Friday, August 23, 2013

लालबहादुर, देवानन्‍द, आसाराम और विश्‍वजीत..

रीढ़ की हड्डी में दर्द के शुरुआती दिनों में लालबहादुर ने समझा कि आई की चीज़ है, डॉक्‍टर को दिखलाकर गई हो जायेगी. डॉक्‍टर के जवाब के बाद कि नहीं, यह दर्द कम-बेशी होता, आजीवन बना रहनेवाला है, लालबहादुर भयातुर होकर दुबले होने लगे. जीवन को देखने, रोज़ सुबह उठने और रात को सोने जाने का सब नज़रिया ही बदल गया. पहले दवाइयों का रैपर खरीदकर इधर देना और उधर रखना जानते थे, अब उल्‍टे हाथ आंख पोंछकर उसकी महीनी में उसे पढ़ने की कोशिश करने, और बार-बार इस अहसास से कि कितने काम हैं जो अब उनसे ढंग से हो नहीं पाते, घबराने व झुंझलाये रहने लगे. बच्‍चों का कमरे में दौड़ना और शोर करना उनको तनाव से भर देता. उनकी उपस्थिति में बच्‍चे खुद भी तनाव से भर जाते.

देवानन्‍द को रीढ़ की नहीं, कंधे से जुड़े बायें बांह की थी. त‍क़लीफ़. तीन महीने जेल में था जब नहीं थी, बाहर आते ही दर्द ने घेरना शुरु कर दिया. जैसी जीवन की परिस्थितियां थीं, मुंह के पीछे-पीछे बात-बात पर हाथ भी खुल ही जाता, और खुलने के साथ ही भीतर जैसी छूटी आह गूंजती, तब जाकर होश आता कि तक़लीफ़ की कैसी नदी खुल गई है, और इस बायें हाथ के साथ देवानंद किसी काम का नहीं.

काम के आसाराम भी नहीं थे. प्रोस्‍ट्रेट पीडि़त बहुमूत्र की दिक्‍कत में वह कहीं भी जाने का प्रसंग निकलते ही मुरझाने लगते. कहीं भी जाना उन्‍हें पेशाब को रोके रखने की लड़ाई और हारकर अपनी बेहयायी का सार्वजनिक तमाशा बनाना लगता. पत्‍नी से और बेटे से झगड़-झगड़कर आसाराम ने अपना कहीं भी जाना स्‍थगित करवा रखा था. बाथरुम से लौटकर, सोफे पर पलथी मारे बैठे वह मन ही मन गिनती करते कि कितनी देर में बाथरुम दुबारा जाना होगा. इस गिनती में कैसा भी व्‍यवधान उन्‍हें चिड़चिड़ा व झगड़ालु बना देता, और आसाराम झगड़ालु थे नहीं.

जैसे विश्‍वजीत नहीं था. तब तक तो नहीं ही था जब तक डॉक्‍टरों ने उसमें एलर्जी की खोज नहीं की थी.

बुद्ध ने अपना पहला ‘भाषण’ सारनाथ में क्‍यों दिया, वहीं पड़ोस के, तात्‍कालीक सांस्‍कृतिक केंद्र बनारस में क्‍यों नहीं? पांचवी या सातवीं सदी के भारत महासागर में किसी व्‍यवसायी नौका में सफ़र करने का ठीक अनुभव क्‍या था? मुग़लों के शिकारी अभियानों का आयोजन व एक्ज़ि‍क्‍यूशन कैसा था? जो जैसे तब संसाधन थे उन संसाधनों से अंग्रेजों ने देश का नक़्शा कैसे तैयार किया था, उसकी पूरी कहानी क्‍या थी? ये और कैसे कितने ही सवाल थे जिनमें लालबहादुर, देवानन्‍द, आसाराम, विश्‍वजीत की दिलचस्‍पी हो सकती थी, लेकिन नहीं थी, क्‍योंकि उनकी दिलचस्‍पी का मुख्‍य विषय उनकी बीमारी थी.

जो लालबहादुर, देवानन्‍द, आसाराम, विश्‍वजीत नहीं थे, उन्‍हें अन्‍य बीमारियां थीं.

4 comments:

  1. "इनका नस्‍ता बना दिये हैं, दोपहर का टिफिनो रेडी है, इसके आगा सुझाइये.. कि कौन बीमारी पालना है, कि कवना से बचके रहना है!" -- मंदारकुमारी बोझा (ओझा नहीं) का एसएमएस है.

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  2. सुन्दर प्रस्तुति! हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} की पहली चर्चा हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती -- हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल चर्चा : अंक-001 में आपका सह्य दिल से स्वागत करता है। कृपया पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा | सादर .... Lalit Chahar

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  3. सच! यहां सब अपनी-अपनी बीमारियों में ही उलझे रहे।

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