Wednesday, August 21, 2013

हिंदी कविता का रक्षाबंधन

राखी बंधा ले भइय्या’, या ‘एक हज़ारों में मेरी बहना है’ वाले खांटी सीधेपने में खुद को पहचानने, ढालने की हिंदी कविता ने कभी कोशिश नहीं की. साहित्यिकता व भाषा की सीमाओं में भवानी बाबू और नागार्जुन व दुष्‍यंत कुमार की ग़ज़लों के तीर रहते-रहते कभी जितने चले हों, ‘पुकारता चला हूं मैं, गली-गली बहार की’ का दीवानापन पाने के लिए, कस्‍बों व बड़े शहरों की बदलती दुनिया में मन का ताप और जिजीविषा टोहने के लिए लोग मज़रुह और आनन्‍द बक्षियों के फ़ि‍ल्‍मी तानो वा बाणों को ही खोजते रहे. हिंदी ज़बान, या कविता का जाने कैसा फटियारापन, चिरकुट गुरूर रहा कि वह अशोक चक्रधर और सुरेंद्र शर्माओं को तो खड़ी करती रही, अपने लिए एक वुडी गथरी नहीं खड़ा कर सकी, जो लोगों को उनकी अपनी ज़बान में उनका गाना दे सके, छुट्टि‍यों के दिन सड़क पर आने का बहाना, सरकारों के संग गुफ़्तगू का एक वाजिब तराना दे सके. जिजीविषा और जीवन के साथ हिंदी कविता का कभी रक्षाबंधन हुआ नहीं. साहित्‍य व आलोचना की उत्‍तर-तालिकाओं में गिनाने को जितना भी हुआ हो, समाज के बीच जाकर खड़ा होने का कभी नहीं हुआ.

11 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (22-08-2013) को "ब्लॉग प्रसारण- 93" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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    1. कभी समय निकल कर दूसरों के श्रम का भी कद्र करनी चाहिए

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  2. We want छुट्टि‍यों के दिन सड़क पर आने का बहाना, सरकारों के संग गुफ़्तगू का एक वाजिब तराना ...

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    1. तुम्‍हारे पीछे-पीछे हबीब जालिब साहब आये होते, दस्‍तूर समझाने, गर जो ज़ि‍न्‍दा होते..

      दीप जिसका महल्लात ही में जले
      चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले
      वो जो साए में हर हर मसलहत के पले

      ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
      मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

      मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त - ए - दार से
      मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से
      क्यूँ डराते हो जिन्दाँ की दीवार से

      ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
      मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

      फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो
      जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो
      चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

      इस खुले झूठ को जेहन की लूट को
      मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

      तूमने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
      अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूँ
      चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूँ
      तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर

      मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

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  3. सामाजिक ज़रूरतों को इधर की हिन्‍दी कविता भूलती जा रही है।

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    1. शिरीष भैया, इधर की और उधर की का मसला नहीं है, हबीब जालिब वाली उस जबान का है जिसमें लोगों के बीच खड़ा होकर आप सीधे-सीधे बात कर सकें, हिंदी कविता ने वह जबान पाने की कभी कोई लड़ाई लड़ी नहीं. न उसका कभी वह कोई सीरियस कंसर्न हुआ. पसीना पोंछते लोग फिल्‍मी गाना गुनगुनाते हैं, किसी को कभी हिंदी कविता गुनगुनाते देखा है आपने? हिंदी कवियों की पत्नियों ने भी नहीं देखा होगा. बकिया फिर समाज और उसकी भाषा कहां से कहां पहुंच गई है, हिंदी कविता को पहले पड़ता था, न अब फर्क पड़ता है, वह सानन्‍द छप रही है, छपाई में 'छिपी' हुई जन-संघर्षो चला रही है.

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  4. जिजीविषा और जीवन के साथ हिंदी कविता का कभी रक्षाबंधन हुआ नहीं. साहित्‍य व आलोचना की उत्‍तर-तालिकाओं में गिनाने को जितना भी हुआ हो, समाज के बीच जाकर खड़ा होने का कभी नहीं हुआ.

    सच कडुआ वाला सच!

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  5. आपकी आज कि यह पोस्ट बुधवार, २१ अगस्त २०१३ के ब्लॉग बुलेटिन - राखी कि शुभकामनाओं पर प्रकाशित की जा रही है | हार्दिक बधाई |

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  6. ये हिंदी कविता क्या होता है? आज तक कभी देखा सुना पढ़ा नहीं. यूट्यूब में होता है क्या? :)

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    1. ये आपने बड़ी सीधी, खांटी-सी बात बोल दी, हिंदी कबी सुनेगा तो आपको किसी न किसी का तो एजेंट बताने लगेगा. और किसी का नहीं तो कम से कम जनता का दुश्‍मन तो बतायेगा ही.

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  7. कविता अपनी राह ढूढ़ लेगी, नहीं होता तो गाने हमें क्यों भाते। समस्या उनकी है जो कविता की सीमित परिभाषा देते हैं।

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