Monday, August 19, 2013

ज्‍यादा बच्‍चे जहां खड़े हैं, कुछ हैं जो बैठे भी हैं..

बायें लगी फोटो कल लखनऊ में सपरिवार बैडमिंटन का मैच देख रहे उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री के परिवार का है. सीधे-सादे कपड़ों में सादा परिवार. बस बच्‍चे ज़रा गोल-मटोल दिखते. आने वाले वर्षों में असंभव नहीं कि बच्‍चों को 'मोटापे' की जांच के लिए डॉक्‍टरों की टहल करानी पड़े. मगर डॉक्‍टर की टहल औसत परिवारों में चिंता का विषय होती होगी, मुख्‍यमंत्रियों (या किसी मंत्रियों) के संसार में डॉक्‍टर, हॉस्पिटल, और खर्चे चिंता का विषय नहीं होते. सत्‍ता में बने रहने, और अपने विरोधियों को घुटनों के नीचे चांपे रहने से अलग, चिंता का दरअसल अन्‍य और कोई विषय नहीं होता. ख़ैर, मुख्‍यमंत्री के बच्‍चों पर लौटते हैं. बच्‍ची के बैलून देखिए. बेटे के टीशर्ट पर का पोलो का लोगों. लोगों बता रहा है कि बच्‍चा खेलने के लिए किन मैदानों की ओर जाने की इच्‍छा रखता है. या पापा जी उसके किधर निकल चलने की कामना करते हैं. अच्‍छे जीवन में पहुंचे हुए इन बच्‍चों को अच्‍छे स्‍कूल व वाजिब शिक्षा तक पहुंचने में दिक्‍कत नहीं होगी. शिक्षा में हम कहां खड़े हैं के चौहत्‍तर देशों की तालिका में भारत का स्‍थान जो नीचे से दूसरा है (हमसे नीचे सिर्फ़ किरगीज़स्‍तान है) उस अंधेरी, निकृष्‍ट दुनिया का ये विशिष्‍ट बच्‍चे हिस्‍सा नहीं हैं.

भारत में दरअसल दो तरह के बच्‍चे रहते हैं, एक तो वे जो भारत में नहीं, इंडिया में रहते हैं, और मां के पेट से निकलते ही अंग्रेजी में तैरने लगते हैं, क्रिकेट वाला टीशर्ट कुछ अन्‍य, नालायक बच्‍चों के लिए छोड़, खुद पोलो का टीशर्ट पहनकर सपरिवार वीआईपी लाउंज की पहली कतार में मैच देखनेवाले सोफाओं पर अपनी जगह घेर लेते हैं. या ऐसे परिवारों के लिए वह पहले से ही आरक्षित रहता है. दूसरे, तिहत्‍तरवें (तालिका में) स्‍थान की वे नामुराद औलादें हैं जो पांचवी कक्षा में पहुंचकर अभी दूसरी कक्षा का पाठ तक नहीं पढ़ पाते (देहातों में 58%), दो अंकों वाले जोड़-घटाव नहीं कर सकते (46%), तीसरी कक्षा के पचास फीसदी हरामी नालायक जो कायदे से एक से सैकड़ा तक की गिनती भी नहीं सीख सके हैं! जबकि जालिम सरकार क्‍या-क्‍या नहीं करती. छयासठ वर्षों से कर रही है. कल ही मैंने फेसबुक पर यू-ट्यूब से उठाकर एक वीडियो चिपकाया था, 1968 में कैनेडा से मंगवाकर कोटा, राजस्‍थान तक बहत्‍तर टन का एक आणविक संयत्र पहुंचाकर सरकार लोगों के जीवन में बिजली लाने के लौमहर्षक युद्ध-स्‍तर के मंगलकारी कृत्‍य में जुटी है. लोग हैं कि उजबकों की तरह ताकते गड़ही, सड़क, पोखरे में खुद को, बकरी और बच्‍चों का चूतड़ धोते-नहलाते, भटके ढोर-डंगरों की तरह विचर रहे हैं. ऐसे लोगों से उम्‍मीद करना कि कभी उनके बच्‍चे भी पोलो का मैच खेलने जायेंगे, एकदम व्‍यर्थ है. कभी बिजली पायेंगे की उम्‍मीद करना भी व्‍यर्थ है.

सरकार कितना सारा खर्च करती है कि बच्‍चों तक शिक्षा पहुंचे. तहलका का ताज़ा आज़ादी अंक प्राथमिक शिक्षा के मसले पर ही केंद्रित है. मगर नालायक बच्‍चे और उनके नालायक परिवार हैं कि अपने जीवन के इन मंगलकारी कृत्‍यों से दूर जाकर खड़े हो जाते हैं. या पता नहीं वह पैसा ही है कि उनसे दूर खड़ा, जाने किन और की जेबों में पहुंचता रहता है? कभी-कभी कहीं नहीं पहुंचता. जैसे आज के एक्‍सप्रैस में खबर है कि वर्ष 2009 से 2012 के दरमियान नारी व शिशु कल्‍याण मंत्रालय बलात्‍कार पीड़ि‍तों के लिए नियत 239 करोड़़ रुपये का एक टका खर्च नहीं कर सकी. पता नहीं कैसे नहीं कर सकी. मुख्‍यमंत्री के परिवार के पीछे-पीछे बैडमिंटन का मैच देखने गयी थी? या उन बच्‍चों से अपने को दूर खड़ा किये रहने की कोशिश कर रही थी जो पोलो का टीशर्ट पहनकर कभी बैडमिंटन का मैच देखने के काबिल नहीं होंगे, और जीवन भर जानेंगे नहीं कि वो भारत में रहते हैं और भारत इंडिया का उपनिवेश है और इंडिया दरअसल अमेरिका की जेब में रहता है, और जब नहीं रहता तो यहीं कुछ खानदान और खरबपती हैं उनकी जेबों में रहता है और वहां दाखिल होने के लिए अच्‍छी दलाली और दलाल स्‍ट्रीटों की शिक्षा लेनी होती है?

छोड़ि‍ये, आपके बच्‍चे अच्‍छे स्‍कूलों में हैं न? उम्‍मीद करता हूं आप इंडिया में ही रहते हैं. भारत पता नहीं किस दु:स्‍वप्‍न का नाम है.

(पहली फोटो: पीटीआई से, दूसरी तहलका से साभार) 

3 comments:

  1. फैमिली टाइम इन इंडिया, भारत नदारद।

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  2. ओह! क्या-क्या दावे करते हैं अपने देश के लोग। क्या हाल हैं सच्ची में। :(

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  3. बड़ी बड़ी योजनाओं में बच्चों की अशिक्षा कहाँ सुनायी पड़ती है।

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