Monday, August 19, 2013

जोगी हो जोगी..

इस पोस्‍ट को पढ़ने के बाद माथा धुनने का मन कर रहा हो तो पीछे-पीछे कान सहलाने के लिए मसाला है, हल्‍का है. सिद्धार्थ देब की एक लापता किताब है, उसी के बाबत गुफ्तगू हो रही है..

3 comments:

  1. दो आवाज़ों के लिए दो बार सुना। आपकी मिक्सिंग का भी जवाब नहीं। और पीछे-पीछे गाना भी। :-)

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    1. वैसे असल चीज़ किताब है, मैं तो सिर्फ़ हाथ-पैर, और मुंह, फैंक रहा हूं.

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