Sunday, August 4, 2013

सांझ के क्‍लब का इक आवारा जैज़..

बाज आया इतनी और उतनी तुमको सुनाकर, तुम्‍हारी सुनने के गांवों बहलता, खुद को भुलाकर; यह रस्‍ता जो है उसमें साथ मिलते, गरज जीवन की हाथ मिलते हैं, बात गुनगुनाता पास आता दिखता है, बेबात की बरातों में स्‍टेज पर खुशियाता, हाथ माइक लिए लहकता, लतीफ़े सुनाता, रात की रंगीनियों को दिलदारनगर बताता, बुनता मिलता, साथ महकने लगे, आह, वैसी रात नहीं क्‍यों नहीं मिलती कभी!

या फिर तुम कहना, इतना सारा और इतनी देर कहना कि कहने का एक समूचा शहर बन जाये और मैं उसमें खो जाऊं, और आंख खुले तो जाने कितने घण्‍टों किस ज़माने खुले और जागे के उस नगर में फिर तुमको, ठीक तुमहीं को सामने पाऊं, और फिर तुम कहता दिखो कि उस कहन की पीठ पर फटी आंखें जागा मैं शहर से बाहर आऊं, कि फिर नशे का कोई तागा हो, मेरा एकाकीपन अभागा, कि मैं जोर-जोर से कहता हिलूं, और तुम हंसी में हिलगते दिखो.

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