Sunday, August 11, 2013

जीवन के अगत्‍सीय, पंद्रह, मध्‍यमार्गी, करतब..

कार के फ्लोर-मैट को सही पहचान लेना, किचन में कैसे कितने कपबोर्ड होंगे जान लेना, तसल्‍ली से सोफे में धंस लेने की ठसक दिये देता होता, कोपेनहेगेन जाने की सोचना और टच-वुड, बच्‍चे वर्नाकुलर से बचे हुए के इतमीनान में चैन की सांस पड़ती होती, जैसे पड़ोस की मौसी की गंवई हंसी को पड़ोस की बालकनी की दूरी में देखकर गांव की याद के न भुले जाने का दर्प हौले से ज़रा हंस लेने का दुलार दिये जाता, कढ़ी अचारों व याज्ञवल्‍क्‍य जैसे तीन नामों के सही उच्‍चारों में कल्‍चर बचा लिया जाता होता, दाद भगंदर जैसे व्‍यभिचार कभी इस मैटेड वॉल और इमिटेशन इटैलियन टाइल्‍स पर आकर टिकने ठहरने की नहीं करते जुर्रत, कोंहड़ा और सहजन तलक जो आते तो सेपरेटली आते, मेज़ पर अगल-बगल एक-दूसरे को पहचानने से बचते, मुंह बिगाड़कर खुद को पम्‍पकिन और ड्रमस्टिक कहलवाते, बेडरुम में पाद घर में आवारा मेड सी अचाही, कंपल्शिव नेसेसिटी-सी कभी भी सामने और पीछे आकर धायं देना खड़ी होती, घर में घर से ज़्यादा जीवन का एसेंट और ज़बान के एक्‍सेंट की जुंबिश होती. कंट्री फ़ारस की खाड़ी और अरबों अनाड़ी होते, इससे इतर हमारा होम, स्‍वीट होम होता, और ओह, कितना-कितना तो महकता, पासपोर्ट के सुगंधी सुरंग में बाहर जीतने को एक पूरी समूची दुनिया होती, और हम रोज़-रोज़ होते, कितना क़ामयाब होते.

1 comment:

  1. कोंहड़ा और सहजन तलक जो आते तो सेपरेटली आते, मेज़ पर अगल-बगल एक-दूसरे को पहचानने से बचते, मुंह बिगाड़कर खुद को पम्‍पकिन और ड्रमस्टिक कहलवाते
    :)

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