Sunday, August 18, 2013

किताब, मामूली















बहुत दिनों बाद फिर रिकॉर्डिंग का धूल झाड़े, माईक को बाहर लाये, हालांकि हाथ में जो कागज़ सजाये, वह पुराना ही था, जिसका एक पुराना पॉडकास्‍ट भी कभी हुआ करता था, इंटरनेट की दिलजोरियों में खो गया, हम यहां दुबारा उसे पाने की कोशिश कर रहे हैं.. बकिया जो पढ़े गये का ऑरिजनल पाठ है, उसकी ब्‍लॉग वाली चिपकायी यहां रही..


(यह ख़ास दरभंगाकुमारी के लिए)

4 comments:

  1. किताब, मामूली
    चमत्कारिक है यह…!
    मामूली है यह, तो किसे चाह होगी विशिष्टता की!

    Thanks a ton for recording it:)

    चरणस्पर्श प्रणाम!

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  2. कविता का मसौदा अच्छा है। लिखा जाये अब!

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  3. शुक्रिया महाराज , ऐसे अन्धिआरे समयों में कुछ सरल सीधी बातों का दिलासा

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