Friday, August 16, 2013

तीन पुराने पॉडकास्‍ट..














सुख की दवाई, मनोरमा की भगाई, विष्‍णु की पढ़ाई, जूतों की कीनाई.. कितने मर्ज़ हैं, जीवन में कैसे कहां-कहां छुपे दर्द हैं.. 



(सितम्‍बर, 2009)

दीदी के मनुहार..



और यह.. भीजे मन का रोमान..



(जनवरी, 2009)

(डरी, घबरायी एक रेल रांची जाती होती, यह उस रांची की संगत के लिए)

13 comments:

  1. शुक्रिया... ये तीनो पॉडकास्ट मेरे फ़ोन में है... अक्सर मैं इसे सुनता हूँ और दोस्तों को भी कई बार सुनाया है.

    मनोरमा वाला अल्टीमेट है...

    घर में माचिस खोजे वाला भी शानदार था...

    और ला विया एन रोज़ वाला भी...

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  2. एक विनती है की मकान वाला पॉडकास्ट भी यहाँ लगा दीजिये....

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    1. लगाते हैं, बाबू, मकानो वाला चराते हैं.

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  3. http://azdak.blogspot.in/2012/05/blog-post_08.html

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  4. दीदी...ऊ सूट को पहन के तुम कितनी अच्छी लगती हो तुम्हें मालूम है. और इसके पीछे बजता हारमोनियम...शाम में अचानक कितना अच्छा लगता है. लगता है जैसे पटना के घर में पहुँच गए वापस. भाई के साथ रियाज़ कर रहे हैं. आज भाई को राखी कुरियर किये हैं. मन कैसा कैसा भीज गया है.

    दीदी...चलो न.
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    थैंक यू. बहुत बहुत बहुत सारा.

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    1. शुक्रिया, पूजा, तुमरे मिठास से कुछ हमरो मन तरा. कौन-सी चीज़ कहां छू जाती है, क्‍यों छू जाती है यह भी जीवन का अनोखा प्रसंग है..

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  5. पूजा ने बांटा यह लिंक फेसबुक पर, वहीँ से इस पते पर पहुंचे हम...

    एकदम अपनी सी आवाजें... बहुत अच्छा लगा यहाँ आना!
    और जैसा आपने लिख रखा है "आएगा आनेवाला", तो आने वालों में से हैं... अब आते रहेंगे!

    सादर प्रणाम!

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    1. सादर चरनस्‍पर्स भी कह सकती थीं, मगर कह सकीं?
      आनेवाला आता है यहीये बताने की खातिर कि जा रहे हैं, इंडक्‍शन पर खौलता दूध छोड़कर आये हैं..

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  6. सादर एवं अभिभूत हृदय से चरणस्पर्श!

    गलती सुधार ली है, अब आप क्षमा कर दीजियेगा...!

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  7. अभी फ़िर से तिनो बाजा सुने। सोलह सांप लोटने वाला जबरदस्त है। खूब!

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    1. शुक्रिया, अनूप, ऐसे ही अंधेरों में आवाज़ों की यह रेल बहलती चलती रहे.

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  8. एगो हमारा भी फिरमाइश है. ऊ वाला पॉडकास्ट चफ़नाइये जिसमें देश सही जा रहा था.

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    1. आपका फिरमाइश के लिए कहीं नवका सिरा से चोराई करना होगा, क्‍यूंकि पुरनका फ़इलिया त आपका पठाया कवनो जुवेलथीफ़ नेट से ले उड़ा है.

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