Wednesday, August 14, 2013

मगर वह शहर, पटना..

बचपन के शहर की अपनी एक ख़ास महक होती है. पेड़, सड़कें, स्‍कूल की छतों और गुमटियों के मुहाने, गली के कोने में धोतियों को जोड़कर खड़ा किया पूजा का पंडाल, गुलमोहर के नीचे घड़ी भर के दम लेने को ठहरा साइकिल-रिक्‍शावाला, बरसात की बाज़ार की किचकिचायी पगडंडियों और जाड़े की सांझ खेल के मैदानों की नमी में हम सब कहीं उस महक को पहचानकर लम्‍बी सांस भरते, हाथ छिनकते, सिर झुकाये घर लौटते खुद को बार-बार बताते रहते हैं कि बहुत हुआ, अब नहीं चाहिए यह शहर. फेफड़ों को नयी हवा और उनींदे को नयी उम्‍मीद चाहिए.. और फिर बहुत सारे कांपते महीनों के पार, सुनसान रातें और पाला मारती ढेरों सुबहों के बाद आखिरकार एक वह दिन भी आता है जब उस बेगैरत ज़मीन की नाकाम हवाओं की आखिरी परतों को देह से झाड़कर, अपने को अपने से दूर करते, हम निकल भागते हैं.. कि उस पुराने का कुछ भी हमारे साथ न बचे!..

ढेरों रेलगाड़ि‍यां बदलकर, अंधी गलियां और अंधेरे शहरों में मुसाफ़ि‍र होकर, दवाख़ाना, चायघर और किताब की दुकानों और सिनेमाघरों की पिछवाड़े की गली में हाथ नचाकर ज़ि‍रह करते अपनी सांसों को हम /धीमे-धीमे, रफ्ता-रफ्ता.. एक नयी रिहाइश देते हैं, टेक की कहीं ज़रा जगह पाकर देह उमगती बुदबुदाती है कि अच्‍छा, तो फिर यह नया ठिकाना हुआ अपना? अपने पैरों का चलना और उस एक ख़ास महक की संगत हम भूल जाते हैं, या वर्षों ऐसा लगता है कि हम बहुत दूर निकल आये, मगर यह ख़याल-भर होता है, वह पुरानी महक हमेशा हमारे साथ रहती है..

पटना की उदास महकों में लौटते की लिखाई का यह चिंकी सिन्‍हा का ब्‍लॉग है. पटना वाला टुकड़ा कुछ संपादित संशोधनों के साथ ताज़ा ओपन मैगज़ीन में.. कृपया थोड़ी फ़ुरसत निकालकर, टूटा दिल कनपटियों के नीचे दाबे, चिंकी को पढ़ते कुछ दूर पीछे लौटे जाइयेगा, देखिएगा, किस फुरती से कितनी सारी महकें लौटी आती हैं..

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