राम को आसाराम से मिक्‍स मत करिये. पटकने और पीटने से अलबत्‍ता कर सकते हैं). कुर्सी को बचाने के लिए यूं भी ज़रूरी है बीच-बीच में पटकना, और पीटना. पिटना नहीं. हालांकि कुर्सी बचाने के लिए बीच-बीच में वह भी ज़रूरी हुआ ही जाता है. मूल सवाल है कुर्सी बची रहे. भले आप गड़ही में खड़े रहें. या अतल, अंतहीन समंदर के गाढ़े ठंडेपने में. दिमाग दलदल हो रहा हो, जीवन प्रतिपल दल बदल रहा हो, आप जितना भी हिले हुए हों, बस कुर्सी अपनी जगह से हिल नहीं रही हो!

सितम लिखो..

लिखो लिखो.. दौड़ते खड़ा होकर गिरे में घड़े में अड़े में कहीं से कहीं का लिखो.. छूटे जनमों के बलम दिखो, नवम्‍बर की घरबराहट को अगस्‍त की चियरायी में चिखो, लिखो लिखो..

Wednesday, August 28, 2013

ज़रा-सा, जापान..

एक ज़रा-सा गिरे हुए का यह पुरनका पतिताया, जापान.. दुसरका, मेरे हाई का पुरनके, यह, क्‍ल्‍यू.. तीसरका, आवाज़कास्‍ट, यहो एक पुरनके है, नेट पर लउक रहा है, खुद मेरे ब्‍लॉगे में खोया हुआ था.. डेढ़, या अढ़ाई, जिन दिलदारों ने वहां टीप छोड़ी रही होगी, उनसे क्षेमा चाहता हूं..


कौन है हमारी ज़िन्‍दगी चलाता..

कोई तो होगा रखता हिसाब हमारे इस जीवन का, चाटर्ड अकाउंटैंट हरामी कभी वह सामने क्‍यों नहीं आता. ज़िंदा रहने की एक शर्त होगी, लूट और दलाली की होगी, हंसता हाथ हिलाता हमारी रसोइयों से गुज़रकर शख़्स वो बैंक जाता, उसका पहचान-पत्र इस मुल्‍क में कौन दफ्तर है बनाता?




(नील यंग के दिल के तार की सवारियों के सहारे)

Monday, August 26, 2013

दु:ख के रोजगारी..

जीवन क्‍या है, भाई जी, दुख के रेजगारी है? संभाल के, एबरी इबनींग इट इस ए बेरी ट्रेफिक लांग!


Friday, August 23, 2013

लालबहादुर, देवानन्‍द, आसाराम और विश्‍वजीत..

रीढ़ की हड्डी में दर्द के शुरुआती दिनों में लालबहादुर ने समझा कि आई की चीज़ है, डॉक्‍टर को दिखलाकर गई हो जायेगी. डॉक्‍टर के जवाब के बाद कि नहीं, यह दर्द कम-बेशी होता, आजीवन बना रहनेवाला है, लालबहादुर भयातुर होकर दुबले होने लगे. जीवन को देखने, रोज़ सुबह उठने और रात को सोने जाने का सब नज़रिया ही बदल गया. पहले दवाइयों का रैपर खरीदकर इधर देना और उधर रखना जानते थे, अब उल्‍टे हाथ आंख पोंछकर उसकी महीनी में उसे पढ़ने की कोशिश करने, और बार-बार इस अहसास से कि कितने काम हैं जो अब उनसे ढंग से हो नहीं पाते, घबराने व झुंझलाये रहने लगे. बच्‍चों का कमरे में दौड़ना और शोर करना उनको तनाव से भर देता. उनकी उपस्थिति में बच्‍चे खुद भी तनाव से भर जाते.

देवानन्‍द को रीढ़ की नहीं, कंधे से जुड़े बायें बांह की थी. त‍क़लीफ़. तीन महीने जेल में था जब नहीं थी, बाहर आते ही दर्द ने घेरना शुरु कर दिया. जैसी जीवन की परिस्थितियां थीं, मुंह के पीछे-पीछे बात-बात पर हाथ भी खुल ही जाता, और खुलने के साथ ही भीतर जैसी छूटी आह गूंजती, तब जाकर होश आता कि तक़लीफ़ की कैसी नदी खुल गई है, और इस बायें हाथ के साथ देवानंद किसी काम का नहीं.

काम के आसाराम भी नहीं थे. प्रोस्‍ट्रेट पीडि़त बहुमूत्र की दिक्‍कत में वह कहीं भी जाने का प्रसंग निकलते ही मुरझाने लगते. कहीं भी जाना उन्‍हें पेशाब को रोके रखने की लड़ाई और हारकर अपनी बेहयायी का सार्वजनिक तमाशा बनाना लगता. पत्‍नी से और बेटे से झगड़-झगड़कर आसाराम ने अपना कहीं भी जाना स्‍थगित करवा रखा था. बाथरुम से लौटकर, सोफे पर पलथी मारे बैठे वह मन ही मन गिनती करते कि कितनी देर में बाथरुम दुबारा जाना होगा. इस गिनती में कैसा भी व्‍यवधान उन्‍हें चिड़चिड़ा व झगड़ालु बना देता, और आसाराम झगड़ालु थे नहीं.

जैसे विश्‍वजीत नहीं था. तब तक तो नहीं ही था जब तक डॉक्‍टरों ने उसमें एलर्जी की खोज नहीं की थी.

बुद्ध ने अपना पहला ‘भाषण’ सारनाथ में क्‍यों दिया, वहीं पड़ोस के, तात्‍कालीक सांस्‍कृतिक केंद्र बनारस में क्‍यों नहीं? पांचवी या सातवीं सदी के भारत महासागर में किसी व्‍यवसायी नौका में सफ़र करने का ठीक अनुभव क्‍या था? मुग़लों के शिकारी अभियानों का आयोजन व एक्ज़ि‍क्‍यूशन कैसा था? जो जैसे तब संसाधन थे उन संसाधनों से अंग्रेजों ने देश का नक़्शा कैसे तैयार किया था, उसकी पूरी कहानी क्‍या थी? ये और कैसे कितने ही सवाल थे जिनमें लालबहादुर, देवानन्‍द, आसाराम, विश्‍वजीत की दिलचस्‍पी हो सकती थी, लेकिन नहीं थी, क्‍योंकि उनकी दिलचस्‍पी का मुख्‍य विषय उनकी बीमारी थी.

जो लालबहादुर, देवानन्‍द, आसाराम, विश्‍वजीत नहीं थे, उन्‍हें अन्‍य बीमारियां थीं.

Thursday, August 22, 2013

पुरबिया हौजकास्‍ट













पुरबिया फुटानीबाज के कुछ पुरनिया फुटानी हैं, यहां हैं, उन्‍हीं में एक इस फुटानी का यह नवका पॉडकास्‍ट हुआ..



(परसाई जी को परनाम!)

पुरबिया फुटानीबाज का थकाइल गीत

थक जाओ भक्‍क जाओ, ठहरी गाड़ी में डोलते, पटरी-उतरी की झांक लो, मुट्ठा भर कसाईंन फांक लो, सोये रस्‍तों की हांक, बांधे डैनों की उड़ आओ, उटूक उटूक उड़ूक. छुक-छुक-छुक धुक-धड़क-धुक का टेम्‍परेचर जंचाओ, ताको ताको, देखो, उंगलियों में कैसे बाल उगते हैं, नज़रों पर चढ़ती खाल, भाषा के कंगाल में गाओ, वही तीन के तेरह- मइया गे मइया- का बैलेंस गिनाओ, सोमारो बो के बंजारे में दुखियारी का पंचांग पढ़ आओ, ग्‍वातेमाला की ढीठ पर अमरीकी पीठ, हुलु-हुलु, चढ़ जाओ, हुर्र-हुर्र की लजाइल भइंसी दिये-लिये कादो हिचिक नहाओ, ढिमिलाये पसर जाओ. पक जाओ छक जाओ, अंड़से में उठिंग, उठिंगे में चौंक जाओ. कनिया के मोह में चिचियाने लगो, भागती रेल की छत पर खुद को भगाने, खिड़की से कूदकर गुमटी की गली में गारी गुलो, दनदनाने, चोरी के झोले का पाव भर प्‍याज सजाने, कनिया के लिए अंगुल भर रंग की रंगाई रंगाने, राखरंग जुलफी सजाने, फटीयर पजामा का गांठ सझुराने, झुलसी के जीवन के लतखोर जंगखोर ज़माना में बस मिनिट भर को, बाबू, महक जाओ.

विस्‍मय बाधित..

विस्‍मय-बोधित हूं, मतलब ऑलमोस्‍ट. एक तरह से ऐसा भी कह सकते हैं विस्‍मयबोधित के पीछे-पीछे विस्‍मय-बाधित भी हूं..

हिंदी में शिल्प व रचनात्मक प्रयोगों की जो खुली चादर है, जहां ‘पोस्ट -वैश्वीकरण’ एसएमएस की शैली में, ई-मेल व ब्लॉग-पोस्ट  की तर्ज़ पर, रचनायें सिरज ली जाती हैं, कहानियों की होड़, औपन्यासिकता के कुठोड़ खड़े कर लिये जाते हैं; दैनिक सुप्रभातदैनिक प्रपात के तीन हंसोड़, मुंहजोड़ मित्र जिन पर सप्ताहांत के डेढ़ कॉलमों में चर्चा करके मित्र-धर्मिता का साग व बाग किये जाते हैं, फेसबुक पर उसकी फोटोकारी चिपकाकर थोड़ी ‘वाहों’ व ‘आहों’ का जमाव भी हुआ जाता है, मगर इन सभी मौकों पर जो चीज़ मेरा ध्यान खींचकर फिर उसी में अटकाये रह जाती है वह है आह, वह नामुराद विस्म‍यबोधक चिन्ह!

किस आसानी व हाथ की खुलाई से, लगभग मुदित-मन की अन्यमनस्कता से इस विस्मयता को बरता जाता है, कैसे, क्यों बरता जाता है, क्या‍ जवाब है? आपके पास है? यह कि जो समाज इसे बरतती है वह बड़़ी आसानी से बात-बात पर चकित, और उससे पहले मुदित होती रहती है, इसलिए? ज़रा ये साथ की सैंपलिंग पर एक नज़र मारिये: ‘मैं छप रहा हूं, प्रियवर, अहा!’, ‘देखो, यह मेरी नयी कविता आई, ओह!’, अरे?  इसके बाद ज़रा ये भी: ‘क्या, मार्मिक चित्र उकेरा है, अहा!!’, या ‘क्या, मार्मिक चित्र खींचा है, ऊहू!!!!’  आप समझ रहे हैं? फिर मुझे समझाइये, क्योंकि मैं तो नहीं ही समझ पाता. यह क्या  है क्या. इसलिए कि मूलत: हम गंवई मानसिकता के समुदाय हैं? ज़रा-ज़रा सी बात पर दायें-बायें देखते, चौंक-चौंककर विस्मयबोधक चिन्ह होते रहते हैं? पानी का आधा पिलास पी चुकने के बाद भी विस्मयबोधकता का मूल भाव जा नहीं पाता, अदबदाकर पानी पिलाने वाले हाथ के पैर को अपने पैरों से कुचलते, दहलते हकबकाकर ‘थैंक्यू!!‘ बोलने से बच नहीं पाते?

हिंदी में आवाज़, अंग, फेफड़े, धौंकनी, ध्वनि, वोकलिज़ेशन, रो, तनाव, उच्चारण, विस्मयबोधक, टेर, कानाफूसी, चिल्लाहट, चित्कार, एक नादकार शब्दाडंबरपूर्ण डिवाइस, सरप्राइस का ठीक-ठीक समाज-शास्त्रीय प्रोफ़ाइल क्या है, समझाइये मुझे. मैं अर्द्ध-विराम का इतना इस्‍तेमाल करता हूं, बेचारे की कोई इज़्ज़त नहीं, विस्‍मय-विधान का वितान इतना फैला हुआ है, क्‍यों फैला हुआ है.

इधर एक नज़र ज़रा गोपालपुरिया जी को भी देखे जाइये, और भोजपुरी से घबराहट होने लगे तो हिंदी में इधर देखले जाइये.

Wednesday, August 21, 2013

हिंदी कविता का रक्षाबंधन

राखी बंधा ले भइय्या’, या ‘एक हज़ारों में मेरी बहना है’ वाले खांटी सीधेपने में खुद को पहचानने, ढालने की हिंदी कविता ने कभी कोशिश नहीं की. साहित्यिकता व भाषा की सीमाओं में भवानी बाबू और नागार्जुन व दुष्‍यंत कुमार की ग़ज़लों के तीर रहते-रहते कभी जितने चले हों, ‘पुकारता चला हूं मैं, गली-गली बहार की’ का दीवानापन पाने के लिए, कस्‍बों व बड़े शहरों की बदलती दुनिया में मन का ताप और जिजीविषा टोहने के लिए लोग मज़रुह और आनन्‍द बक्षियों के फ़ि‍ल्‍मी तानो वा बाणों को ही खोजते रहे. हिंदी ज़बान, या कविता का जाने कैसा फटियारापन, चिरकुट गुरूर रहा कि वह अशोक चक्रधर और सुरेंद्र शर्माओं को तो खड़ी करती रही, अपने लिए एक वुडी गथरी नहीं खड़ा कर सकी, जो लोगों को उनकी अपनी ज़बान में उनका गाना दे सके, छुट्टि‍यों के दिन सड़क पर आने का बहाना, सरकारों के संग गुफ़्तगू का एक वाजिब तराना दे सके. जिजीविषा और जीवन के साथ हिंदी कविता का कभी रक्षाबंधन हुआ नहीं. साहित्‍य व आलोचना की उत्‍तर-तालिकाओं में गिनाने को जितना भी हुआ हो, समाज के बीच जाकर खड़ा होने का कभी नहीं हुआ.

Tuesday, August 20, 2013

देश जहां जा रहा है का पुरनका गाना..

यह सीकुमार भट्टाचार्जी के लिए है. और ब्‍लॉग के पुरनके पहचानियों के लिए. इसकी भी एक पुरानी रिकॉर्डिंग पहले कभी हुआ करती थी, जिसके लाड़ में सीकुमार नत्‍थी होकर बार-बार मिठाई की दुकान पहुंच जाया करते थे, और किसी को, ख़ासकर के अपनी पत्‍नी को, बताये बिना चुपचाप मीठा खाकर स्‍वस्‍थ हो आया करते थे.. पुरानी आदतें (पुराने इश्‍कों की ही तरह) छूटती कहां है, नहीं छूटती, जैसे इस अगस्‍त महीने में जाने क्‍या है कि मैं बार-बार पुरनके पोस्‍टों पर लौट-लौटकर चौंकता रहा हूं. ख़ैर, आप मुझे सुनने की जगह पॉडकास्‍ट ही सुनिये, पहले इसके साथ नत्‍थी था, जाने कैसा था, और जैसा भी था किर इंटरनेट के मायावी लोक में कहां हेराया, क्‍यों हेराया.. यह भी मज़ेदार है कि पुरानी चीज़ें बार-बार हेराकर फिर किन शक्‍लों में लौट भी आया करती हैं..

Monday, August 19, 2013

जोगी हो जोगी..

इस पोस्‍ट को पढ़ने के बाद माथा धुनने का मन कर रहा हो तो पीछे-पीछे कान सहलाने के लिए मसाला है, हल्‍का है. सिद्धार्थ देब की एक लापता किताब है, उसी के बाबत गुफ्तगू हो रही है..

ज्‍यादा बच्‍चे जहां खड़े हैं, कुछ हैं जो बैठे भी हैं..

बायें लगी फोटो कल लखनऊ में सपरिवार बैडमिंटन का मैच देख रहे उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री के परिवार का है. सीधे-सादे कपड़ों में सादा परिवार. बस बच्‍चे ज़रा गोल-मटोल दिखते. आने वाले वर्षों में असंभव नहीं कि बच्‍चों को 'मोटापे' की जांच के लिए डॉक्‍टरों की टहल करानी पड़े. मगर डॉक्‍टर की टहल औसत परिवारों में चिंता का विषय होती होगी, मुख्‍यमंत्रियों (या किसी मंत्रियों) के संसार में डॉक्‍टर, हॉस्पिटल, और खर्चे चिंता का विषय नहीं होते. सत्‍ता में बने रहने, और अपने विरोधियों को घुटनों के नीचे चांपे रहने से अलग, चिंता का दरअसल अन्‍य और कोई विषय नहीं होता. ख़ैर, मुख्‍यमंत्री के बच्‍चों पर लौटते हैं. बच्‍ची के बैलून देखिए. बेटे के टीशर्ट पर का पोलो का लोगों. लोगों बता रहा है कि बच्‍चा खेलने के लिए किन मैदानों की ओर जाने की इच्‍छा रखता है. या पापा जी उसके किधर निकल चलने की कामना करते हैं. अच्‍छे जीवन में पहुंचे हुए इन बच्‍चों को अच्‍छे स्‍कूल व वाजिब शिक्षा तक पहुंचने में दिक्‍कत नहीं होगी. शिक्षा में हम कहां खड़े हैं के चौहत्‍तर देशों की तालिका में भारत का स्‍थान जो नीचे से दूसरा है (हमसे नीचे सिर्फ़ किरगीज़स्‍तान है) उस अंधेरी, निकृष्‍ट दुनिया का ये विशिष्‍ट बच्‍चे हिस्‍सा नहीं हैं.

भारत में दरअसल दो तरह के बच्‍चे रहते हैं, एक तो वे जो भारत में नहीं, इंडिया में रहते हैं, और मां के पेट से निकलते ही अंग्रेजी में तैरने लगते हैं, क्रिकेट वाला टीशर्ट कुछ अन्‍य, नालायक बच्‍चों के लिए छोड़, खुद पोलो का टीशर्ट पहनकर सपरिवार वीआईपी लाउंज की पहली कतार में मैच देखनेवाले सोफाओं पर अपनी जगह घेर लेते हैं. या ऐसे परिवारों के लिए वह पहले से ही आरक्षित रहता है. दूसरे, तिहत्‍तरवें (तालिका में) स्‍थान की वे नामुराद औलादें हैं जो पांचवी कक्षा में पहुंचकर अभी दूसरी कक्षा का पाठ तक नहीं पढ़ पाते (देहातों में 58%), दो अंकों वाले जोड़-घटाव नहीं कर सकते (46%), तीसरी कक्षा के पचास फीसदी हरामी नालायक जो कायदे से एक से सैकड़ा तक की गिनती भी नहीं सीख सके हैं! जबकि जालिम सरकार क्‍या-क्‍या नहीं करती. छयासठ वर्षों से कर रही है. कल ही मैंने फेसबुक पर यू-ट्यूब से उठाकर एक वीडियो चिपकाया था, 1968 में कैनेडा से मंगवाकर कोटा, राजस्‍थान तक बहत्‍तर टन का एक आणविक संयत्र पहुंचाकर सरकार लोगों के जीवन में बिजली लाने के लौमहर्षक युद्ध-स्‍तर के मंगलकारी कृत्‍य में जुटी है. लोग हैं कि उजबकों की तरह ताकते गड़ही, सड़क, पोखरे में खुद को, बकरी और बच्‍चों का चूतड़ धोते-नहलाते, भटके ढोर-डंगरों की तरह विचर रहे हैं. ऐसे लोगों से उम्‍मीद करना कि कभी उनके बच्‍चे भी पोलो का मैच खेलने जायेंगे, एकदम व्‍यर्थ है. कभी बिजली पायेंगे की उम्‍मीद करना भी व्‍यर्थ है.

सरकार कितना सारा खर्च करती है कि बच्‍चों तक शिक्षा पहुंचे. तहलका का ताज़ा आज़ादी अंक प्राथमिक शिक्षा के मसले पर ही केंद्रित है. मगर नालायक बच्‍चे और उनके नालायक परिवार हैं कि अपने जीवन के इन मंगलकारी कृत्‍यों से दूर जाकर खड़े हो जाते हैं. या पता नहीं वह पैसा ही है कि उनसे दूर खड़ा, जाने किन और की जेबों में पहुंचता रहता है? कभी-कभी कहीं नहीं पहुंचता. जैसे आज के एक्‍सप्रैस में खबर है कि वर्ष 2009 से 2012 के दरमियान नारी व शिशु कल्‍याण मंत्रालय बलात्‍कार पीड़ि‍तों के लिए नियत 239 करोड़़ रुपये का एक टका खर्च नहीं कर सकी. पता नहीं कैसे नहीं कर सकी. मुख्‍यमंत्री के परिवार के पीछे-पीछे बैडमिंटन का मैच देखने गयी थी? या उन बच्‍चों से अपने को दूर खड़ा किये रहने की कोशिश कर रही थी जो पोलो का टीशर्ट पहनकर कभी बैडमिंटन का मैच देखने के काबिल नहीं होंगे, और जीवन भर जानेंगे नहीं कि वो भारत में रहते हैं और भारत इंडिया का उपनिवेश है और इंडिया दरअसल अमेरिका की जेब में रहता है, और जब नहीं रहता तो यहीं कुछ खानदान और खरबपती हैं उनकी जेबों में रहता है और वहां दाखिल होने के लिए अच्‍छी दलाली और दलाल स्‍ट्रीटों की शिक्षा लेनी होती है?

छोड़ि‍ये, आपके बच्‍चे अच्‍छे स्‍कूलों में हैं न? उम्‍मीद करता हूं आप इंडिया में ही रहते हैं. भारत पता नहीं किस दु:स्‍वप्‍न का नाम है.

(पहली फोटो: पीटीआई से, दूसरी तहलका से साभार) 

Sunday, August 18, 2013

कैसे, मगर कैसे, कर लेते हैं?

यह खाने का ब्‍लॉग है, यह घूम आने का. यह अरमानों का, यह ज़मानों का. यह ऊंट को बहलाने का,  यह शहंशाही जताने का. यह विज्ञान में रमने और ज्ञानगुण गुनगुनाने का. यह फिर बने रास्‍तों से निकलकर ज़रा दुनिया झांक आने का..

फिर एक यह जगह है स्‍वीडी कविताओं को हिंदी में बांच पाने का. ज़ाहिर है आप ही के लिए है, मैं तो हिंदी की भी नहीं थाह पाता. जिसे कविता समझकर लिखता हूं उसे समझधनीगण कविता की तैयारी का मसौदा-पत्र पढ़ने और तदर्थ मंतव्‍य सजिस्‍टि‍याने लगते हैं. उनका क़सूर नहीं है. हाथ के बहकने का मुझमें पुराना दोष है. सातवीं कक्षा में जिम्‍मेदारी से स्‍कूल की रूल्‍ड कॉपी में देवानन्‍द का मनोहरपना आंकता था, चहककर कक्षा के साथी प्राण का अच्‍छा स्‍केच बना लेने की बधाई देने लगते थे. होता है. समय के साथ हाथ से लगा-लगा दिमाग भी बहकना सीख जाता है. कविता व अन्‍य समग्र सोचता रहता है, पुस्‍तकें छपवाने का पुणीत कृत्‍य अन्‍य न भटकेले तीक्ष्‍णप्राण किये जाते हैं.

मगर कैसे कहां से पैदा होते हैं ऐसे तीक्ष्‍णप्राण? या ऐसे किम्‍बा वैसे ब्‍लॉग ही, कैसे खड़ा कर लेते हैं, लोग? निकल लेते हैं लोग, या लड़की साइकिल लेकर निकल लेती है, जबकि मैं एक खड़ी तक नहीं कर सकता?

किताब, मामूली















बहुत दिनों बाद फिर रिकॉर्डिंग का धूल झाड़े, माईक को बाहर लाये, हालांकि हाथ में जो कागज़ सजाये, वह पुराना ही था, जिसका एक पुराना पॉडकास्‍ट भी कभी हुआ करता था, इंटरनेट की दिलजोरियों में खो गया, हम यहां दुबारा उसे पाने की कोशिश कर रहे हैं.. बकिया जो पढ़े गये का ऑरिजनल पाठ है, उसकी ब्‍लॉग वाली चिपकायी यहां रही..


(यह ख़ास दरभंगाकुमारी के लिए)

Saturday, August 17, 2013

प्राइवेट मसला है..

पढ़ना प्राइवेट मसला है. जैसे नाक सुड़कना, और कान खुजाना है, क्या पढ़ें और कैसे पढ़ें, उसके बारे में कोई आपको क्या बतायेगा? या आप ही किसी को क्या  समझाने लगेंगे? फेसबुक पर स्टेटस बनाने से अलग उसका और मतलब न होगा. पढ़ाई सामाजिक बतकुच्चन बने उतनी पहले समाज में शिक्षा के संस्कार हों. यहां बड़के-बड़के लिखवैया जीवन के सत्तर-सत्त‍र साल प्रेमचंद के आगे क्या‍ है, और पीछे क्या  था, कहते-करते निकाल लेते हैं, दॉस्येवेस्की और तॉल्सतॉय के गुटका संस्करण से आगे निकलने के नाम पर कांखने लगते हैं, प्रूस्त को देखते ही हमने ‘शेखर: एक जीवनी’ पढ़ रखा है की कांख कांखने लगते हैं, वहां पढ़ने के बारे में बात करना मोहन चोटियों के बीच बस्टर कीटन के सपाट चेहरे की कॉमेडी पर हंस सकने की सामर्थ्र्य का परायापन है. साहित्य के कुरु-कुरु स्वाहा काल से बाहर निकलकर नाइज़ेरियन बाला के अमरीका पर हंसकर उदास हो सकने का सुख. हिंदी ऐसे सुखों पर बाड़ लगाये रखकर उसे कांजी हाउस बनाये रहती है. कॉलेजों के मास्टर अखबारी परिशिष्ठ  में बारह किताबों की लिस्ट गिनाकर साहित्य  का चिल्‍लर हिंदी सिनेमा चलाते रहते हैं. मास्टरी, व बच्चों  को एक लाईन में खड़ा कर लेने का काम इतने से भले होता हो, पढ़ने के अनूठे आनंद से उसका कोई संबंध नहीं होता. शायद इसलिए भी न होता हो क्योंकि मास्टरी खुद का जीवन से बहुत संबंध नहीं होता. नेताओं की तर्ज़ पर मास्टर क्लास हांकना जानते हैं, समाज बनाना नहीं जानते. किताब कहां से आती है और कहां जाती है, और जहां नहीं जाती, उस दुनिया की औरतों के मन में क्या  गीत बजता है, औरतें क्या गाती हैं, इसे कोई नहीं जानता. क्यों होता है कि एक समूचे समाज का इकलौता सांस्कृतिक कृत्य भौंचक होकर सिनेमा देखना हुआ रहता है, पढ़ना ज्यादा से ज्यादा माथे की टिकुली बनता है, और वह भी फेसबुक पर सजा आने की बनता है, या फिर जल्दी -जल्दी किताबों से कैसे खाली हों की ख़बर बनाता, पढ़ने की कभी कविता नहीं बनती. सुनकर अच्छा न लगे, सुनकर मन नीचा हो जाये, मगर सच्चाई आंखों में चुभती, गड़ती रहती ही है कि पढ़ना प्राइवेट मसला है. लिखने की कहानियां बनती रहती हैं, किताबों के बिकने की, दुनिया बदलती रहती है, न पढ़ सकनेवाले समाजों में पढ़ना प्राइवेट एक्टिविटी बनी रहती है.

Friday, August 16, 2013

एक और..

लर्निंग इंग्लिश इन अॅ फ़ैमिली काइंड ऑफ़ वे, वाया रुमाल एंड द अदर वूमन..

जीवन छूटता है, मकान नहीं छूटता..

जीवन हारकर साथ छोड़ देता है, मगर एक मर्तबा मकान में घुसने के बाद किरायेदार कब्‍बो मकान छोड़ता है, कहां छोड़ता है जी? छुड़ाने की, और न छोड़ पाने की, एक अंतहीन, दीन, संगीन, गुफ़्तगू के महीन, रंगीन तानें चलती हैं, किरायेदार कहीं नहीं चलता..

धूल ओर धायं की दुनिया है, ज़रा कदम बचाके चलो..














यह जो दुनिया थी, और फौज़ ने जो उस दुनिया को जो शक्‍ल बख्‍शी.. उम्‍मीद के जीवन को कितना कलेजा चाहिए होता है, उम्‍मीदों के घड़े में कितने सुराख होते हैं..
'तुम मेरे पास रहो' का पास रहना कितना मुश्किल होता है.

तीन पुराने पॉडकास्‍ट..














सुख की दवाई, मनोरमा की भगाई, विष्‍णु की पढ़ाई, जूतों की कीनाई.. कितने मर्ज़ हैं, जीवन में कैसे कहां-कहां छुपे दर्द हैं.. 



(सितम्‍बर, 2009)

दीदी के मनुहार..



और यह.. भीजे मन का रोमान..



(जनवरी, 2009)

(डरी, घबरायी एक रेल रांची जाती होती, यह उस रांची की संगत के लिए)

Thursday, August 15, 2013

ओ मेरे सलम हो मेरे सनम..

पचीसों पॉडकास्टियां जाने वर्चुअल संसार के किन कोने टहलने निकल गईं.. हार्ड ड्राइव पर कहीं सहेजकर रख सकता था, मगर फिर देखता हूं खुद को भी नहीं रख सका हूं. सहेजकर. ढेरों जीवन शायद ऐसे ही बीतता है. कही बातें सब भूल-भूल जाती हैं, भाईजी का कबीता-पाठ, रुपाली घोष का चुप पटाये रहना, फिर कुछ भी याद नहीं रहता.

चौंकिये मत, यहां और यहां सुनियेगा तो स्‍वयं जानियेगा. और हां, पढ़ने की नहीं, सुनने की कह रहा हूं..

और इसको पढ़ने की नहीं, इसको कह रहा था. हद है. 

(2008 और 2009 की अलमारियों से है)

आंख में..












हां, भोर उनींदे सपना-न्यूज़ में 
ख़बर आई है, झूठ नहीं, खांटी 
सैकड़ा प्रतिशत सच है, एकदम 
रिबन-चोटी की लम्बी रस्सियां 
झूल, डकैती करने ही चढ़ा था 
बच्चों की खिलौना-रेलगाड़ी में
फिर ग़लती हुई जाने, या कि 
पुरानी यादों के प्रेत होंगे 
जागे के सपने में दीखे 
प्लास्टिक के खेत होंगे 
बहका, आंख मूंदे किसी पगलोल 
बुढ़ि‍या की लोरी सुनने लगा 
हारा, आदत का मारा तीन कविता 
में जीवन की पहेली और आदर्श 
के पंचांग बूझने लगा, डोले-डोले 
ऊंघने लगा, यहीं हुई कि जाने 
शुरुआत से ही ग़लती के 
सिलसिले थे, इतने में तो मामला 
पेरु से निकलकर पेराम्बूंर पहुंच 
चुका, इतने में तो हरामख़ोर 
हमसे चौदह दर्जा होशियार बच्चे 
लुटे डकैत की आंख में धूल फेंक 
फेर किये, हमको घेर लिये 
धड़ाम-धड़ाम बैलून का बम फोड़े 
बेरहम डकैत को वहीं ढेर किये.

12.07.09

संदीप की दीपशिखा के रात औ' दिन..

फोटो क्रेडिट: निर्मल पोद्दार
गरीबी के सैरे में ठिठककर खड़े होने के बाद, फिर तेज़ी से दौड़ लैने का कौशल संदीप पाल ने सीख लिया था. दीपशिखा गोप सीख लेने से बार-बार खुद को बचा ले जाती. बाकी लड़कियां गुट में बैठकर हाथों में मेंहदी रचतीं, दीपशिखा मासी की गाय का सानी करने चली जाती. दीवाली के वक़्त पड़ोस के किसी बच्‍चे को गोद में लिये उसके हाथ की फुलझड़ी से चेहरा रौशन करने की जगह, शोर-शराबे से दूर अस्‍पताल के कैजुअल्‍टी की बेंच पर बैठी समय गुज़ार आती. हाथ की चूड़ी और कान के टॉप में ही नहीं, पूजा-त्‍यौहार में भी दीपशिखा की दिलचस्‍पी नहीं थी, मगर दो दिन उपवास करना ही पड़े तो बिना आवाज़ किये भूखे रह लेने का सहज कौशल था उसमें. संदीप काम से लौटकर दीपशिखा की कहानी मालूम पड़ने पर सन्‍न हुआ उससे कहता, तुमि पूरो पागोल, तुमि जानो तो?”

दीपशिखा ने पहले भी यह वाक्‍य सुना था. यह भी कि उसका व्‍याह नहीं होगा, वह सुंदरी नहीं है. दीपशिखा की छाती में उंगलियों की पोर पर और कांख के सूने नमियों में संगीत बजता था, वह सुनती थी, उसे किसी व्‍याह की क्‍यों ज़रुरत थी? वह गिलहरी की तरह इस ठेर से उस टेर तक चुपचाप दौड़ जाना चाहती थी, देह झाड़कर हड़ि‍यल चेहरे पर धूप की गरमी ले लेना चाहती थी, वह क्‍यों चाहे जो बाकी सब चाहते थे?

मगर संदीप चाहता था, शायद इसीलिए वह इतना दौड़ता दिखता था. दीपशिखा संदीप का दौड़ना सुनकर आंखें मूंद लेती.

"  गिरती ढलानों पे डेरे थे, कैसे रहस्‍यमयी घेरे, ढलती संझाओं में छुपे जुगनुओं के सबेरे थे. ऐसी ही कुछ उड़ती पंक्तियां, बेख़्याली में पिरोई तुकबंदियां, माने खालिस बकवास, गुनगुनाता संदीप भागा जाता, दीपशिखा उसका हाथ थामे हंसती बेहाल हुई जाती. हंसते-हंसते थक जाने के दरमियान फिर पूछती, “तार पोर? उसके आगे?” संदीप भागने की बहक में गाल में तर्जनी धंसाये सोचने का अभिनय करता कहता, रात और दिन दीया जले, फिर भी मगर जाने केनो आंधारा है.. हंसती दीपशिखा संदीप को मारने लपकती, “शड्अप! चुप्‍प!” दौड़ते बेहाल दोनों गिर पड़ते. लस्‍तम-पस्‍तम की बेध्‍यानी में पिंडलियों में कहीं ठोकर लगती, या यूं ही कहीं नस खिंचने की तक़लीफ़ में दीपशिखा के मुंह से दबी आह छूटती, “मेरा हुआ!”

“कहां? कैसे?” घूमते आसमान में घूमती दीपशिखा के चित्र को स्थिर करने की कोशिश करता संदीप कहता. साड़ी और साये को ऊपर सरकाती दीपशिखा दर्द टटोलती, कि चोट कहां है. संदीप मुंह बनाकर कहता, “मुझे बस दीख रहा है कि तुम पैरों के बाल कभी शेव नहीं करती.”

दीपशिखा कुहनी से संदीप को परे ठेलकर कहती, “मुझे भी दिखता है तुम्‍हारे नाक की उगी हुई फुंसी. भौं पर कटे का निशान.”

“और कंधे पर? पीठ पर?” संदीप वापस दीपशिखा के नज़दीक आकर मनुहार करता.

“कंधे की खिंची हड्डयां. पीठ पर चोट खाया एक चांद..”

“मगर पसलियों की नुमाइश तुम्‍हीं दिखाती हो, ना की, ना की? बोलो! कितनी बार गिना है मैंने?” हंसते हुए संदीप कहता.

“इसलिए कि तुम्‍हें गिनती का शौक है,” पैरों पर साड़ी गिराती दीपशिखा बोलती, “मुझको नहीं है.” वह ज़मीन पर पेट के बल लेट जाती.

“फिर किसका है?” संदीप दीपशिखा के नज़दीक लेट कर बोलता. अब दोनों एक दूसरे की सांसों की बहक सुन सकते. हालांकि दीपशिखा ज़मीन से लगे अपने गाल पर सोई घासों का जलना सुनती होती, फुसफुसाकर कहती, “मैं सुनती हूं.”

“मगर पैर की उंगलियों पर चढ़ा नेल पॉलिश सुनाई नहीं देता. बांह पर बंधा काला तागा, मेरी बनियाइन का फटा, मासी के पैर के बिवाय, उनके गाय की फटी आंखें, मेरी उंगलियों का कांपना दीखाई देगा, तुम्‍हें सुनाई नहीं दे सकता.”

“मैं सुनती हूं,” घास के अंधेरों में आंखें मूंदकर दीपशिखा बोलती.

ढलान से नीचे रेतभरा एक ट्रक गुज़रता होता. रपटी बकरियों का एक झुंड बेतहाशा सड़क के किनारे भागा जाता, साइकिल की हैंडिल पर मछली का झोला टांगे शंखधर मैत्र ढलती सांझ की लकीर पर लौटते; संदीप की आंखों में वह समूची दुनिया धुंधलके का उजास-सा अस्‍पष्‍ट बनी रहती, सिर्फ़ दीपशिखा की नंगी पिंडलियों के महीन रेशों में घने जाल नज़रों में तैरते रहते.

दीपशिखा विक्षिप्‍त मां के अकेलेपन के सूनसान का बुदबुदाना सुनती. छोटे भाई खोकोन की बहू की निस्‍संग, आत्‍मलीन खुशी का बाजा बजाना, भाई की लापरवाह थकान और किसी सूरत में जो जैसा है, चलता रहे, की तरतीब भिड़ाने की बेचारगी, खुद अपनी जवानी का बेआवाज़ गुज़रते जाना, दीपशिखा सब बिना आवाज़ किये सुनती.

एक तंग छोटे से घर में कितनी खुशी आ सकती है? कहां से आ सकती है?” दीपशिखा उमस नहाई गरदन पर हाथ फिराती कहती.

“उस तंग छोटे से घर में पहुंचकर आखिर तुम्‍हें मैंने खोज लिया, नहीं खोजा? उसे नहीं सुना तुमने?” संदीप कहता और एकदम उदास हो जाता.

संदीप पाल छोटी-मोटी नौकरी करता है, छोटी-मोटी कविताएं करता है, हंसता है तो अच्‍छा लगता है, उदास होने पर किसी बीमारी के असर में है जैसा लगता है. दीपशिखा संदीप से प्‍यार नहीं करती, प्‍यार जैसा प्‍यार दुनिया में किसी से भी नहीं करती, मगर संदीप बीमारी के असर में लगे सो भी नहीं चाहती. दांत दिखाये जवाब देती, “मैं सुनती हूं तुम मुझसे पूरे पांच वर्ष छोटे हो! फिर मुझसे व्‍याहकर वह कुछ भी नहीं पाओगे जो तुम्‍हारी उम्र के तुम जैसे एक होशियार लड़के का पाने का हक बनता है!”

“ऐसा? अच्‍छा? सुन लेती हो ये सब?” संदीप आंख चढ़ाकर चिढ़ा सवाल करता.

दीपशिखा होंठ भींचे मुस्‍कराती सिर हिलाती जवाब देती, हां हां.

दीपशिखा की हड़ि‍यल देह पर के टूटे बटन वाले ब्‍लाउज़ के भीतर किसी रहस्‍यलोक की रक्षा के सरंजाम के बतौर बताने लायक ब्रेसियर जैसा कोई ब्रेसियर नहीं होता. उधड़ी हड़ि‍यल छातियों पर किन्‍हीं चांद-सितारों के रहस्‍यमयी अरमान भी नहीं टंके होते; उन पर संदीप के गिरे चेहरे के घने बालों पर दुलार का हाथ फेरती दीपशिखा कहती, “पूरो पागोल तुमि, यहां कुछ नहीं है तुम्‍हारे लिए, तुम्‍हें क्‍यों नहीं दिखता? ”

किसी चिड़ि‍या के नम होंठों की तरह दीपशिखा की छातियों को अपने मुंह और आंख के सपनों में कैद करता संदीप फुसफुसाता, “मेरी चीख़ तुम्‍हें सुनाई नहीं देती? कुछ सुनाई नहीं देता, तुम बहरी हो!”

आंखें मूंदकर दीपशिखा मुस्‍कराती, “हां, हूं. जैसे तुम पागल हो, इस जनम क्‍या किसी जनम मैं शादी करनेवाली नहीं..”

नीचे कोई बदतमीज गिरहत्थिन फिर बेसुरा गाना शुरु करती, रात और दिन दीया जले..

(10 अक्‍टूबर, 2010)

Wednesday, August 14, 2013

हैलो सुकेशजी, हैलो मुकेशजी, हैलो पंद्रह अगस्‍तजी!

नॉलेज मैप: न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स से
व्‍हाट् इज़ द मैप ऑव ह्यूमन नॉलेज़! एक पुराना मन-उजियारन सवालिया पोस्‍ट है, 2009 जुलाई का है, मगर जुलाई के पीछे-पीछे अगस्‍त पहुंचता ही है, जैसे दो दिनों से ब्‍लॉगर पर नये-नये टैंप्‍लेट्स की चीर-फाड़ोपरांत हम फिर-फिर पुरनके, क्‍लासिक टैप्‍पलेटों के पास ही पहुंचते हैं. आईटी के होशियार बच्‍चे हमें उबार सकते होते, मगर पाजियों को खुद से कबारते रहने से फ़ुरसत निकले तब न? फ़ुरसत नहीं निकलती. भागते-भागते अज़ीज़ और करीब का हाथ दबाते हैं, जिसका नहीं दबा पाते, उसे फेसबुक की खिड़की से दूर से हाथ हिलाकर चिढ़ाते हैं, क्‍योंकि घर से निकलते ही फिर फेसबुक में ही उलझना होता है(यह दिव्‍य-दर्शन केरल के एक मित्र का है), हंसने की फ़ुरसत में हकबकाये मुंह से 'हैलो, सुकेश जी' निकलता है (कभी होश में 'हैलो, हुकेश जी' भी निकलता है!). जैसे कल दिन-भर 'हैलो, पंद्रह अगस्‍त' निकलता रहेगा.. मैं वह वाला 'हैलो' दोहराने की जगह एक यह वाला पुराना पोस्‍ट हिला रहा हूं, खुद को फिर से एक झूठे लालीपाप में बहलाता कि..

व्‍हाट् इज़ द मैप ऑव ह्यूमन नॉलेज़!..

मगर वह शहर, पटना..

बचपन के शहर की अपनी एक ख़ास महक होती है. पेड़, सड़कें, स्‍कूल की छतों और गुमटियों के मुहाने, गली के कोने में धोतियों को जोड़कर खड़ा किया पूजा का पंडाल, गुलमोहर के नीचे घड़ी भर के दम लेने को ठहरा साइकिल-रिक्‍शावाला, बरसात की बाज़ार की किचकिचायी पगडंडियों और जाड़े की सांझ खेल के मैदानों की नमी में हम सब कहीं उस महक को पहचानकर लम्‍बी सांस भरते, हाथ छिनकते, सिर झुकाये घर लौटते खुद को बार-बार बताते रहते हैं कि बहुत हुआ, अब नहीं चाहिए यह शहर. फेफड़ों को नयी हवा और उनींदे को नयी उम्‍मीद चाहिए.. और फिर बहुत सारे कांपते महीनों के पार, सुनसान रातें और पाला मारती ढेरों सुबहों के बाद आखिरकार एक वह दिन भी आता है जब उस बेगैरत ज़मीन की नाकाम हवाओं की आखिरी परतों को देह से झाड़कर, अपने को अपने से दूर करते, हम निकल भागते हैं.. कि उस पुराने का कुछ भी हमारे साथ न बचे!..

ढेरों रेलगाड़ि‍यां बदलकर, अंधी गलियां और अंधेरे शहरों में मुसाफ़ि‍र होकर, दवाख़ाना, चायघर और किताब की दुकानों और सिनेमाघरों की पिछवाड़े की गली में हाथ नचाकर ज़ि‍रह करते अपनी सांसों को हम /धीमे-धीमे, रफ्ता-रफ्ता.. एक नयी रिहाइश देते हैं, टेक की कहीं ज़रा जगह पाकर देह उमगती बुदबुदाती है कि अच्‍छा, तो फिर यह नया ठिकाना हुआ अपना? अपने पैरों का चलना और उस एक ख़ास महक की संगत हम भूल जाते हैं, या वर्षों ऐसा लगता है कि हम बहुत दूर निकल आये, मगर यह ख़याल-भर होता है, वह पुरानी महक हमेशा हमारे साथ रहती है..

पटना की उदास महकों में लौटते की लिखाई का यह चिंकी सिन्‍हा का ब्‍लॉग है. पटना वाला टुकड़ा कुछ संपादित संशोधनों के साथ ताज़ा ओपन मैगज़ीन में.. कृपया थोड़ी फ़ुरसत निकालकर, टूटा दिल कनपटियों के नीचे दाबे, चिंकी को पढ़ते कुछ दूर पीछे लौटे जाइयेगा, देखिएगा, किस फुरती से कितनी सारी महकें लौटी आती हैं..

Sunday, August 11, 2013

जीवन के अगत्‍सीय, पंद्रह, मध्‍यमार्गी, करतब..

कार के फ्लोर-मैट को सही पहचान लेना, किचन में कैसे कितने कपबोर्ड होंगे जान लेना, तसल्‍ली से सोफे में धंस लेने की ठसक दिये देता होता, कोपेनहेगेन जाने की सोचना और टच-वुड, बच्‍चे वर्नाकुलर से बचे हुए के इतमीनान में चैन की सांस पड़ती होती, जैसे पड़ोस की मौसी की गंवई हंसी को पड़ोस की बालकनी की दूरी में देखकर गांव की याद के न भुले जाने का दर्प हौले से ज़रा हंस लेने का दुलार दिये जाता, कढ़ी अचारों व याज्ञवल्‍क्‍य जैसे तीन नामों के सही उच्‍चारों में कल्‍चर बचा लिया जाता होता, दाद भगंदर जैसे व्‍यभिचार कभी इस मैटेड वॉल और इमिटेशन इटैलियन टाइल्‍स पर आकर टिकने ठहरने की नहीं करते जुर्रत, कोंहड़ा और सहजन तलक जो आते तो सेपरेटली आते, मेज़ पर अगल-बगल एक-दूसरे को पहचानने से बचते, मुंह बिगाड़कर खुद को पम्‍पकिन और ड्रमस्टिक कहलवाते, बेडरुम में पाद घर में आवारा मेड सी अचाही, कंपल्शिव नेसेसिटी-सी कभी भी सामने और पीछे आकर धायं देना खड़ी होती, घर में घर से ज़्यादा जीवन का एसेंट और ज़बान के एक्‍सेंट की जुंबिश होती. कंट्री फ़ारस की खाड़ी और अरबों अनाड़ी होते, इससे इतर हमारा होम, स्‍वीट होम होता, और ओह, कितना-कितना तो महकता, पासपोर्ट के सुगंधी सुरंग में बाहर जीतने को एक पूरी समूची दुनिया होती, और हम रोज़-रोज़ होते, कितना क़ामयाब होते.

Saturday, August 10, 2013

पानी, आग और आसमान में डूबे रंग..

कैसे कोई घुले रंगों की नम, उनींदी नीली-नारंगी दुनिया की तस्‍वीरें खींच लाता है, बच्‍चों-सी शैतानियां करता हमें मुंह बिराता है, या अपनी-अपनों में खोया निस्‍संग लापरवाही में समय-सारों को महज़ अपनी पीठ दिखाता है? मुंह पर हाथ धरे मैं सोचता पलटकर फिर ब्‍लॉग देखता हूं..

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Friday, August 9, 2013

मुबारक मुबारक

फोटो: FB पर नीरज शाह की दीवाल से
वो कुछ अच्‍छा-अच्‍छा बोलने की मंशा लेकर आये थे, लगे हाथ अच्‍छा सुन लेंगे की कहते हाथ दबाते, मुस्कियाते, लहराते चले आये थे, आते ही लात-हाथ फेंकने लगे, थोड़ी मुझको बहुत ज्‍यादा मुझे मेरा कच्‍छा-बनियान दिखाने समझाने लगे, मतलब आसपास के सब जहान को धो-धोकर पिलाने लगे, हाथ ऊपर किये मैं लपककर अलमारी चढ़ गया, गिड़गिड़ाता बौराने लगा, आज ईद है, भाई जान, कटोरी-भर सेवइयां नहीं लाये, ठीक है इतना ग़म हम घोलकर पी लेंगे, पीकर घुलते भूलते रहने की आदत है, मगर यह देगची और ओसारा-भर गालियों में तो मत नहलाइये, त्‍यौहार का दिन है आज तो मुंह की इस डेढ़ कटोरी जर्दा से बाज आइये. लहराकर अलमारी से नीचे खींच वो मुझको बतलाने, नज़ारों की रंगीनी में गिराने लगे, ससुर कितने भोले हो, अनामिका के फेलियर तीसरे आशिक, अनमनाईन पुर के शोले हो, डेढ़ हाथ की कुरती औ’ छौ हाथ की बेचारगी में तीज औ’ त्‍यौहार फिराने निकलते हो, आईने में दीखता है चेहरे की रंगत कैसी उड़ी हुई है, अबे कपूरशंख, क्‍या खाकर ईद मनाने चलते हो, चिरई के कपार पर हाथी का भंडार लादे का क्‍यों तुम्‍हें शौक चर्राये रहता है, हम कहते हैं मुंह पर रुमाल बांधे चुप्‍पे पटाये रहो तो मुंह पर लाली डाले मुबारक जिंदाबाद बोले का खौफ़ कैसे, कहां से तुमको अटकाये रहता है. हाथ-मुंह धो लो, गली की गुमटी से एक उधारी की बीड़ी पिये आयेंगे, लगे हाथ कोई मिल ही गया जो तो साथे ईद की सेवइयो पायेंगे!

Thursday, August 8, 2013

ओट की ओट..

फोटो: https://www.facebook.com/nirmal.poddar.7
‘ई कौची है, बुच्‍चन’, मुंह में पहला चम्‍मच डालते ही मौसा का चेहरा बिगड़ गया, ‘सुबहै-सुबा बकरी बनाये ला हमहीं भेंटाये थे जी?’

मौसा सच्‍ची के मौसा नहीं थे, न उनकी अपनी कोई मौसी थी, वह तो चंदन उनकी खड़खड़ि‍या स्‍कूटर के पीछे दौड़ता उनको ‘फिर तेल चुआ रहा है, मौसा?’ पुकारता रिसाया करता था, उसी की देखादेखी सबके बीच मौसा नाम पड़ गया.

‘ओट का उपमा है,’

‘ओट का है? सामने का नहीं बना सकती थी?’ वइसही घबराये, मुंह से चम्‍मच की डेढ़ बित्‍ता की दूरी बनाये मौसा बुदबुदाये.

मेरा माथा गरमा गया. वइसही सुबह से सुग्‍गा रंग का सलवार और नारंगी कलर का ओढ़नी डाटे भागाभागी में हलकान हो रहे हैं, कौनो एक्‍को मर्तबा नहीं पूछिस कि नवका सलवार कब सिलाइस रे रंजु, और हियां नया रेसीपी आगे पेश करके दो तो पीछे-पीछे फिर एसप्‍लेनिंगो करते चलो! रहते-रहते, सच्‍चो, मन उचिट जाता है ई घर में, लेकिन फिर घर छोड़ के लइकी जात जाये कहां?

‘आपौ मौसा, छुपाये वाला नहीं, खाये वाला ओट है! अमरीका में ऊ सब खाता है, आपका किस्‍मत है आपको बनाके खिया रहे हैं तो आपको बुखार छूट रहा है, एक बार परीक जाइयेगा त फिर आके रोज हमसे निहोरा करते रहियेगा, नहीं खाये के है त रख दीजिए प्‍लेट, नौटंकी मत बतियाइये!’

मैं टुटका मोढ़ा खींचकर बैठ गई, नारंगी ओढ़नी से गाल और गरदन का पसीना पोंछने लगी. मौसा प्‍लास्टिक वाली कुरसी पर संभलकर प्‍लेट का उपमा संभालने लगे. धीरे-धीरे हिम्‍मत बांधकर दो चम्‍मच मुंह के अंदर किये. लेकिन चेहरे का गड़बड़ाया रंग गड़बड़ाया ही रहा.

हमको सुतपा पर गुस्‍सा आ रहा था. मुंहजार कहीं की, खुद कीनी नहीं, हमके पट्टी पढ़ाके साठ रुपैया का कोट कीनवा दी! कोट नहीं, ओट! अउर हियां कोई खइय्ये नहीं रहा है! चंदनवो डेढ़ चम्‍मच छूके प्‍लेट सरका दिया, अम्‍मा, देखी न तुम, हम परौठा मांगे त अंड-बंड का खेला करके सबको भुक्‍खा मार रही है?

‘अब अमरीका वाला तगड़ा खाना हियां का छकड़ा-छकड़ी पेट से पचेगा, हो,’ मुंह में फिर से एक चम्‍मच डालने की हिम्‍मत करके मौसा बोले, मुंह अलबत मेहराया ही रहा, ‘ऊ पेप्‍सी-लेप्‍सी अउर कोला-ठोला का बात अलग है, नाक दाबके आदमी नीचे गिरा लेता है, तीन ठो डकार छोड़के मामला खलास, मगर ई ओटवा त बुच्‍चन,’

‘अइसा मुंह में गड़ रहा है त रहे दीजिए,’ हमको मौसा पर ममता छूट गया, ‘बाद में चुन्‍नन या बंटिया खा लेगा, या लाइये, बकरी का कटोरा में बसिया दाल के संगे फेंट के डाल देते हैं?‘ खीझ में मैं दन्‍न से उठी और पीछे मोढ़ा उलिट गया.

मौसा ‘ना-ना, ना-ना’ बोलते प्‍लेट पीछे खींच लिए.

मैं डरकर ठहर गई, कि कहीं ऐसा न हो कि मौसा को लिए-दिये पुरनकी प्‍लास्टिक की कुरसियो जवाब दे दे! इस घर की कौनो एक चीज का भरोसा है जी, न्‍न्‍ना!

मौसा के हिम्‍मत को दाद देना पड़ेगा, दू चम्‍मच अउर ओट का गरदन का नीचे उतार लिए, ऊपर से मुस्‍कराकर बोले, ‘पुरनका जाति का लोक है न, बुच्‍चन, नवका ची सब पचाये में अड़चन त पड़बे न करेगा हो? मंजरी का शादी में ऊ मर्तबा हम मोजा पहिन लिये त चाम में तीन दिन कइसा आगी फूंक दिये रहा? अब धीरे-धीरे न आदत पड़ता है जी? अब रंजन नक्‍शा में हमसे शिलांग खोजने को पूछ दिये थे त हम अंततोगत्‍वा खोज लिये कि नहीं? शिलांग आखिर भारते में न है जी, हमसे पकड़ाता कइसे नहीं? अमरीको पकड़ायेगा, पकड़ायेगा कइसे नहीं, ई दुनिये में न है, बुच्‍चन?’

(धीरे-धीरे बदलती दुनिया के बाहर एक अमरीका होता है जो कटे-पिटे सपनों में लौट-लौटकर पकड़ाता रहता है, मगर उससे भी बहुत-बहुत बाहर कई सारी और दुनिया होती है, शिलांग, सियाटल, शांघाई से दूर, ओट की ओट, पहचानी आवाज़ों से, अभ्‍यस्‍त पहचानों से दूर, वह कैसे पकड़ायी में आता है?– स्‍वामी अपूर्णानन्‍द )

रात बाकी का ठेका

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खूब खटय्या खूब नचय्या
मचर-फचर फींच फिंचय्या
ताथा ताथा ताथा थइय्या 
नीला पीला लाल गझीला
हांक सवारी भांक सवारी
कल्‍टन पल्‍टन भूल-भटक्‍कन
बोतल शीशी पुड़ि‍या ढक्‍कन
पंजा अड़चन सीढ़ी सड़कन
रात का नक्‍शा खाली बक्‍सा
मटकी छुरा गांठ धतूरा
रंग सारंगी रात नारंगी
दम बरसाती बेदम नाली
बंधे हाथ की बेढ़ंग ताली
आंखें जाली कितबियन खाली
ले-ले ले-ले हाली हाली.

Wednesday, August 7, 2013

दिल्‍ली जो शहर है..

दिल्‍ली की अय्यारी और नयी उमर की उसकी अय्याशियों पर दो वर्ष पहले राना दासगुप्‍ता ने एक अच्‍छा निबंध लिखा था, ज़ाहिर है अंग्रेजी में लिखा था, जैसाकि नीलांजना रॉय एक दूसरी अय्यारी के संदर्भ में कभी पहले लिखती हैं, और दासगुप्‍ता जैसे विशिष्‍ट की नहीं, आम लिखनेवालों की बाबत कह रही हैं, “And as this generation begins to tell and write its stories.. There are 125 million English speakers, of whom a much higher percentage has made it their first language in the decade since the Census data (2001) was collected, a number large enough to make its own marketplace. If that happens, this new generation of writers might finally be able to step away from the debates that have come down across a century-and-a-half of Indian writing in English,” और जैसाकि किसी और ने कहा है, कहने को मैं भी कहे जाता हूं, कि ‘भारत के बारे में लिखना अंग्रेजी में ही लिखना होता है’, इतर ज़बानों में लिखा राष्‍ट्रीय प्रसंग नहीं बनता, न उस छोटे लघुकाय ‘भाषायी लिखाई-पढ़ाई’ समुदाय से बाहर किसी के ध्‍यानाकर्षण की वज़ह बनता है.

‘राष्‍ट्र एक राष्‍ट्रीय भाषा से बनता है’ यह जिसने भी कहा था वह भारत आकर देख सकता है कि गुनगुनाने, गाली और गोली चलाने, माल बेचने, खरीदने की भाषा जो भी हो, विचार-वितरण की भाषा अंग्रेजी ही है. और इसके बाबत (वैसे ही जैसे हिंदी की महान, व महानतम किताबों की बिक्री का वास्‍तविक आंकड़ा क्‍या है, और हिंदी कविताओं की किताब कौन खरीद रहा है, और अंग्रेजी ‘जान चुके’ कितने अभिभावक हैं जो अपने घर के बच्‍चों को हिंदी साहित्‍य में ‘दीक्षित’ करने का उत्‍साह रखते हैं, की बाबत) लोग दिखावे में कितना ही गाल बजावें, भीतर की असल वास्‍तविकता क्‍या है से सब खूब परिचित हैं. पिछले हफ्ते फेसबुक पर जैसे एक पंजाबी (अंग्रेजी) के स्‍टैंड-अप कॉमिक ने तीन शब्‍दों का एक स्‍टेटस छोड़ा था, ‘आंध्रप्रदेश गया तेलंगाने’, तो कुछ उसी तर्ज़ पर हिंदी के तेल लगाने गये को भी अब एक ज़माना हो गया है. उस हिंदी को हो ही गया है जिस हिंदी के पीछे कॉलेजों में मास्‍टरी पायी जाती है, आलोचना के ग्रंथ लिखे जाते व पुरस्‍कार-प्राप्ति की कवितायें लिखी जाती हैं. एनीवे, दिल्‍ली व राना दासगुप्‍ता से बहकता कहां मैं फिर हिंदी की तिलकुटई में उलझ गया.

दिल्‍ली की नयी अय्यारियों पर राना दासगुप्‍ता का दिलचस्‍प लेख अंग्रेजी में है, और ऑनलाइन ग्रांटा के वेबसाइट पर है लेकिन सब्‍सक्रिप्‍शन की मांग करता है, गनीमत है राना ने उसे यहां चढ़ा रखा है. एक और दिलचस्‍प लेख शहर नहीं, व्‍यक्ति (आईआईपीएम के अरिंदम चौधुरी) पर सि‍द्धार्थ देब ने लिखा था, मान-हानि के अदालती टंटे में जिस पत्रिका के लिये वह लेख लिखा गया था, पत्रिका ने अपने वेबसाइट से उसे हटा लिया है, यही नहीं संदीपन की निबंधों की जिस किताब का वह पहला निबंध हुई थी, देख रहा हूं उसके भारतीय प्रिंट-संस्‍करण से भी वह गायब है, गनीमत है किसी जुझारु बच्‍चे ने उसे नेट पर अभी तक बचा रखा है, कभी फुरसत निकालकर धीरज से उसे यहां बांचिये.

बाकी फिर बांचने को रामसुजान सुमिरन शास्‍त्री की कबीता है ही:

हिंदी गयी है तेल लगाने
एक जोम है एक थानवी
बकिया बाढ़ है कुकुरमुत्‍ता
पटने सतने बरेली अपने
हंसने-हंसाने अलख जगाने
इधर दिखाने उधर लगाने
वर्ष के गिनके तीं झुनझुने
बारी-बारी उनको पाने.

Tuesday, August 6, 2013

एइ रात तोमार-आमार..

‘एइ रात तोमार-आमार, ओई चांद तोमार-आमार, सुधु दु जने, ये नयन डरे-डरे,’ कैसी-कैसी गलतफहमियों का जाल पसरा होता है, जबकि ‘परबतों के पीछे चांद का अंधेरा’ पहचानने वाले खूब जानते हैं कि रात तुम्‍हारी-हमारी नहीं होती (मोस्‍टली गुंडों की होती है), चांद गड्ढों का संसार होता है, और सिर्फ़ दो जने अकेले कभी होते नहीं, सपनों में भी नहीं, और नयन डर नहीं शिकायतों और दुश्‍वारियों का लैंडस्‍केप होते हैं. कल्‍पना का मधुर रोमान कितना हमारी लाचारियों, जीवन की हारे पर अपनी दुकान चलाता है? ‘तुम जो मिल गए हो, ये जहां मिल गया,’ मिला, सचमुच? चार हफ्ते भर बाद जाकर पता कीजिए उनके मिलने के बाद जहां मिला है, या जहां को नेगोशियेट करने की नई शिद्दत से जुंबिश शुरु हुई है!

मगर यह देर दोपहर मेलंकलिया की मैलडी गाने की जगह मैं कड़वाइयां क्‍यों गुनगुना रहा हूं? जानने की सचमुच जिज्ञासा रखता हूं तो बहुत पहले यह समझ में क्‍यों नहीं आ जाना चाहिए था कि वस्‍तुगत सच जैसा कोई सच होता नहीं? समय और समाज अपने सेक्‍टेरियन स्‍वार्थ में सच की नित नयी-नयी मनोहर कथाएं गढ़ता रहता है, कि समाज और शासन का कारोबार निर्बाध चलता रहे; लोग, मेरी ही तरह, मुंह बाये उसे तोमार-आमार की सच्‍ची कथा के मनोभावों में गुनगुनाते, बस से उतरकर बैठक की टेली-कथाओं में समय औ’ समाज को भूल जाने पहुंच जाते रहें.

बुद्ध के गए सौ वर्ष भी नहीं बीतते कि उनकी फ्रैंचाइसी और मर्चेंडाइसिंग शुरु हो जाती है, ऐसा कैसे होता है कि कोई क्रांतिकारी विचार, धारणा अभी ठीक से समाज में दुरुस्‍त भी नहीं होती कि समाज के चंपक तत्‍व उसे अगवा कर ‘फिर बैतलवा डाल पर’ के पेड़ पर चढ़ा आते हैं? आदिवासी देवताओं को ब्राह्मण अपने रॉटरी और लायंस क्‍लब में शिफ्ट कर लेते हैं, ढेरों मातृ-देवियों को अपने भगवानों की बीवियों में बदलकर अपना सब्‍सक्रिप्‍शन लिस्‍ट बढ़ाते चलते, चीन की तर्ज पर अमरीका की नकल करते कांग्रेसी साहित्‍य-निधि कैलेंडर में एमएस गुप्‍त के बाजू जीएम मुक्तिबोध को मुस्‍कराता दीखाने लगते हैं, नियमगिरी की नींव हिलने लगती है, तवलीन सिंह जैसी समाज-ज्ञान-प्राण-विदुषी चीखती हकलाने लगती हैं, कि यह आदिवासी एइ रात तोमार-आमार क्‍यों नहीं गा रहा? जबकि आदिवासी ही क्‍यों, हम सभी सारे ओई चांद तोमार-आमार ही गा रहे होते हैं.

इधर ज़रा मुलाहिजा फरमाइये: “ऐसे तपस्‍वी भिक्षु अब भी थे जो नंगे पैर यात्रा करते, खुले में सोते, बचे-खुचे अन्‍न की भिक्षा ग्रहण करके उदर-निर्वाह करते और लोकभाषा में ग्रामवासियों या आटविकों को उपदेश देते; पर उनकी संख्‍या व प्रतिष्‍ठा निरंतर घटती जा रही थी. भिक्षु के लिए निर्धारित चीथड़ों से सिले हुए वस्‍त्रों के स्‍थान पर अब कीमती केसरिया रंग में रंगे बढ़ि‍या सूती कपड़े, उत्‍तम ऊन अथवा विदेशी रेशम के सुरुचिसंपन्‍न वस्‍त्रों का इस्‍तेमाल होता था. लगता है यदि स्‍वयं बुद्ध उस भव्‍य संस्‍थान में, जो उनके नाम पर चलता था, पहुंचते तो उनकी खिल्‍ली उड़ाई जाती और उन्‍हें निकाल दिया जाता, बर्शते कि संयोगवश वह कोई अलौकिक चमत्‍कार दिखाकर अपने को साबित कर पाते. बुद्ध ने ऐसे चमत्‍कारों की हंसी उड़ाई थी, पर अब ये उस धर्म के अभिन्‍न अंग बन गए थे और अनेकानेक बुद्धों के अलौकिक चमत्‍कारों की कथाएं फैल चुकी थीं. अतिप्राचीन प्रजनन-अनुष्‍ठान, कुछ परिष्‍कृत होकर, तंत्रविद्या के रुप में पुन: प्रचलित हुए; इन्‍होंने न केवल नए संप्रदायों को जन्‍म दिया, बल्कि ये बौद्ध, जैन व ब्राह्मण धर्म-कर्म में भी प्रविष्‍ट हुए. जिस प्रकार अपरिग्रह व सादगी भिक्षु-संघ के पूर्वकालीन नियम त्‍याग दिए गए थे, उसी प्रकार पद-प्रतिष्‍ठा के बोलबाले के कारण पुरातन सिद्धांत भी धुधले पड़ गए थे.. प्रत्‍येक विहार का संचालन एक ही परिवार के अधिकार में रहने लगा; आवश्‍यकतानुसार, विहाराध्‍यक्ष का पद अधिकार में रखने के लिए, उस परिवार का कोई तरुण प्रव्रज्‍या भी ग्रहण कर लेता था. संघ और राज्‍य के बीच समझौता हो गया था. परिणामत: नागरिक जीवन में जो स्‍थान चक्रवर्तिन का था, उसी के अनुरूप धर्म के क्षेत्र में बुद्ध को दर्जा दिया गया.”[1]

पता नहीं कोसंबी यह सब लिखकर हमें क्‍या बताना चाहते रहे, या सहोटा ही क्‍या बता जायेंगे. संजीव सहोटा की नयी किताब खामख्‍वाह ‘साड्डा हक्‍क‘ का ढोलक बजाती आई है, जबकि सब जानते हैं कि सड़कों के गड्ढे हमारे हो सकते हैं, सड़कें हमारी नहीं, कार-मैनुफैक्‍चरिंग कंपनियों की सहूलियत के लिए बनाई गई हैं, जैसे नदियों के गिर्द का रेत रेत-माफिया के मुनाफे की सहूलियत के लिए जिंदा रहता या बेदम की मौत मरता है. सच नहीं मैं मनोहर कथाएं बोल रहा हूं, वैसे ही जैसे कोई आवारा लड़की है मेरी ओर पीठ किये जाने किसको याद करती गुनगुना रही है ‘एइ रात तोमार-आमार, ओई चांद तोमार-आमार, सुधु दु जने’..


[1]. ‘प्राचीन भारत की संस्‍कृति और सभ्‍यता’, डीडी कोसंबी.

Sunday, August 4, 2013

सांझ के क्‍लब का इक आवारा जैज़..

बाज आया इतनी और उतनी तुमको सुनाकर, तुम्‍हारी सुनने के गांवों बहलता, खुद को भुलाकर; यह रस्‍ता जो है उसमें साथ मिलते, गरज जीवन की हाथ मिलते हैं, बात गुनगुनाता पास आता दिखता है, बेबात की बरातों में स्‍टेज पर खुशियाता, हाथ माइक लिए लहकता, लतीफ़े सुनाता, रात की रंगीनियों को दिलदारनगर बताता, बुनता मिलता, साथ महकने लगे, आह, वैसी रात नहीं क्‍यों नहीं मिलती कभी!

या फिर तुम कहना, इतना सारा और इतनी देर कहना कि कहने का एक समूचा शहर बन जाये और मैं उसमें खो जाऊं, और आंख खुले तो जाने कितने घण्‍टों किस ज़माने खुले और जागे के उस नगर में फिर तुमको, ठीक तुमहीं को सामने पाऊं, और फिर तुम कहता दिखो कि उस कहन की पीठ पर फटी आंखें जागा मैं शहर से बाहर आऊं, कि फिर नशे का कोई तागा हो, मेरा एकाकीपन अभागा, कि मैं जोर-जोर से कहता हिलूं, और तुम हंसी में हिलगते दिखो.