Wednesday, August 28, 2013

कौन है हमारी ज़िन्‍दगी चलाता..

कोई तो होगा रखता हिसाब हमारे इस जीवन का, चाटर्ड अकाउंटैंट हरामी कभी वह सामने क्‍यों नहीं आता. ज़िंदा रहने की एक शर्त होगी, लूट और दलाली की होगी, हंसता हाथ हिलाता हमारी रसोइयों से गुज़रकर शख़्स वो बैंक जाता, उसका पहचान-पत्र इस मुल्‍क में कौन दफ्तर है बनाता?




(नील यंग के दिल के तार की सवारियों के सहारे)

4 comments:

  1. पहचान का वाकई कोई नज़र नहीं आता. पानी के बहाव जैसी बातां. बढ़िया.

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  2. मन को छू गयी आपके प्रश्नों की जीवट लहरें,
    या तो थामने का सलीका सीख लो, नहीं तो कट लो..

    हाँ, आपके संवादमयी उद्गार बहुत भा रहे हैं।

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  3. ये चाटर्ड अकाउंटैंट भी न!! सबकी बजाने के सिवाय कोई जैसे काम ही न हो..हा हा!!

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  4. रुपया क्यूँ नीचे आता....एक चाटर्ड अकाउंटैंट अपना डॉलर उठे भाव पर भुनाता भारत में...धीरे से मुस्कराता!! और अय्याशी कर कुछ महिने भारत में- लौट आता-फिर डॉलर कमाने की होड़ में पिसता...तिलमिलाता- रुपये का भाव बन जाता एक कारण- तब मुस्कराता!! भारत की अर्थ व्यवस्था चरमराई है.....इस पर एल लेख लिख भिजवाता...छप जाता अखबार में...फिर एक बार मुस्कराता!! डॉलर कमाने की होड़ में..पिस जाता!!


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