Thursday, August 22, 2013

विस्‍मय बाधित..

विस्‍मय-बोधित हूं, मतलब ऑलमोस्‍ट. एक तरह से ऐसा भी कह सकते हैं विस्‍मयबोधित के पीछे-पीछे विस्‍मय-बाधित भी हूं..

हिंदी में शिल्प व रचनात्मक प्रयोगों की जो खुली चादर है, जहां ‘पोस्ट -वैश्वीकरण’ एसएमएस की शैली में, ई-मेल व ब्लॉग-पोस्ट  की तर्ज़ पर, रचनायें सिरज ली जाती हैं, कहानियों की होड़, औपन्यासिकता के कुठोड़ खड़े कर लिये जाते हैं; दैनिक सुप्रभातदैनिक प्रपात के तीन हंसोड़, मुंहजोड़ मित्र जिन पर सप्ताहांत के डेढ़ कॉलमों में चर्चा करके मित्र-धर्मिता का साग व बाग किये जाते हैं, फेसबुक पर उसकी फोटोकारी चिपकाकर थोड़ी ‘वाहों’ व ‘आहों’ का जमाव भी हुआ जाता है, मगर इन सभी मौकों पर जो चीज़ मेरा ध्यान खींचकर फिर उसी में अटकाये रह जाती है वह है आह, वह नामुराद विस्म‍यबोधक चिन्ह!

किस आसानी व हाथ की खुलाई से, लगभग मुदित-मन की अन्यमनस्कता से इस विस्मयता को बरता जाता है, कैसे, क्यों बरता जाता है, क्या‍ जवाब है? आपके पास है? यह कि जो समाज इसे बरतती है वह बड़़ी आसानी से बात-बात पर चकित, और उससे पहले मुदित होती रहती है, इसलिए? ज़रा ये साथ की सैंपलिंग पर एक नज़र मारिये: ‘मैं छप रहा हूं, प्रियवर, अहा!’, ‘देखो, यह मेरी नयी कविता आई, ओह!’, अरे?  इसके बाद ज़रा ये भी: ‘क्या, मार्मिक चित्र उकेरा है, अहा!!’, या ‘क्या, मार्मिक चित्र खींचा है, ऊहू!!!!’  आप समझ रहे हैं? फिर मुझे समझाइये, क्योंकि मैं तो नहीं ही समझ पाता. यह क्या  है क्या. इसलिए कि मूलत: हम गंवई मानसिकता के समुदाय हैं? ज़रा-ज़रा सी बात पर दायें-बायें देखते, चौंक-चौंककर विस्मयबोधक चिन्ह होते रहते हैं? पानी का आधा पिलास पी चुकने के बाद भी विस्मयबोधकता का मूल भाव जा नहीं पाता, अदबदाकर पानी पिलाने वाले हाथ के पैर को अपने पैरों से कुचलते, दहलते हकबकाकर ‘थैंक्यू!!‘ बोलने से बच नहीं पाते?

हिंदी में आवाज़, अंग, फेफड़े, धौंकनी, ध्वनि, वोकलिज़ेशन, रो, तनाव, उच्चारण, विस्मयबोधक, टेर, कानाफूसी, चिल्लाहट, चित्कार, एक नादकार शब्दाडंबरपूर्ण डिवाइस, सरप्राइस का ठीक-ठीक समाज-शास्त्रीय प्रोफ़ाइल क्या है, समझाइये मुझे. मैं अर्द्ध-विराम का इतना इस्‍तेमाल करता हूं, बेचारे की कोई इज़्ज़त नहीं, विस्‍मय-विधान का वितान इतना फैला हुआ है, क्‍यों फैला हुआ है.

इधर एक नज़र ज़रा गोपालपुरिया जी को भी देखे जाइये, और भोजपुरी से घबराहट होने लगे तो हिंदी में इधर देखले जाइये.

2 comments:

  1. विस्मित हो रहे हैं। चकित च!

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  2. All three articles and your post gives so much food for thought when it comes to punctuation marks...
    After reading this post, and the concerned link given in the article,I am in awe of comma.

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