Wednesday, August 28, 2013

ज़रा-सा, जापान..

एक ज़रा-सा गिरे हुए का यह पुरनका पतिताया, जापान.. दुसरका, मेरे हाई का पुरनके, यह, क्‍ल्‍यू.. तीसरका, आवाज़कास्‍ट, यहो एक पुरनके है, नेट पर लउक रहा है, खुद मेरे ब्‍लॉगे में खोया हुआ था.. डेढ़, या अढ़ाई, जिन दिलदारों ने वहां टीप छोड़ी रही होगी, उनसे क्षेमा चाहता हूं..


4 comments:

  1. वे भी क्या दिन थे ना साहब ! पृष्ठभूमि में बजता गाना खोजने के लिए उन्होंने रात दिन एक कर डाला था फिर फ़ोन पर सुनाया था....

    आज मेरे फ़ोन में है वो गीत.... मैं पहली बार ला विया एन रोज़ से रु ब रु हुआ था....

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  2. इसको सुनते हुए तो मैं भी किसी लड़की में तब्दील हो जाता हूँ.... दोनों घुटने झुलाते हुए... हथेली ठुड्डी पर रख हलके हकले डोलती हूँ.... जागती आँखों में कोई मीठा सपना होता है.....

    शुक्रिया. !

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  3. साहित्य, संगीत, कला से संस्कृतियों का आभास तो होता है, जानना तो वहाँ रहने के बाद ही आता है।

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