Saturday, August 17, 2013

प्राइवेट मसला है..

पढ़ना प्राइवेट मसला है. जैसे नाक सुड़कना, और कान खुजाना है, क्या पढ़ें और कैसे पढ़ें, उसके बारे में कोई आपको क्या बतायेगा? या आप ही किसी को क्या  समझाने लगेंगे? फेसबुक पर स्टेटस बनाने से अलग उसका और मतलब न होगा. पढ़ाई सामाजिक बतकुच्चन बने उतनी पहले समाज में शिक्षा के संस्कार हों. यहां बड़के-बड़के लिखवैया जीवन के सत्तर-सत्त‍र साल प्रेमचंद के आगे क्या‍ है, और पीछे क्या  था, कहते-करते निकाल लेते हैं, दॉस्येवेस्की और तॉल्सतॉय के गुटका संस्करण से आगे निकलने के नाम पर कांखने लगते हैं, प्रूस्त को देखते ही हमने ‘शेखर: एक जीवनी’ पढ़ रखा है की कांख कांखने लगते हैं, वहां पढ़ने के बारे में बात करना मोहन चोटियों के बीच बस्टर कीटन के सपाट चेहरे की कॉमेडी पर हंस सकने की सामर्थ्र्य का परायापन है. साहित्य के कुरु-कुरु स्वाहा काल से बाहर निकलकर नाइज़ेरियन बाला के अमरीका पर हंसकर उदास हो सकने का सुख. हिंदी ऐसे सुखों पर बाड़ लगाये रखकर उसे कांजी हाउस बनाये रहती है. कॉलेजों के मास्टर अखबारी परिशिष्ठ  में बारह किताबों की लिस्ट गिनाकर साहित्य  का चिल्‍लर हिंदी सिनेमा चलाते रहते हैं. मास्टरी, व बच्चों  को एक लाईन में खड़ा कर लेने का काम इतने से भले होता हो, पढ़ने के अनूठे आनंद से उसका कोई संबंध नहीं होता. शायद इसलिए भी न होता हो क्योंकि मास्टरी खुद का जीवन से बहुत संबंध नहीं होता. नेताओं की तर्ज़ पर मास्टर क्लास हांकना जानते हैं, समाज बनाना नहीं जानते. किताब कहां से आती है और कहां जाती है, और जहां नहीं जाती, उस दुनिया की औरतों के मन में क्या  गीत बजता है, औरतें क्या गाती हैं, इसे कोई नहीं जानता. क्यों होता है कि एक समूचे समाज का इकलौता सांस्कृतिक कृत्य भौंचक होकर सिनेमा देखना हुआ रहता है, पढ़ना ज्यादा से ज्यादा माथे की टिकुली बनता है, और वह भी फेसबुक पर सजा आने की बनता है, या फिर जल्दी -जल्दी किताबों से कैसे खाली हों की ख़बर बनाता, पढ़ने की कभी कविता नहीं बनती. सुनकर अच्छा न लगे, सुनकर मन नीचा हो जाये, मगर सच्चाई आंखों में चुभती, गड़ती रहती ही है कि पढ़ना प्राइवेट मसला है. लिखने की कहानियां बनती रहती हैं, किताबों के बिकने की, दुनिया बदलती रहती है, न पढ़ सकनेवाले समाजों में पढ़ना प्राइवेट एक्टिविटी बनी रहती है.

5 comments:

  1. एक समूचे समाज का इकलौता सांस्कृतिक कृत्य भौंचक होकर सिनेमा देखना हुआ रहता है

    हम त बिना सनीमा देखे इसे पढ़कर भौंचक रह गये।

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  2. पढ़ने के बाद गढ़ना, सब ऐसे ही बह जायेगा तो कौन सा पढ़ना। पढ़ने के बाद लोग चढ़ना भूल जायें तब है बात।

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  3. आपके ब्लॉग को ब्लॉग एग्रीगेटर "ब्लॉग - चिठ्ठा" के विविध संकलन में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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  4. ई त बांच चुके हैं।

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